गुरुवार, 8 जुलाई 2010

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य : खण्ड खण्ड विकास का पाखण्ड पर्व

yashwant kothari new (Mobile)

सम्पूर्ण जम्बूद्वीप में खण्ड खण्ड विकास का पाखण्ड पर्व चल रहा है। विकास एक सतत प्रक्रिया है। भारत विकास प्रधान देश है। विकास करा लो। वरना बाद में पछताओगे कि हम विकास से वंचित रह गये। सरकार कोई सी भी हो वो विकास करना चाहती है, आप चाहे या न चाहे विकास होगा, क्योंकि आपके विकास से ही सरकारी अमलें, नेता सरपंच जिला प्रमुखों का विकास होता है। विकास के नाम पर नदियों को जोड़ने की योजनाएं बनी और खटाई में पड़ गयी। विकास के नाम पर ही प्रधानमंत्री स्वर्ण चतुर्भुज योजना बनी, वो सरकार ही चली गयी। विकास के नाम पर योजना आयोग बना, योजनाएं नहीं चली आयोग स्थायी हो गया। बल्कि योजना आयोग का बजट प्लान से नानप्लान में आ गया।

विकास के चक्कर में चार कदम सूरज की और चले और भस्म हो गये। भारत उदय के नाम पर विकास करने के प्रयास हुए सरकार अस्त हो गयी।

आखिर यह विकास नामक बीमारी है क्या मैंने एक जानकार से पूछा-वो कुछ देर चुप रहा फिर बोला जिस कार्यक्रम से कार्यक्रम चलाने वालों का भला होता है उसे ही विकास कहते है। अर्थात विकास जिसका होना चाहिये उसका कभी नहीं होता हैं, विकास हमेशा, विकसित का ही होता है। विकसित देशों का विकास बदस्तूर जारी है और विकासशील देशों का शोषण हो रहा है। भारत को विकासशील देश मानने वालों विकास कहां है। पहले समाजवाद के मार्फत विकास होता था, आजकल पूंजिवाद, खुली अर्थ व्यवस्था तथा वैश्वीकरण के नाम पर विकास हो रहा है। लेकिन वही ढाक के तीन पात।

विकास कभी कभी एक महामारी के रूप में होने लगता है। चुनाव से चन्द महीने पहले विकास की गंगोत्री बहने लगती है और हर कोई इस बहती गंगा में हाथ धोने को आतुर रहता है। कभी कभी विकास की बाढ़ आ जाती है। विकास की स्थिति ऐसी हो जाती है कि एक ही गली में कई कई नल लग जाते है। एक ही सड़क पर कई लाईटे लग जाती है। एक ही शहर में बार बार सड़कें बन जाती है और पड़ोसी शहर में विकास का सूखा पड़ जाता हैं। कारण ये कि पड़ोसी शहर से विपक्षी जीत गया था तो उसे सबक सिखाने के लिए विकास की नदी पर इसी शहर में बांध बना दिया जाता है।

शिक्षा के क्षेत्र में विकास आतंकवाद की तरह बढ़ रहा है, हर गली, मोहल्ले, में विश्वविद्यालय खुल गये है, इन निजि विश्वविद्यालयों में पत्नी कुलपति पति रजिस्ट्रार और बेटी परीक्षा नियन्त्रक ऐसा पारिवारिक विकास भाई वाह।

विकास के नाम पर निजि इन्जीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल डेन्टल कालेज, फॉर्मेसी कॉलेज और फीस मत पूछिये मान्यता नहीं है तो क्या हुआ आखिर विकास की कुछ तो कीमत देनी पड़ती है न। विकास ही विकास। विकास दो। विकास लो। सही संस्थाओं का अता पता ढूंढ़ते ढूंढ़ते छात्र अभिभावक पगला जाते हैं। विकास की चकाचौंध में आंखें चौंधियां जाती है। विकास के लिए शानदार इमारत है, चमचमाती प्रयोगशालाएं है,इठलाती रिसेप्शनिस्ट है, बस डिग्री की मान्यता नहीं है लेकिन ये तो विकास की एक छोटी से कीमत है।

विकास की कीमत है भ्रष्टाचार - भ्रष्टाचार की गंगोत्री भी विकास की तरह ही ऊपर से नीचे की ओर बहती है। विकास चाहते हो तो कमीशन दो। कमीशन लो। विकास स्वतः हो जायेगा। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क परिवहन सभी क्षेत्रों में विकास हेतु सरकार ने भ्रष्टाचार की दरें तय कर दी है। भुगतान करो और विकास का आनन्द उठाओ।

बैंकों का विकास इतनी तेजी से हुआ कि हर वर्ष एक बैंक अपना दीवाला निकाल कर सरकारी बैंक में घुस जाता है। लोन ले लो चुकाना भूल जाओ। आखिर देश का विकास करना है भाई । बड़े बड़े व्यापारी उद्योगपतियों ने अरबों रूपये लिए अपना और परिवार का विकास किया और लोन चुकाना भूल गये । सरकार ने लोन माफ कर दिया या पुराने लोन को चुकाने के लिए नया बड़ा लोन दे दिया भाई वाह विकास हो तो ऐसा। स्वास्थ्य में ऐसा विकास कि मत पूछो डाक्टर बड़े, अस्पताल बड़े मगर रोग और रोगी भी ज्यादा बड़े । मर्ज बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की तर्ज पर विकास भी बढ़ता गया, मर्ज भी बढ़ता गया, मरीज भी बढ़ते गये। बजट भी बढ़ता गया । बजट प्लान से नोनप्लान हो गया विकास की अवधारणा ही बदल गयी ।

अपराध के क्षेत्र में हमने खूब विकास किया अपराधों को सरकारी संरक्षण दिया दागियों को मंत्री बना दिया । तस्कर, बेईमान, हत्यारे, बलात्कारी, आतंकवादी, माफिया, डॉन सरकारों में घुस गये और विकास करने लगे। खुद का, सरकार का मगर जनता का विकास किसी सरकार ने नहीं किया। लाखों करोड़ों का बजट मगर गरीब भूखा, नंगा, बेसहारा, बिना छत के भूखे पेट सोने का मजबूर।

विकास के लिये बहुत कीमत देनी पड़ती है भाई साहब। विकास के लिए हमने देह को एक प्रोडक्ट बना दिया। माध्यमों में राम तेरी गंगा मेली कर दी। हर तरफ देह ही देह, देह है तो विकास है। विकास के कारण हमने गांवों को कस्बा बना दिया। कस्बों को नगर बना दिया, नगरों को महानगर बना दिये, सड़कों के जाल फैला दिये और इन गांवों कस्बों को अपराधियों के हवाले कर दिया। आजादी के 57 वर्षो बाद भी विकास पता नहीं किसका हो रहा है ? चमड़े का ताला और कुत्ता रखवाला । दूध जलेबी पर बिल्लियों का पहरा यही है विकास का असली चेहरा।

स्वंयसेवी संस्थाओं के विकास के क्या कहने। ये झोला छाप बुद्धिजीवी महंगी कार, विदेश यात्राओं को ही विकास समझते है। अंग्रेजी में रिर्पोट बनाकर पेश की । नया बजट पास कराया और फाइवस्टार में डिनर कर विकास को नया जामा पहनाया।

साहित्य, संस्कृति और कला के क्षेत्र में विकास के क्या कहने। सरकार ने अकादमियां, परिषद, कला केन्द्रों का ऐसा मायाजाल फैलाया कि साहित्य, कला और संस्कृति तो गुम हो गये और विकास हावी हो गया अकादमी अध्यक्षों में ऐसा घमासान मचा कि सब देखते रह गये। गरीब साहित्यकारों, कलाकारों, नाटककारों के नाम पर आया पैसा अकादमी के सचिव और कमेटी वाले जीम गये । वार्षिक सम्मान समारोह अपमान समारोह हो गये और पुरस्कारों की लड़ाईयां अदालतों में लड़ी जाने लगी। ऐसा विकास से भगवान बचायें।

विकास की कथा अनन्त है और लेखनी सीमित अतः हे पाठकों विकास की गंगा में हाथ धो लो । विकास ले लो। टोकरी में भर लो। फिर मत कहना हम अविकसित रह गये, हमें खबर ना हुई, विकास कब आया और कब चला गया।

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यशवन्त कोठारी

86, लक्ष्मीनगर ब्रह्मपुरी बाहर

जयपुर 302002

फोन 2670596

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