शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

महेन्‍द्र वर्मा की ग़ज़ल

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अकेलापन

यादों के कुछ ताने बाने और अकेलापन,

यूं ही बीत रही दिन रातें और अकेलापन ।


खुद से खुद की बातें शायद खत्‍म कभी न हों,

कुछ मीठी कुछ कड़वी बातें और अकेलापन ।


जीवन डगर कठिन है कितनी समझ न पाया मैं,

दिन पहाड़ खाई सी रातें और अकेलापन ।


जाने कितने लोग चले थे साथ सफर में मेरे,

कुछ अपने से कुछ बेगाने और अकेलापन ।


किसने कहा अकेला हूं मैं देख जरा मुझको,

घेरे रहते हैं सन्‍नाटे और अकेलापन ।


पहले मेरे साथ थे ये सब अब भी मेरे साथ,

आहें, आंसू, धड़कन, सांसें और अकेलापन ।


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- महेन्‍द्र वर्मा, व्‍याख्‍याता, डाइट बेमेतरा, जिला दुर्ग, छत्‍तीसगढ़़ 491335

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(चित्र – सुमन एस खरे की कलाकृति)

2 blogger-facebook:

  1. किसने कहा अकेला हूं मैं देख जरा मुझको,

    घेरे रहते हैं सन्‍नाटे और अकेलापन ।
    लाजवाब गज़ल। धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं

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