मंगलवार, 13 जुलाई 2010

पुरुषोत्तम विश्वकर्मा का व्यंग्य : पिटे विधायक

चाचा दिल्लगी दास अखबार की किसी खबर पर नजरें गड़ाए गड़ाए ही बड़बड़ाते जा रहे थे कि क्या जमाना आ गया है कि लोग विधायकों तक को पीट देते है और फिर शिकायत करते हैं कि विधायक लोग जीत कर जाने के बाद चुनावों से पहले शक्ल ही नहीं दिखाते। अब तुम ही बताओ कौन सिर फिरा होगा जो यूं बिना गिनती के लात घूंसे खाने की जोखिम उठायेगा। चाचा एक छोटा सा ब्रक ले कर बोले कि लग तो यूं रहा है मानो जैसे हमारे यहां कानून व्यवस्था जैसी कोई चीज मौजूद ही नहीं रही ।

हमारे मुल्क में लोग अपने हाथ पांव आजमा कर देखते वक्त गौर तक नहीं करते कि उनका शिकार है कौन और विधायक लोग यह भूल जाते है कि यह आम जगह है कोई विधानसभा भवन नहीं कि मार्शल बाजू पकड़ कर पिटने से बचा ले जाएंगे या जब चाहे पार्टी व पार्टी के सहयोगी दलों के लोग तरफदारी करने आ जाएंगे। उन्हें ध्यान रखना हैं कि यह आम आदमी को अपनी मिल्कीयत है जहां उसकी अपनी ही हकूमत चलती है और इसने यहां कई सूरमांओं, शहनशाओं को धूल चटाई हैं।

. मगर जो कुछ भी हुआ उसे किसी सूरत में अच्छा तो नहीं कहा जा सकता बल्कि बहुत बुरा हुआ और जो आगे इसकी पुनरावृत्ति होती है तो अच्छा कतई नहीं होगा । यूं सरेआम किसी विधायक का जबरन पीटना कोई अच्छा शगुन तो नहीं इस इकसठ साला बुढ़ऊ प्रजातंत्र के भविष्य की रुपरेखा के क्रम में। इसके साथ-साथ इस घटना ने यह और प्रमाणित कर दिया कि भूख, गरीबी, बेरोजगारी, आंतकवाद, प्राकृतिक आपदाओं, मौसमी बीमारियों व नाना प्रकार .की स्वदेशी व आयातित महामारियों, नकली दवाओं व मिलावटी खाद्यान्न व मसालों, भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं से जूझता व्यक्ति अभी तक टूटा नहीं है और वो केवल वोट की चोट करने का माद्दा ही नहीं रखता बल्कि लातों घूसों का इस्तेमाल कर सुलभ, सस्ता व शीघ्र न्याय प्राप्त करना भी बखूबी जानता है। . .

चाचा खासे चिन्तित से लगने का सा उपक्रम करते हुए बोले कि आगे चलकर यह विधायक का पिटना काफी बङा रुप ले सकता है। विधानसभा में इनका श्रेणी विभाजन हो सकता है पिटे विधायक, पिटने से रह गए विधायक और निकट भविष्य में शीघ्र ही पिटने वाले विधायक। अगर सरकार को सद्बुद्धि आई तो विधायकों के सरकारी आवास व गाड़ी पर भी इस आशय की तख्ती लगवा सकती है। किसी पार्टी की छवि इस आधार पर भी आंकी जा सकती है कि उसमें पिटे व बिना पिटे विधायकों का अनुपात क्या है। चाचा जाते-जाते कह गए कि जो कुछ भी हो ये विधायक को पीट डालने वाला कृत्य प्रशंसनीय कतई नहीं है उस पीटने वाले शख्स के लिए मेरे हृदय में भी सहानुभूति का ज्वारभाटा सा गतिमान है शीर्षस्थ नेताओं से लेकर छोटे-मोटे कार्यकर्ताओं तक को जगह-जगह धरना प्रदर्शन कर इसका नैतिक विरोध करना चाहिए क्योंकि अगर यह एक पहल हुई तो ये विधायकों के पीटने का सिलसिला चल पड़ेगा। प्रजा पिटे विधायक पार्टी के पिटे विधायकों से बुरे होते हैं।

पुरुषोत्तम विश्वकर्मा

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