मंगलवार, 27 जुलाई 2010

दामोदर लाल जांगिड़ की ग़ज़ल

ग़ज़ल

सब का मन ललचाये कुर्सी।

क्‍या क्‍या नाच नचाये कुर्सी ॥

 

यूं ही सहज नहीं मिल जाती ,

सैण्‍डल तक उठवाये कुर्सी ,

 

नींद उसे फिर कब आती है,

अगर जरा हिल जाये कुर्सी ।

 

कौन छोड़ ना फिर चाहेगा ,

एक बार मिल जाये कुर्सी ।

 

जीते जी ही वो मर जाता ,

जिसकी भी छिन जाये कुर्सी ।

 

करे फाइलें कानाफूसी,

क्‍या क्‍या चट कर जाये कुर्सी।

 

लगी हैं चलने यहां कुर्सियां ,

क्‍या क्‍या दौर दिखाये कुर्सी ।

---

 

दामोदर लाल जांगिड़

पोस्‍ट लादड़िया

जिला नागौर राज

2 blogger-facebook:

  1. Kursi ka khel niraala hai... har koi bhaag raha hai eski peeche...
    ....Aaj ke samay kee kursi daud ko bakhubi prastut kiya hai aapne..
    Haardik shubhkamnayne

    उत्तर देंहटाएं
  2. ख़ूबसूरत पंक्तियां,बेहतरीन अभिव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं

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