पुरुषोत्तम विश्वकर्मा का व्यंग्य : हाय मेरा परीक्षा परिणाम

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मेरे पड़ोसी जी का टप्पू दौड़ा-दौड़ा मेरे घर आया और अखबार मांगा। मेरे हाथ से लगभग झपटकर पहले पृष्ठ पर ही छपी मेरिट सूची में ही अपना नाम और तस्वीर खोजने लगा। जब सूची में नाम नहीं मिला तो सीधा प्रथम श्रेणी आने वालों में अपना रोल नंबर ढूंढ़ने लगा और पूरे रोल नंबर छान मारने के बाद रुआंसा जरुर हुआ मगर धीरे से द्वितीय श्रेणी में अपना रोल नंबर तलाशने लगा । जब नहीं मिला तो रोया तो नहीं मगर उसका धैर्य जवाब अवश्य दे चुका था । फिर थोड़ा दिल कड़ा करके वह डबडबाई आंखों से तृतीय श्रेणी में मगर बडे़ गौर से अपना रोल नंबर खोजा । अब तक उसका हौसला पस्त हो गया था और आखिरी उम्मीद के तौर पर पूरक और रोके गए परीक्षा परिणाम में अपने रोल नंबरों की पड़ताल की ।

उसे अपना रोल नंबर नहीं मिलना था नहीं मिला । आखिरकार उसने अपनी जेब में से अपना प्रवेश पत्र निकाला, अपने रोल नंबर की तस्दीक की और एक बार फिर से रोल नंबरों के नीचे पैन से अंडरलाइन करते हुए बड़ी चौकसी के साथ अपना रोल नंबर ढूंढा । मगर मिलता तो तब न, जब छपता । अब तक टप्पू रो पड़ा था, उसने रोते-रोते कुछ यूं बयान किया । टप्पू बोला, चाचाजी । इस परीक्षा के लिए तो भारत-पाक के क्रिकेट मैच नहीं देखे । रात-दिन पढ़ा । जिस तरह से पेपर किए थे, आने की उम्मीद तो सूची में, मगर प्रथम श्रेणी आने में तो कोई शक शुबहा ही नहीं था । फेल होने के तो कोई चांस ही नहीं थे । एक तो साल भर मेहनत की थी दूसरा अपने स्कूल का रिजल्ट अच्छा रखने की गरज से हमारे इन्वेलिजेटर्स ने पूरे के पूरे प्रश्नों को बोर्ड पर हल करके बताया था । जो प्रश्न उनको भी नहीं आए उनको हमने पासबुक्स की सहायता से हल किया था ।

मैं स्वयंपाठी था, मगर मेरी नकल करने वाले रेगुलर सबके सब पास हो गए हैं। हमारे केन्द्राधीक्षक की साली साहिबा, जिसे अंकों और शब्दों में अपने रोल नंबर लिखना तक नहीं आता था वो द्वितिय श्रेणी से उत्तीर्ण हुई है। मेरे पास वाली टेबल वाला परीक्षार्थी किसी परीक्षा में हाजिर नहीं हुआ था मगर वो तृतीय श्रेणी से उत्तीर्ण हो गया । सुना है वो परीक्षा प्रभारी का भाई था । मैंने सारे के सारे प्रश्न अटेम्पट किए थे मगर मैं पास ही नहीं हो सका। हां, गणित का एक सवाल मुझे उड़नदस्ते में आई मैडम ने बताया था वो गलत निकला । जबकि वो सवाल मैंने सही किया था जिसे उसके कहने पर काटा था।

मैंने उसे समझाया यार टप्पू इतने हताश क्यों होते हैं? अगर इतना पुख्ता यकीन है तो फिर पुर्नगणना करवा लेना, पुर्नमूल्यांकन करवा लेना ,मगर मेरी बात पूरी होने से पूर्व ही टप्पू लगभग दहाड़ मार कर रोते हुए बोला, अंकल ये सब फार्मल्टीज हैं। लोग कहते है, पुर्नमूल्यांकन में कभी-कभी उत्तर-पुस्तिका को छेड़ा तक नहीं जाता केवल सूचना भेज दी जाती है ‘नो चेंज’ और पुर्नमूल्यांकन में परीक्षार्थी को पन्द्रह सैकण्ड में पूरी उत्तर-पुस्तिका देखनी पड़ती है जबकि इतने समय में उत्तर-पुस्तिका देखना तो दूर अपनी उत्तर-पुस्तिका पहचानना भी मुश्किल होता है।

अंकल मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि मेरी उत्तर-पुस्तिकाएं बदली गई है। ऐसा परीक्षा केन्द्र से लेकर उत्तर-पुस्तिकाओं को जांचने तक में कहीं भी हो सकता है। कभी-कभार तो कवर बदलकर ही काम चला लिया जाता है। जरुरत पड़े तो रोल नंबर ही बदल दिए जाते है। फिर उत्तर-पुस्तिकाओं का जांच कार्य भी कौनसा अपना दायित्व समझकर किया जाता है। जिसके गले पड़ जाती है वो बेगार समझकर रगड़ देता है। मेरे पड़ोसी रिटायर्ड टीचर हैं साल में चार-चार बार मनोचिकित्सक के यहां चक्कर लगाते हैं मगर कापियां जांचने का काम अभी नहीं छोड़ा, खुद को ठीक से दिखता नहीं सो कॉलोनी के बच्चों से कापियां जंचवाते हैं। उनकी कापियां जांचने की स्पीड भी कमाल की होती हैं ,ढ़ाई घण्टे में लिखी कॉपी जांचने में वो ढ़ाई मिनट ही नहीं लगाते। वो भी करे तो क्या करे क्यों कि बस इसमें स्वविवेक का प्रयोग तो वर्जित है। ऊपर से निर्देश मिलते है। इतने प्रतिशत द्वितीय श्रेणी, इतने प्रतिशत उत्तीर्ण ,इतने प्रतिशत पूरक । तभी तो जिन कापियों के बण्डल सड़कों पर मिलने की खबरें छपी थी उन कापियों के बोर्ड कार्यालय में न पहुंचने का रिजल्ट पर कोई असर नहीं पड़ा ।

मुझे तो ट्यूशन वाले गुरुजी ने कहा है कि पुर्नमूल्यांकन की फीस की आघी रकम भी अगर खर्च करने को तैयार हो तो कुछ कोशिश कंरु।

पुरुषोत्तम विश्वकर्मा

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