रविवार, 4 जुलाई 2010

दामोदर लाल जांगिड़ की ग़ज़ल

 

छल कपट घुट्टी में पी पला आदमी।

आज लगता हैं खुद से छला आदमी॥

 

जात-दर-जात पहले हुआ मुंकसिम,

और चला ढूंढ़ने जात का आदमी।

 

तिफ्‍ले आदम कहाने का ह़क खो दिया,

आदमीयत से इतना गिरा आदमी।

 

आदमी के भरोसे पुकारा था पर,

वो तो निकला बहुत ही बड़ा आदमी।

 

छाछ को देखते ही तो थर्रा गया,

इक धुला दूध सांवला आदमी।

 

जब सुराबों के पीछे भगा बावला,

बन गया मौत का फलसफा आदमी।

 

जब छुआ टूटता और बिखरता गया,

हो गया एकदम भुरभुरा आदमी।

 

जूंझ कर जिंदगी से पराजित हुआ,

बद्‌दुआओं इक एक सिलसिला आदमी।

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दामोदर लाल जांगिड

http://damodarjangid.blogspot.com

damodarlal_jangid@yahoo.com

2 blogger-facebook:

  1. मतला कमाल का है और ये शेर
    जात-दर-जात पहले हुआ मुंकसिम,

    और चला ढूंढ़ने जात का आदमी।



    तिफ्‍ले आदम कहाने का ह़क खो दिया,

    आदमीयत से इतना गिरा आदमी।
    बहुत अच्छे लगी पूरी गज़ल ही उमदा है। धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  2. ek natab gazal hai is sher men bada gaxab ka shabd shilp hai
    vo dhula doodh ka sanwala aadami
    vaise saye karte vaqt chook rah gai lagati hai
    rajba rajbha rajbha rajbha

    उत्तर देंहटाएं

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