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31 जुलाई 2010

सुभाष राय की कवितायें

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1. तलाश


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मौसम साफ होने पर
कोई भी बाढ़ के खिलाफ
पोस्टर लगा सकता है
बिजली को गालियाँ
बक सकता है
तूफान के खिलाफ
दीवारों पर नारे
लिख सकता है

जब हवा शीतल हो
धूप मीठी हो
कोई भी क्रांति की
कहानियाँ सुना सकता है
लेनिन और माओ की
तस्वीरें टाँग सकता है
घर की दीवारों पर

लेकिन जब मौसम
बिगड़ता है
गिने-चुने लोग ही
घर से बाहर निकलते हैं
बिजलियों की
गरज से बेखबर
बाढ़ के खिलाफ
बांध की तरह
बिछ जाने के लिए

ऐसे कितने लोग हैं
धरती उन्हें
चूमना चाहती है प्यार से

2. आदमी होना


----------
उस पर इलजाम थे
कि वह झूठ नहीं बोलता
कि वह अक्सर
खामोश रहता है

उसे देखने को
लालायित थी भीड़
बहुत दिनों से कोई
दिखा नहीं था इस तरह
सच पर अडिग

वह बिल्कुल दूसरे
आदमियों जैसा ही था
हाथ, कान, आँख
सब औरों की ही तरह

भीड़ में घबराहट थी
कुछ उसे पागल
ठहरा रहे थे..
आत्महत्या पर उतारू है
बेवकूफ, मारा जायेगा

कुछ को याद आ रहीं थीं
ऐसे मरजीवों की कहानियाँ..
एक और आदमी
पगलाया हुआ
निकल आया था सड़क पर
सच की सलीब पर
खुद को टांगे
हिम्मत से बढ़ा था
पर उसकी हिम्मत से बड़ा
निकला था एक खंजर
लपलपाता हुआ
उसके सीने में उतर गया
वह सच बोलते-बोलते रह गया

कुछ युवक भी थे
भीड़ में से उचकते हुए
उस आदमी तक पहुंचने
उसे छू लेने को व्याकुल
उन्होंने पढ़ा था
झूठ हमेशा हारता है
उन्हें अभी तय करना था
सच की राह चुनें या नहीं

जैसे ही वह बोलने
को तैयार हुआ
चारों ओर सन्नाटा छा गया
वह बोलता तो
भूख और मौत की नींव पर
खड़ी की गयीं इमारतें
भरभराकर ढह जातीं
निरपराधों के खून से
सींचकर उगाया गया
ऐश्वर्य द्वीप डूबने लगता
वह बोलता तो
आदमी के चेहरे लगाये
भेड़िये पहचान लिये जाते

पर हर बार की तरह
इस बार भी वही हुआ
उसके इशारे से पहले ही
एक सनसनाती हुई गोली
उसके शब्दों को
वेधती हुई निकल गयी
वह पहाड़ की तरह गिरा
सच को सम्हाले

वह मर गया
पर सच जिंदा था
कल फिर कोई निकलेगा
आदमी होने का
एलान करते हुए
सच उजागर होने तक
बार-बार मरकर भी
उठ खड़ा होगा मरजीवा

3. कहां है आदमी


-------------

आदमी है कहां, किधर
कोई बतायगा मुझे
चुप क्यों हैं सब के सब
कोई बोलता क्यों नहीं

अपने बच्चों का ध्यान
तो जानवर भी रखते हैं
अगर तुमने भी इतना ही
सीखा अभी तक
तो तुम उनसे अलग कैसे

भैंसे बंधती हैं
जिसके खूंटे से
दूध देती हैं उसे
तुम भी अगर किसी के
खूंटे से बंध गये हो
क्योंकि वह तुम्हें
डाल देता है चारा
जो वह चबा नहीं पाता
और बदले में दूहता
रहता है तुम्हें
तो तुम पालतू से
ज्यादा क्या समझते हो
अपने-आप को
कैसे मान लूं कि तुम
अब कभी दहाड़ सकोगे
निर्भय वनराज की तरह

जिनकी मूंछें बड़ी हैं
जिनकी आवाज में
कुछ भी कर गुजरने का
झूठा ही सही पर
सधा हुआ दर्प है
जो बड़ा से बड़ा अपराध
करके भी हथकड़ियों में
कभी नहीं बंधते
जिनके लिए थाने
घर की चौपाल की तरह हैं
जिन्हें अपनी कुर्सियाँ सौंप
देते हैं सरकारी अफसरान
डर से ही सही
जिनका प्रवचन
सभी लगाते हैं सर माथे
जिनकी गुलामी बजाती हैं
गैरकानूनी बंदूकें

मैंने देखा है
बार-बार उनके दरबार में
दुम हिलाते हुए
पूंछ दबाकर करुणा की
भीख मांगते हुए
निहुरे, पांवों में गिरे हुए
चारणों की जमात को
गिरवी रख चुके खुद को
निजता से हीन, दीन
मिमियाते, घिघियाते
हुक्म बजाते

इन्हें आदमियों में आखिर
क्यों गिना जाय
सिर्फ इसलिए कि ये
आदमी जैसे दिखते हैं
दो पांवों पर चलते हैं
कभी-कभी मनुष्य की
आवाज निकाल लेते हैं

इन मरे हुओं के हुजूम में
मैं ढूंढ रहा हूं उन्हें
जिनमें आदमीयत बाकी है
कोई बतायेगा इनमें
वो कहां है, जिसने
बचाया था मासूम लड़की को
जिस्मफरोशों के चंगुल से
वो कहां है जिसने
पड़ोसी के घर में घुसे
आतंकवादी को अपनी
भुजाओं में जकड़ लिया था
और उसकी बंदूक मरोड़ दी थी
और वो कहां है
जो अपाहिज हो गया
बलात्कारियों से जूझते हुए
जिसने गांव की
इज्जत से खेलने वाले
बदमाश को बाइज्जत जमानत
मिलते ही कोर्ट के बाहर
ढेर कर दिया था

मुझे उन कायरों की
कोई दरकार नहीं है
जो सड़क पर लहूलुहान पड़े
बच्चे के पास से गुजर जाते हैं
फिर भी आंखें पसीजतीं नहीं
मुझे उन हतवीर्यों से क्या लेना
जो चाकू हाथ में लहराते
मुट्ठी भर बदमाशों को
ट्रेन का पूरा डिब्बा लूटते देखते हैं
और इस झूठी आस में
कि शायद वे लुटने से बच जायें
अपनी बारी आने तक
जुबान और हाथ
दोनों बंद रखते हैं
मुझे उन बिके हुए लोगों
की भी जरूरत नहीं है
जो चोरों, बेइमानों का
रात-दिन गुणगान करते हैं
सिर्फ इसलिए की उन्हें
सरकारी ठेके मिलते रहें
कमीशन बनता रहे

देखो, पड़ताल करो
कोई तो जिंदा बचा होगा
किसी की तो सांस
चल रही होगी
कोई तो अपने
लहूलुहान पांवों पर
बार-बार खड़ा होने की
कोशिश कर रहा होगा
कोई तो अनजान डरे हुए
बच्चे को बांहों के
घेरे में संभाले
जूझा होगा अपहर्ताओं से
ढूंढो शायद कोई
मंजुनाथ घायल पड़ा हो
कोई सत्येंद्र तुम्हारे आने के
इंतजार में हो

--
डॉ. सुभाष राय
ए-१५८, एम आई जी, शास्त्रीपुरम, बोदला रोड, आगरा

5 टिप्‍पणियां:

  1. bahut sahi kahaa hai aapne...shabda ye dil ko bedhne waali hai....shubhakamnaye

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  2. Samaj ke ek bhaywah magar sachha chitran.....
    samvedanheen hote insaniyat see sachhi tasveer..

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  3. मंगलवार 3 अगस्त को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है .कृपया वहाँ आ कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ .... आभार

    http://charchamanch.blogspot.com/

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  4. सारी कविताएं भावपूर्ण है

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  5. अद्भुत रचनाएँ हैं...बहुत सशक्त...बधाई..
    नीरज

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं

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