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दिनेश त्रिपाठी ‘शम्स’ की ग़ज़लें

(1)

यकदे में शराब रहने दे

यूं न पी बेहिसाब रहने दे

 

दुझको दुनिया समझ न ले पत्थर

कुछ तो आँखों में आब रहने दे

 

मैं तो अपना सवाल भूल गया

तू भी अपना जवाब रहने दे

 

मेरी खुशियों का सब हिसाब लिया

मेरे गम का हिसाब रहने दे

 

है हकीकत से लाख बावस्ता

फिर भी आँखों में ख्वाब रहने दे

 

प्यार का है अभी नशा मुझ पर

तू ये अपनी शराब रहने दे

 

तूने  जो छीन लिया, छीन लिया

ये ग़ज़ल की किताब रहने दे

 

---

 

(2)

दर्द में गर मजा नहीं होता

प्यार दिल में जगा नहीं होता

 

जाने क्या हो गई खता मुझसे

आजकल वो खफा नहीं होता

 

उससे मिलने की जुस्तजू क्यों है

वो जो मुझसे जुदा नहीं होता

 

जिसने दुनिया के गम चुराए हैं

उसका कुछ भी बुरा नहीं होता

 

उसकी आँखों में जो लिखा है पढ़ो

प्यार का तरजुमा नहीं होता

 

हौसले रास्ता दिखाते हैं

जब कहीं रास्ता नहीं होता

---

(साभार – नवनीत, मई 2010)

टिप्पणियाँ

  1. है हकीकत से लाख बावस्ता

    फिर भी आँखों में ख्वाब रहने दे


    bahut khoob

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेनामी11:20 pm

    wahh..dinesh ji..lajawab..bemisal..har ek sher lakh take ki baat kah rha h..apki saafgoi aur gazalgoi ko salam ..waah

    उत्तर देंहटाएं
  3. Bahoot khoob Dinesh Ji ... Its a spellbound-poem...

    उत्तर देंहटाएं

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