विजय कुमार वर्मा की हास्य कविता : परतंत्रता-दिवस

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 hasparihas
अपनी शादी की पहली साल-गिरह पर 

श्रीमतीजी बोली चहककर

ए जी!बड़ी धूम-धाम से मनाऊँगी

अपनी शादी की साल-गिरह .

पति-परमेश्वर ने किया जिरह--

हे बाले!

तू मना ले.

मुझे कुछ अच्छा नहीं लगता,

झूठ बोलू तो नरक  जाऊं

सब अपनी स्वतंत्रता-दिवस मनाते है

मै परतंत्रता-दिवस क्यूँ मनाऊँ?

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विजय कुमार वर्मा ,बोकारो थर्मल,ड़ी एम् ड़ी ३१/बी

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v k verma
vijayvermavijay560@gmail.com

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1 टिप्पणी "विजय कुमार वर्मा की हास्य कविता : परतंत्रता-दिवस"

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