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प्रभा मुजुमदार की लंबी कविताएँ

विश्व विजयी

जिनका धर्म है
केवल जीतना
वे तो जीतेंगे ही
किसी भी कीमत पर
वे जान दे देंगे अपनी
जान ले भी लेंगे
मेरी / तुम्हारी
किसी भी और की
वे नहीं सहेंगे रुकावटें
अपने रास्ते में
सभ्यता / न्याय
अथवा विवेक की
उन्हें केवल
हाँ सुनने की आदत है
वे काट देंगे जुबानें
ना कहने वालों की
गर्दनें नाप देंगे
इन्कार में हिलने पर
उन्हें चाहिये शरणागत
दंडवत मुद्रा में
सिर झुकाये
कृतज्ञता का भार लिये
याचना की गुहार लिये
अपने वजूद के लिये
लड़ने वालों को
कुचल देंगे वे
स्वाभिमान से
तने लोगों को
मिटा देंगे
दुनिया के नक्शे से
हवा में गूँजती
फुसफुसाहट ही काफी है
मिसाइलें छोड़ी जाने के लिये
बम और ग्रेनेड
पूरी कौम को
खत्म कर देने के लिये
धरती और आकाश के बीच
फैले साम्राज्य में
बगावत की आँधी
षड़यंत्रों के तूफान
असहमति के भूचाल
आने से पहले ही
मिटा देंगे वे
धरती पर से इंसानों को।

महायुद्ध के पूर्व

फिर छूट रहा है
गांडीव  . . . .
मेरे हाथों से
और कृष्ण !
इस बार मत उलझाओ मुझे
व्यर्थ शब्द प्रपंच में
मत करो
कर्मों और धर्मों की
व्याख्या
नश्वर और निरंतरता के बीच
कितनी कितनी
मनस्थितियों से होकर
गुजर चुका हूं मैं
कितने ही शत्रु
अपनी सेना में
और कितने ही मित्रों को
दुश्मन के खेमे में
देख रहा हूं
मैं अकेला नही
वे सब के सब
उतने ही भ्रमित हैं
असमंजस में हैं
पता नहीं
कब किसका बदला लेने
किस वक्त का का कर्ज चुकाने
तो कोई महज
धर्म / जाति या रिश्ते के नाम
उकसाया जाने पर
खड़ा है आज
अनजानी / अनचाही
भीड़ के साथ
युद्धोन्माद में
सिर से पैर तक
डूबे होने के बावजूद
बार बार
उठते हैं कुछ सवाल
जो नहीं सुलझेंगे
ज्ञान और दर्शन की
खोखली बातों से
मुझे भी मालूम है
इन पुतलियों को
नचाने वाले हाथ
इन जमूरों को
कलाबाजी के लिये
उकसाने वाली आवाज
इन लुटे पिटे प्यादों को
शहादत के लिये
भड़काने वाले दिमाग
यहीं नेपथ्य में कहीं  हैं
बंद कक्ष के भीतर
रचे जाते कुचक्र
लंबी मंत्रणाएं
हम सब
उसी साजिश के शिकार
                वरना क्या बिगाड़ा है
                मैंने उनका
अथवा उन्होंने मेरा
जो हम मरने मारने का
संकल्प लिये खड़े हैं
हाथों में अलग अलग झंडे लेकर
नहीं होगा मुझसे फिर
दो सूर्यास्तों के बीच
अग्नि दहन का स्वांग
अपने मासूम बेटे को
अधूरा  ज्ञान देकर
नहीं भेज सकता
फिर एक बार
खूंखार पशुओं की माँद में
चक्रव्यूह भेदने के नाम
नहीं कर सकता
अपने वाणों से प्रहार
किसी अस्त्रहीन पर
शिखंडी की ओट लेकर
अपराध बोध को
जिंदगी भर
नहीं ढोना है मुझे
धर्म और अधर्म की
तुम्हारी व्याख्यायें
समाधान नहीं देती
इस बार मन को
मोहग्रस्त नहीं मैं
स्वार्थी और संकुचित भी नहीं
दूर दूर फैली सेना में
योद्धाओं के वेष में सजे
मासूम बच्चों के चेहरे पर
मौत मंडराती दिखती है मुझे
अस्त्र और शस्त्र
भांजते हैं वे
अगले ही पल की
अनिश्चितता से जूझते हुए
किसका है निहित स्वार्थ
एक समूची पीढ़ी को
खत्म कर देने में
आकाश और
पृथ्वी के बीच
सब कुछ तहस नहस कर देने में
इतिहास के पन्नों पर
अमर होने की बजाय
मैं जीना चाहता हूं
जिंदगी के उन पलों को
अपनों के बीच
खून की बहती नदियाँ
क्षत विक्षत
लाशों पर मंडराते
पक्षियों के झुंड
जहरीली गैसों के बादल
हताहतों की कराहें
परिजनों के विलाप
सब कुछ
आँखों के सामने है अब भी
मुझे मालूम है कि
तुम्हारे तरकश में
अब भी बहुत से तीर बाकी हैं
मैं एक योद्धा
सफेद को सफेद
और स्याह को स्याह देखने वाला
नहीं आते मुझे
कूटनीति के पाठ
धर्म और अधर्म की मीमांसा
पाप और पुण्य की
व्याख्या   . . . .
समय के इस पल लिये
निर्णयों से जुड़े
दूरगामी बदलावों को
मैं समझना चाहता हूं ।

सूखती नदी के बीच

ठहरी हुई
चट्टानों से गुजरकर
एक नदी आगे बढ़ती है
वक्त की
अन्तहीन / अनिश्चत यात्रा की ओर
रचती है इतिहास
भूगोल की रेखाएं
अनजाने / अनचाहे
गंदे और प्रदूषित नालों को
आत्मसात करने की
विवशता के बावजूद
उसकी भरसक कोशिश
उजला रंग
और पारदर्शी चरित्र
बनाये रख सकने की
विकास की यात्रा में
एक सदी
अपने चेहरे पर की
तमाम कालिख
नदी की पवित्रता को
सौंप कर
निष्कलंक हो जाना चाहती है
जहर उगलते धुएं के बीच
अनुष्ठान सा कुछ रच के
अपने भीतर की दुविधा से
मुक्ति चाहती है  . .
बदरंग होते पानी में
खत्म होते वनस्पतियों के
दुःख से आहत
सूखती है नदी
और उसके बीच
उग आते हैं
कितने रेतीले टापू
और देखते ही देखते
बहती हुई नदी की जगह
कंटीले रेगिस्तान
बसते जा रहे हैं
मेरे इर्द गिर्द।

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