जगमोहन 'आज़ाद' की कविताएँ

jagmohan azad

आस्था

आज हम सब

ईश्वर की आस्था में

खोये है इस कदर कि-

जिन पार्कों में खेलते-कूदते थे

नन्हे-मुन्ने बच्चे हमारे

और

जहां बनाये जाने थे...स्कूल-कॉलेज

इन नौनिहालों के भविष्य संवारने को

वहां हमने रातों-रात

रख दी मूर्ति एक पत्थर की

और, बना डाले

मंदिर-मस्ज़िद-चर्च-गुरुद्वारे

और,

नौनिहाल सड़कों पे खोज़ रहे भविष्य की डगर-

खेल रहे हैं उबड़-खाबड़ रास्तों पर हमारे...।

जिन रास्तों-सड़कों से होकर

नापनी थी हमने जल्द से जल्द

दूरी अपने घरों की

उन पर भी इस छोर से उस छोर तक

बैठा दिए है हमने प्रभु प्यारे

और घर पहुंचने को

रास्तों-सड़कों के लिए भटक रहे हैं आज...हम सारे...।

जहां-जहां लगाये गए थे सूचना पट

कि ये ज़मीन सरकारी है

इस पर अवैध कब्जा दण्डनीय है

वहां-वहां भी रातों-रात गाढ़ दिए झंडे हमने

तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं के

और हो गए भक्ति में लीन इनकी

हे भगवान, हे मेरे मौला, हे मेरी मसीहा, हे वाहे गुरु-

हे माता रानी, जगत जननी

कृपा बनाये रखना हम पर अपनी

हम सब है तेरे बच्चे प्यारे-प्यारे...।

और प्रभु हैं कि...मुस्करा रहे हैं मंद-मंद

देख भक्ति हमारी...

और...कह रहे हैं-

तुम कितने नादान हो मेरे भक्तों

तोड़ बच्चों के खेल-खिलौने

उज़ाड अपनों के ही आशियाने

कहते हो प्रभु हम हैं भक्त तुम्हारे

जरा बताओ तो सही...

ये कैसी आस्था है मेरे प्यारे....।

---

 

तुमने ठीक कहा था

ठीक ही तो कहा था

तुमने

कि गंदे पानी में कभी भी

पत्थर नहीं फेंकना

छींटे खुद के ऊपर आकर ही गिरेंगे

लेकिन

मैंने तो अरबों-खरबों खर्च कर

पवित्र-प्राणदायिनी बनायी गयी गंगा में

लगाया था गोता

खुद के पाप धोने को

फिर भी, पता नहीं छींटे गंदे-

क्यों गिरे ऊपर मेरे...।

तुमने ठीक कहा था

जिनके घर शीशे के होते हैं

उन्हें दूसरों के घरों पर

पत्थर नहीं फेंकने चाहिए

लेकिन मैंने तो ताउम्र की कमाई के बाद

बनायी थी झोपड़ी एक छोटी सी

उसे भी शीशे के महलों में रहले वालों ने

खुद के आशियानों के लिए

उजाड़ डाला बेझिझक...।

तुमने ठीक कहा था

जिस पथ पर दिखे

सफेद पोश...बड़ी संख्या में

उस पथ पर न रखना, पग कभी भी तुम

नहीं तो भटकोगे तुम भी

इन्हीं लोगों की तरह ।

मैंने तुम्हारे कहने पर ही

बनाया था खुद का रास्ता

सबसे अलग...

इसके बावजूद

इन सफेदपोश धारियों ने

उलझा ही लिया मुझे खुद के वादों-प्रतिवादों में

और...तब से अब तक भटक ही रहा हूं

इस पथ से उस पथ तक

जिसका राही नहीं हैं...कोई सिवा मेरे...।

तुमने ठीक कहा था

जो लोग हमेशा

चुनते है सच्चाई को

वो नहीं खा सकते धोखा कभी किसी से

उन्हें डिगा नहीं सकता कोई भी

झूठ-फरेब-लालच, रास्ते से अपने

तुम्हारे कहे अनुसार

मैं भी खड़ा हूं अभी तक

सच्चाई के रास्ते पर

कई बार की कोशिश...झूठ-फरेब-लालच-भ्रष्टाचार ने-

मुझे मेरे रास्ते से हटाने की

मगर नहीं हुआ मैं टस से मस

खुद के उसूलों से...आज तक

तुमने ठीक कहा था

जो रहता है खुद के उसूलों-आदर्शों-परंपराओं के साथ हमेशा

उसे नहीं डिगा सकता-

कोई बेईमान-अहंकार-चाटूकार

अपनी राह से कभी भी...कहीं भी

तुमने ठीक कहा था।

-जगमोहन 'आज़ाद'

टिप्पणियाँ

  1. jagmaohan ji.. aapko padkar aacha laga... lekin aapki photo dekh kar..lagne laga hai ki ab aap bude hone lage ho...
    aapka chota bhai..
    paan3

    उत्तर देंहटाएं

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