रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

दामोदर लाल जांगिड़ की ग़ज़ल

ग़ज़ल

सब का मन ललचाये कुर्सी।

क्‍या क्‍या नाच नचाये कुर्सी ॥

 

यूं ही सहज नहीं मिल जाती ,

सैण्‍डल तक उठवाये कुर्सी ,

 

नींद उसे फिर कब आती है,

अगर जरा हिल जाये कुर्सी ।

 

कौन छोड़ ना फिर चाहेगा ,

एक बार मिल जाये कुर्सी ।

 

जीते जी ही वो मर जाता ,

जिसकी भी छिन जाये कुर्सी ।

 

करे फाइलें कानाफूसी,

क्‍या क्‍या चट कर जाये कुर्सी।

 

लगी हैं चलने यहां कुर्सियां ,

क्‍या क्‍या दौर दिखाये कुर्सी ।

---

 

दामोदर लाल जांगिड़

पोस्‍ट लादड़िया

जिला नागौर राज

विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

Kursi ka khel niraala hai... har koi bhaag raha hai eski peeche...
....Aaj ke samay kee kursi daud ko bakhubi prastut kiya hai aapne..
Haardik shubhkamnayne

ख़ूबसूरत पंक्तियां,बेहतरीन अभिव्यक्ति।

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget