“राधास्वामी” अतुल की कविता - माई

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हुई थी पुलकित सघन, पाकर कोख में मुझे।

रूधिर, मांस, मज्‍जा, अस्‍थि, रहने को देह दी मुझे॥

रूप आगम जब हुआ, आंगन खुशी से भर गया।

मुस्‍काई थी वो विहगंम, पाकर गोद में मुझे॥

झूमते थे नयन उसके, जब कदम मेरे झूमते।

बांह होती मुझको लपेटे, मेरे गिरने ही से पहले।

दुख मेरा था, त्रास उसका।

किलक मेरी उसकी हंसी।

बेखौफ रहता नींद में भी, आंचल में जब सुलाती मुझे॥

बीतते यों दिन रहे पर प्रेम उसका न घटा।

ये संस्‍कार की थी बानगी, जो जीवन आत्‍मनिर्भर जिया।

वेतन जो उसके हाथ देता, निहारती थी मुझे॥

उत्‍कण्‍ठा उसके हृदय जगी, बहू घर आयेगी।

स्‍वप्‍न क्‍यारियां बोई उसने, कि गुलबहार महक उठे।

उसकी खुशी की लहक ने, मुस्‍कान परिचित दी मुझे॥

फिर रूप बदला रंग बदला, कुटिल अवसरों ने ढंग बदला।

जीवन संगनि का प्रेम पा, प्रेम का आधार बदला।

क्रोध ने न शब्‍द तोला, जीवन दायिनी को बोला,

‘‘ये घर है मेरा, मेरा घर है ये, निकल यहां से- निकल यहां से '',

स्‍नेह भरा हाथ खोया वात्‍सल्‍य पूरित अंक खोया,

प्रेम को कर निरूत्‍तर, द्वेष-बीज मन बोया।

खोई गरिमा, भूले रिश्‍ते, आज होता बोध मुझे॥

हॅूं व्‍यथित विचारता, यह मेरा दायित्‍व था,

देह-घर दिया जिसने, उसे निकालने से पहले

उसका दिया यह देह-घर छोड़ना था मुझे॥

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‘‘राधास्‍वामी'' अतुल

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नाम- अतुल कुमार मिश्रा पुत्र श्री अमर नाथ मिश्रा,

पता- 369, कृष्‍णा नगर, भरतपुर (राज0)

 

ईमेल atulkumarmishra007@gmail.com

ब्लॉग http://atulkumarmishra-atuldrashti.blogspot.com/

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1 टिप्पणी "“राधास्वामी” अतुल की कविता - माई"

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