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पुरुषोत्तम विश्‍वकर्मा की ग़ज़ल

बना है आन भारत की हुआ है शान भारत की।

यकीनन आज भ्रष्‍टाचार है पहचान भारत की॥

 

चरम सीमा पे ताण्‍डव भूख बेकारी ग़रीबी का,

कि क्रंदन में हुई तब्‍दील वो मुस्‍कान भारत की।

 

निर्धन देश के धन से यहां उड़ते हैं गुलच्‍छर्रे,

बड़ी बदकार गाली बन गया ईमान भारत की।

 

यहां माँ भारती का खैरख्‍वाह कोई नहीं शायद,

तुम्‍हारे हाथ में हैं आबरु भगवान भारत की ।

 

भिखारी की तरह रिश्वत पसारे हाथ बैठी हैं,

दलाली हैं हकीकत में निगाहबान भारत की।

 

मिसाले फाहिशा ‘अफसर‘ यहां दिन रात बिकते हैं,

हैं बिक्री के लिए तत्‍पर सियासतदान भारत की।

 

इसी तकिये से मेरे मुल्‍क की सरकार चलती है,

यही हस्‍ती का वायस है शिकाहो शान भारत की।

 

वतन पे मर मिटे उस कोख से पैदा हुये ऐसे,

हरीफों की तरह काटें जड़े सन्‍तान भारत की।

 

ये कुत्‍ता पालतू जो काटने दौड़ा है मालिक को,

मिटाने का सियासत कर रही ऐलान भारत की

 

निठारी में मिले कंकाल इक दिन खुद बतादेंगे,

हालत हो गयी है आज क्‍या साहबान भारत की।

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अच्छे अशआर बधाई। मुझे ग़ज़ल के तीसरे और 6वे मिसरों में कुछ चीज़ खटक रही है "बदी,बदकार गाली बन गया ईमान भारत की" "बिकने को तत्पर सियासतदान भारत की" इन वाक्यों में मुझे व्याकरण ( लिंग )दोष नज़र आ रहा है। देख लें।

मैं अपने उद्देश्य और साहस की तरह. यह तुम्हारी प्रतिज्ञा है. निश्चित रूप से एक दिन, भारत को एक विकसित देश बन जाएगा. मैं भारत से प्यार है. जय हो
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