मंगलवार, 13 जुलाई 2010

पुरूषोत्तम विश्वकर्मा का व्यंग्य : गद्यकारों की अन्तर्व्यथा

ज चाचा दिल्लगी दास ने आते ही बिना किसी रस्मी मिजाज फुर्सी के ही अपना तपशरा शुरु कर दिया ,बोले कि कपूत जिसने भी अपने हाथ में कलम थामी रखी हैं यकीनन उसके सीने में कोई न कोई दर्द तो जरुर होगा, मगर बाज लोगों के हाथों में कलम देख कर न जाने क्यूं मेरे पेट में रह रह कर दर्द होता हैं कि वे क्यों लिख रहे हैं मगर मेरे पेट में दर्द होने से उनकी सेहत और उनके मुसलसल लिखते रहने पर क्या फर्क पड़ता है ?

वैसे ये कलमकार यानि कि शुद्ध हिंदी में बोलें तो ये साहित्यकार दो किस्म के पाये जाते हैं एक तो वो जिनको साहित्यिक समझ वाले लोग साहित्यकार मानते हैं दूसरे वो जो खुद ही अपने आप को साहित्यकार समझते हैं। ये दो किस्में भी थोडा आगे चल कर पहली पंक्ति से लेकर अंतिम पंक्ति तक के साहित्यकारों में विभक्त हो जाती हैं।

थोड़ा और आगे चलें तो ये सब फिर दो भागों में बंट जाते हैं गद्यकार और पद्यकार । पद्यकार वो जो समूचे अफसाने को मात्र एक शेर में कह डालते हैं ,और गद्यकार वो जिन्हें एक अदनी सी बात कहने में भी कई-कई पेजे भरने पड़ते हैं तब भी कोई गारंटी नहीं रहती कि बात पूरी हो ही गयी।

उपर से सितम ये कि इस व्यंग्य विधा को तो कल तक तो साहित्य का कोई हिस्सा ही नहीं स्वीकार किया जाता था । गद्यकारों व पद्यकारों में से किसी को भी पहला या दूसरा क्रम देकर मैं क्या कोई भी किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहता , हां इनमें से बेचारे गद्यकार अवश्य आदिकाल से ही उपेक्षा के पात्र रहे हैं। आगे चलकर कितने ही वादों के दौर चले मगर हर वाद में पद्यकार ही हावी रहे।

आज के इस ‘‘साईबर युग‘‘ में जब किसी के पास लम्बा लतीफा तक सुनने का वक्त नहीं तो ऐसे में भला कई किस्तों में छपी लम्बी कहांनियां पांच पांच कॉलमों के लेख लोग क्या सोचकर लिखते होंगे ये वो ही जाने। लिखने वालों और छापने वालों दोनों को अच्छी तरह से पता होता है कि इस कदर लम्बी चीज को कोई नहीं पढ़ने वाला मगर दोनों की अपनी अपनी मजबूरियां है। एक को लिखने बीमारी दूसरे को कागज भरने का रोग।

सम्पादकों व प्रकाशको से तो मुझे कुछ लेना देना नहीं मगर इन साहित्यकारों पर मुझे जबरन ही रहम आ जाता है। बेचारे गद्यकार। इन पर रहम भी इस कदर आता है कि पूछो मत। वो क्या है कि पद्यकारों को स्वतः ही चंद सहूलियतें मुहैया होती है। वो चलते चलते भी किसी साधारण से भी साधारण बात पर अपने एक दो शेर यह कहते हुए सुना डालते है कि अमुक विषय पर मैंने भी एक,कविता,मुक्तक,दोहा,शेर,या कुण्डली लिखा है जिसकी चंद पक्तियां कुछ यूं है वो बात अलग है कि चंद पंक्तियों के नाम पर कभी कभी तो पूरी की पूरी रचना सुना डालते हैं। किन्हीं को जब जब ज्यादा जरूरत पडती है तो चंदा जमा कर कवि सम्मेलन बुला डालते हैं अगर चंदे की व्यवस्था नहीं हो पाती है तो जेब से ही प्रन्द्रह बीस चाय के पैसे खर्च कर कविता पाठ या काव्य गोष्ठी का आयोजन कर के खुल कर अपनी भडास निकाल लेते हैं। कुछ खुर्रांट किस्म के पद्यकार तो शादी जन्मोत्सव गृह प्रवेश सगाई या किसी भी मौके पर अपना गला साफ करने से नहीं चूकते और शोक सन्देश भी पद्य में ही देना ज्यादा अच्छा समझते हैं मगर गद्यकार ऐसा कुछ भी नहीं कर सकते।

गद्यकारों के लिए एक मात्र विकल्प होता है कही न कहीं छपना और छपने के लिए ये कुछ भी कर सकते हैं सिवाय जेब से पैसे खर्च कर के पुस्तक छपाने के। इनकी मान्यता है कि जेब से खर्च करके साहित्यकार साबित होना सरासर बेवकूफी होती है। आसरा रह जाता है केवल साहित्यिक पत्रिकांए व अखबार जहां अपनी ऐप्रोच और सहूलियत के मुताबिक कभी कभार छप जाते है। रही बात प्रतिक्रिया की सो या तो किसी की आती नहीं है और आ जाये तो इनकी समझ से बाहर परे होती है।

एक राज की बात और हैं कि आज दुनिया में जितने भी मुहावरे और लोकोक्तियां हैं वो सब के सब पद्यकारों के रचे हुए हैं जिनको बिचारे गद्यकार प्रायःकर बतौर शीर्षक और उदाहरण के प्रयुक्त करते हैं अब बताओ इन गद्यकारों की अन्तर्व्यथा का और छोर क्या होगा?

पुरूषोत्तम विश्वकर्मा

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