शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

रत्नकुमार सांभरिया का आलेख : दलित, प्रेमचंद, तुलसीदास और शहीद भगत सिंह

मुंशी प्रेमचंद (1880-1936) को वर्णवादी आलोचक साहित्य जगत का बरगद मानते आ रहे हैं। बरगद तक पहुँचाने में उनकी कितनी ही खामियाँ ढंक-दबा दी गईं। यह ठीक वैसे ही रहा जैसे मूर्ति की महिमा ही गाई जा सकती है, प्रतिकार अक्षम्य है।

इस तथ्य से कितने रूबरू हैं कि प्रेमचंद ग्राम्य जीवन और लोक परंपराओं से नितांत अनभिज्ञ थे। वे घोर ईश्वरवादी, भाग्यवादी और वर्णवादी थे तथा छुआछूत और जातपांत में उनका अटूट विश्वास था। यहाँ यह तथ्य भी पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है कि प्रेमचंद- साहित्य में श्लीलता का प्रायः अभाव है और उनकी भाषा में लियाकत नहीं होने के कारण पाठक मन को कचोटती है। विशेषतः दलितों के बारे में वे जिस भाषा-शैली का प्रयोग करते हैं, वह हृदय ही चीर डालती है।

बावजूद इसके मार्क्सवादी सोच का यह मानना है कि प्रेमचंद ने उस समय दलितों के बारे में लिखा, जब लोग उनकी छाया से भी दूर भागते थे। क्या यह तर्क इस दायरे में नहीं आता कि कोई किसी अछूत को थप्पड़ मार दे और यह तर्क दे कर उसकी प्रशंसा की जाये देखो, ‘उसने ‘अछूत’ को छुआ तो सही, दूसरे लोग तो उसकी छाया से भी दूर भागते हैं।’

कहना होगा कि प्रेमचंद-साहित्य में न दलित नेतृत्व है, न दलित चरित्र। उनकी रचनाओं के कथानक धर्मशास्त्रों के सूक्तों से ऊपर नहीं उठ पाये हैं। शास्त्र, जो अपने अंतस में पूर्वाग्रह समाये होने के कारण शूद्रों के लिये ‘‘शस्त्रों’’ से भी ज्यादा मारक साबित हुये हैं, प्रेमचंद की कलम ‘‘शास्त्र बनाम शस्त्र’’ के गिर्द घूमती है।

बतौर उदाहरण- ‘‘भंगी तो भंगी ही रहेंगे, उन्हें आदमी नहीं बनाया जा सकता है।’’ (दूध का दाम)

‘‘जो अपना धर्म पाले वही ब्राह्मण है और धर्म से मुंह मोड़े वही चमार है।’’ (गोदान) ‘‘चमारों को जानते हो, एक ही हत्यारे होते हैं, इसी हरिहर ने मेरी दो गऊएँ मार डालीं।’’ (मुक्तिमार्ग)

मुंशी प्रेमचंद और उनकी विचारधारा को समझने के लिये कतिपय तथ्य समीचीन जान पड़ते हैं। इनमें विचारधारात्मक अन्तर्द्वन्द्व भी है और विरोधाभास भी।

तुलसीदास सगुणधारा या द्वैतवाद के अग्रणी भक्त कवि हैं। उन्होंने ‘‘रामचरित मानस’’ जैसा ग्रन्थ प्रणीत कर दशरथ पुत्र राम को ईश्वर-रूप प्रदान किया है। तुलसीदास का यह कार्य हिन्दुत्व की सूखती धारा को पुनर्जीवित करने में अविस्मरणीय योगदान कहा गया है। तुलसीदास कट्टर हिन्दू थे और उन्होंने हिन्दूधर्म शास्त्रों का ध्येय अपने सृजन में समावेश किया। इसके चलते मार्क्सवादी विचारक उनको धर्मनिरपेक्षता में बाधक मान कर तुलसी जयंती में शामिल नहीं होते हैं।

सच्चा हिन्दू होने के कारण प्रेमचंद तुलसीदास को अपना आदर्श मानते रहे। उनके प्रति अपनी अनन्य आस्था के चलते वे तुलसीदास मंदिरों के जीर्णोद्धार के लिये बड़े चिंतित थे। जुलाई 1933 में लिखे अपने लेख- ‘‘तुलसी स्मृति तिथि कैसे मनाये?’’ जो वर्तमान में प्रेमचंद के विचार भाग दो में संकलित है, में उनकी यह व्यग्रता व्याकुलता की जद तक पहुंच जाती है।

वे अपने इस लेख में हिन्दू महासभा, जिसके वे प्रचारक जैसे रहे और बड़े प्रशंसकों में थे, का आह्वान करते हैं - ‘‘तुलसीदास जी ने हिन्दू धर्म और हिन्दू जाति का जो उपकार किया है, उसके वर्णन का यहाँ स्थान नहीं है। उन्होंने हिन्दू सभ्यता और हिन्दू संस्कृति की बड़ी रक्षा की है। हिन्दू धर्म और हिन्दू समाज उनके उपकार भार से कभी मुक्त नहीं हो सकता। इसलिये हिन्दू जाति का प्रतिनिधित्व करने वाली हिन्दू महासभा का भी कर्त्तव्य है कि वह इस दिशा में अपनी कुछ शक्ति लगावे।’’

तुलसीदास की स्तुति में लिखे गये अपने इस लेख में प्रेमचंद हिन्दू, हिन्दू धर्म, हिन्दूजाति, हिन्दूसमाज, हिन्दूसाहित्य, हिन्दूसंस्कृति और मूर्तिपूजा पर केन्द्रित रहे हैं। यहाँ उन्होंने मानव जाति या मानव धर्म की कहीं चर्चा नहीं की है।

इसी लेख में वे आगे बूझते हैं - ‘‘काशी में अन्यत्र तुलसीदास जी का एक मंदिर भी है, जिसके विषय में कहा जाता है कि वह काशी नरेश की सहायता से बना है। उसमें गोस्वामी जी की एक शुभ्र प्रस्तर - मूर्ति स्थापित है, जो उनके असली चित्र के आधार पर तैयार की गई है। सुनते हैं, उसी असली चित्र को काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने प्रकाशित किया है। लेकिन हमने आज तक उस मंदिर को तीर्थ का रूप नहीं दिया। अस्सीघाट के तुलसी मंदिर में जो खडाऊ तुलसीदास जी की रखी हैं, उसकी ओर हमारा ध्यान नहीं गया।’’

अब यहां पाठक की एक बहुत बड़े विरोधाभास से मुठभेड़ होती है। वह यह कि मार्क्सवादी प्रेमचंद जयंती मनाना अपने कर्त्तव्यबोध की शुमार मानते हैं, विपरीत इसके तुलसीदास के विचारों को वे अपनी विचारधारा से अलग रखकर उनकी जयंती में शामिल तक नहीं होते, जबकि हिन्दूवादी विचारधारा के संवर्द्धन के कारण प्रेमचंद, तुलसीदास को अपना आदर्श मानते हैं और धर्म गुरू जैसा आदर देते हैं।

गौतम बुद्ध डॉ. अम्बेडकर के धार्मिक और महात्मा फूले सामाजिक आदर्श और गुरू थे। जब डॉ. अम्बेडकर की जयंती मनाई जाती है तो बुद्ध और फूले की तस्वीरें भी डॉ. अम्बेडकर के चित्र के साथ रखी जाती हैं और पुष्पांजलि द्वारा समादृत होती हैं। प्रेमचंद जयंती के अवसर पर प्रेमचंद के चित्र के साथ उनके आदर्श और उपास्य तुलसीदास का चित्र भी माल्यार्पण द्वारा आदर पाये।

सरदार भगतसिंह को 23 मार्च, 1931 के दिन लाहौर की जेल में फांसी हुई थी। उस दिन वे साढ़े 23 वर्ष के युवा थे। फांसी पर चढ़ने से पहले उन्होंने ईश्वर के अस्तित्व और खुद के अईश्वरी होने पर एक बहुत ही उम्दा लेख लिखा था- ‘‘मैं नास्तिक क्यों हूँ।’’ वे अपने इस लेख में लिखते हैं-’’ मैं नहीं जानता कि ईश्वर में विश्वास और रोज-रोज की प्रार्थना, जिसे मैं मनुष्य के लिये सबसे स्वार्थी और गिरा हुआ काम मानता हूँ, मेरे लिये सहायक सिद्ध होगी या मेरे केस को और चौपट कर देगी। मैंने उन नास्तिकों के बारे में पढ़ा है, जिन्होंने सभी विपदाओं का बहादुरी से सामना किया, अतः मैं एक पुरूष की भांति फांसी के फंदे की अंतिम घड़ी तक सर ऊंचा किये खड़ा रहना चाहता हूँ।’’

वे इसी लेख में बड़ी बेबाकी से लिखते हैं - ‘‘मेरे एक दोस्त ने मुझे प्रार्थना करने को कहा। जब मैंने उसे अपने नास्तिक होने की बात बतलाई तो उसने कहा, ‘‘अपने अंतिम दिनों में विश्वास करने लगोगे।’’ मैंने कहा, ‘‘नहीं प्यारे दोस्त ऐसा नहीं है। मैं इसे एक अपमानजनक तथा भ्रष्ट होने की बात समझता हूँ। स्वार्थी कारणों से मैं प्रार्थना नहीं करूंगा।’’

अगर भगत सिंह शहीद नहीं हुए होते तो न केवल भारत के ही बल्कि, विश्व के भी एक बहुत बड़े धर्मनिरपेक्ष विचारक और साहित्यिक होते।

मुंशी प्रेमचंद ने सन् 1920 में अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया था। उस समय वे 40 वर्ष के थे। उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी से अपना इस्तीफा क्यों दिया, इसके दो हेतु माने जाते हैं। बहुप्रचारित यह है कि असहयोग आंदोलन के दौरान जब गांधी जी ने गौरखपुर का दौरा किया तो उनकी सभा में प्रेमचंद भी शरीक हुए। उन्होंने गांधी जी की प्रेरणा पा कर स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने के लिये अपनी नौकरी छोड़ दी। अंदरूनी कारण यह दृष्टिगोचर होता है कि उन दिनों घातक मानी जानेवाली पेचिश जैसी बीमारी ने प्रेमचंद को बुरी तरह जकड़ा हुआ था। आव और खून आने लगे थे। नौकरी पर जाना तो दूर, दुर्बलता ने इतना घेर लिया था कि उनका दो कदम चल पाना भी दूभर हो रहा था। अंग्रेज राज में शिष्टाचार और अनुशासन का डंका बजता था। जब कतई पार नहीं पड़ी तो उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया। उस समय उनके पास तीन हजार रूपये नकद थे, जो आज के हिसाब से 7-8 लाख रूपये बैठते हैं। इस बड़ी राशि के बूते उन्होंने हंस और जागरण जैसे प्रेस-प्रकाशन खड़े किये।

वे अपने आत्म कथ्य ‘‘जीवन सार’’ में लिखते हैं - ‘‘वहाँ (देहात) जाने के लिये एक सप्ताह बाद मेरी पेचिश कम होने लगी। यहां तक कि एक महीने के अंदर मल के साथ आव का आना बंद हो गया। फिर मैं काशी चला गया और अपने देहात में बैठ कर कुछ प्रचार और कुछ साहित्य सेवा में जीवन को सार्थक करने लगा। गुलामी से मुक्त होते ही मैं नौ साल के जीर्ण रोग से भी मुक्त हो गया।’’

वे इस लेख में आगे लिखते हैं - ‘‘इस अनुभव ने मुझे कट्टर भाग्यवादी बना दिया है। अब मेरा दृढ़ विश्वास है कि भगवान की जो इच्छा होती है, वहीं होता है और मनुष्य का उद्योग भी उसकी इच्छा के बिना सफल नहीं होता।’’

भगवान के इस भय ने प्रेमचंद के मानस में इस कदर घर कर लिया कि उनकी 1920 के बाद की रचनाओं में भाग्य-भगवान, पाप-पुण्य, आत्मा-परमात्मा, देवी-देवताओं, भूत-प्रेत और मंदिर-मूर्ति के गुणगान का अतिरेक होने लगा। यह गुणगान पात्रों द्वारा कथोपकथन के माध्यम से भी कराया गया और स्वयं प्रेमचंद ने कथ्य के विकास के बरअब्स भी ऐसा किया। उनके अंतिम दिनों में लिखे गये ‘‘गोदान’’ (1935-36) में तो शास्ता-स्तुति चरम पर पहुंच जाती है। गोदान में लगभग 200 बार ईशरूप महिमामण्डित है। गोदान कराकर तो वे पूरी तरह ब्राह्मणवाद की गोद में जा बैठते हैं। सही मायने में मुंशी प्रेमचन्द प्रगतिशील अथवा जनवादी न होकर हिन्दुवादी सोच के विपर्यय थे।

अब यहां पाठक की एक और वैचारिक विरोधाभास से मुठभेड़ होती है। यह मुठभेड़ पहली मुठभेड़ से ज्यादा घनघनाती है। अपनी किस प्रतिबद्धता के चलते प्रेमचंद जयंती बड़े उत्साह से मनाते हैं, जबकि भगत सिंह जयंती या शहीदी दिवस मनाने के अवसर पर प्रायः उदासीन रहते हैं, क्यों ? क्या महज इसलिये क्योंकि मुंशी प्रेमचन्द ने 9 अप्रैल 1936 को लखनऊ में आयोजित प्रगतिशील लेखक संघ के स्थापना समारोह का उद्घाटन किया था?

इसे अतिशयोक्ति कहना नाइंसाफी होगी कि शिल्प और कथ्य के निर्वाह की दृष्टि से जिस प्रकार प्रेमचंद की 224 (प्रेमचंद के पुत्र श्री अमृतराय का ‘कलम के सिपाही’ में काल खण्ड) कहानियों पर चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की ‘‘उसने कहा था’’ कहानी भारी है, उसी प्रकार प्रेमचंद के तीन जिल्दों में प्रकाशित ‘‘प्रेमचंद के विचार’’ में संकलित तमाम लेखों पर शहीद भगत सिंह का यह वैचारिक लेख- ‘‘मैं नास्तिक क्यों हूँ।’’ भारी है।

प्रेमचन्द की प्रदर्शनवादिता, हिन्दूवादिता और भाग्यवादिता के ऊपर दिये गये उदाहरण उनके साहित्य में दलितोल्लेख के संदर्भ में तीखेपन और घृणास्पद रूप में सामने आते हैं। अंततः प्रवृति ही तो मनुष्य के व्यवहार की निर्माता होती है।

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रत्नकुमार सांभरिया

भाड़ावास हाउस

सी-137, महेश नगर,

जयपुर-302015

2 blogger-facebook:

  1. स्तरीय सामग्री को परोस कर आपने पाठकों पर बड़ा उपकार किया है।
    -डॉ० डंडा लखनवी

    उत्तर देंहटाएं
  2. साहित्यकार का अध्ययन और विश्लेषण सामान्य पाठक से हटकर होना चाहिए । पहले से कोई दृष्टिकोण निर्मित करके सही मूल्यांकन सम्भव नहीं ।

    उत्तर देंहटाएं

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