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सुनील संवेदी की कविता : बड़ी हो गई बिटिया

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उन्हें-

पड़ोस की वह

छोटी सी बिटिया बहुत अच्छी लगती थी।


वह उसे-

बिटिया ही कहते थे

सुंदर, लाडली, मासूम बिटिया।


और बिटिया-

‘बिटियों’ के साथ ’बिटिया’ नहीं,

’बड़े’ के साथ ’बड़ा’ बन जाना चाहती थी।


बड़े सपने, बड़ी बातें, बड़ा सोचना,

बड़ा सुनना, बड़ा सुनाना, बड़ा देखना

बड़ा दिखना, बड़ी कहानी, बड़े गीत

बड़ा राजा, बड़ी रानी

हां... एक छोटी सी राजकुमारी बस्स...

’बड़े’ का तो मुंह ही

’बड़ा’ कर देती थी।


बड़े खड़े होते तो-

कमर के आस-पास के कद को

पंजों पर उचकाती,

देखो न, मैं बड़ी हो गई हूं।


और बड़े-

उसे, अपने शांत आलिंगन में समेटकर

बस्स, चूमते ही चले जाते।


या कि, तुम गोद में बैठी रहो,

न, मैं तो न बैठती

अब बड़ी हो गई हूं, देखो।


अपनी झालरदार फ्रॉक पकड़ती

और, झूमने लगती,

बड़े, एकटक निहारते रहते।

बिटिया कभी-कभी

छोटी सी बात भी कह देती,

आप, मेरे पापा से अच्छे हैं,

आप, मेरे पापा होते

मेरे पास रहते

मुझे प्यार करते।


कि, बड़े सकपका जाते

बड़ी-बड़ी बातें सिखाने लगते।

मम्मी कहती-

बिटिया, अधिक न जाया करो वहां।

कि, ऊं हू मम्मी

आप और पापा का घर आफिस

और मेरा!

मम्मी सकपका जाती।


एक रात-

एक अंधेरे कोने में दुबकी

सिसक रही थी,

उसकी झालरदार फ्राक,

और चड्डी, मुंह में ठुंसी

मना रही थी मातम

लाज न बचा पाने का।


बड़ी-बड़ी आंखें, बड़ी-बड़ी

बिटिया वाकई बड़ी हो गई।

और बड़े-

लापता हो गए थे।

----

 

द सुनील संवेदी

उपसंपादक, हिंदी दैनिक जनमोर्चा

54, सिविल लाइंस, बरेली,यूपी

email-

bhaisamvedi@gmail.com

suneelsamvedi@rediffmail.com

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uf ant itna kadaa likh diya ki ki komal-si ek kavita padhte hue sataak se ek koda dilo-dimaag par aa lagaa jaise.....jhajhor diya ....mujhe is kavita ke ant ne........

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