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दीप्ति परमार का आलेखः नारी स्वातंत्र्यता और मृदुला गर्ग की कहानियाँ

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आज नारी एक ओर परंपरागत संस्कारों को ढो रही है तो दूसरी और अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने के लिए छटपटा रही है। इस बदलती नारी को रेखांकित करने का एक सशक्त माध्यम महिला लेखन है। कहानी साहित्य के जन्म से ही हिन्दी में महिला लेखिकाएँ कहानी लेखन कर रही है। द्विवेदीकाल की ‘बंग महिला’ हिन्दी की प्रथम मौलिक कहानी लेखिका है। ‘दुलाईवाली’ उनकी प्रसिद्ध कहानी है। इससे यह स्पष्ट है कि आधुनिक हिन्दी कहानी के आरंभिक काल से ही महिला लेखिकाएँ इससे न केवल जुड़ी हुर्इ्र हैं, अपितु हिन्दी कहानी की विकास यात्रा में ‘मील का पत्थर’ बनने का गौरव एक महिला लेखिका को प्राप्त हुआ है।

सन साठ के बाद हिन्दी कहानी साहित्य एक अलग विकसित मोड़ का निर्माण करता दिखाई देता है। इस समय कई महिला लेखिकाओं ने अपनी योग्यता सिद्ध की और अपना महत्व प्रस्थापित किया। मन्नू भंडारी, उषा प्रियम्वदा, सुधा अरोड़ा, सोमा वीरा, कृष्णा सोबती, ममता कालिया, महेरुन्निसा परवेज., कृष्णा अग्निहोत्री,मुंजल भगत, दीप्ति खंडेलवाल, मृणाल पांडे, नमिता सिंह, मालती जोशी आदि ने हिन्दी कहानी के विकास में जो योगदान दिया वह हिन्दी कहानी की मूल्यवान संपदा सिद्ध हुआ है । इन सभी में मृदुला गर्ग की कहानियों का एक विशेष नाम और स्थान है।

जनवरी 1972 के कहानी नववर्षांक में मृदुला गर्ग की कहानी ‘कितनी कैदें’ पुरस्कृत हुई। सन 1975 में प्रकाशित प्रथम कहानी संग्रह ‘कितनी कैदें’ से लेकर ‘मेरे देश की मिट्टी आहा’ तक उन्होंने लंबी कहानी यात्रा तय की है।

मृदुला गर्ग का लेखन उन्हें एक स्त्री वादी लेखिका के रूप में प्रस्तुत करता है। आठवें दशक के प्रारंभ से ही जब नारीवादी विमर्श कथा साहित्य में इतनी मुखरता और प्रमुखता से नहीं आया था मृदुला गर्ग की कहानियाँ नारी स्वातंत्र्य का प्रश्न बहुत स्वाभाविक एवं ठोस रूप में बिना किसी शोर और हंगामें उठाती है। सामाजिक समानता के विषय में मृदुला गर्ग के विचार है ‘‘मैं समझती हूँ कि हर प्रकार की सामाजिक विषमता दूर करने का सबसे कारगर उपाय एक ही है, चाहे वह स्त्री पुरुष के बीच हो या स्त्री स्त्री के बीच, वह है अवसर की समानता। ’’1

अपनी कहानियों में मृदुला गर्ग द्वारा नारी के स्वतंत्र अस्तित्व और अस्मिता की पक्षधरता में उठाये गये प्रश्न समाज के सभी वर्गों की नारियों के संदर्भ में उठाये गये हैं। उच्चवर्गीय, मघ्यवर्गीय और निम्नवर्गीय नारी सभी उनकी लेखनी से जुड़ी हुई हैं। मृदुला गर्ग की कहानियों का सबसे बुलंद स्वर नारी स्वातंत्र्य का रहा है। सदियों से पुरुष सर्वोच्चवादी समाज में नारी अत्याचार, शोषण और विविध प्रताड़नाओं से पीडि.त रही है। इन कहानियों की नारी न केवल प्रदत स्थितियों का कड़ा विराध करती है, अपितु अपने ‘स्व’ के प्रति जागरुक, अपने आपको स्वतंत्र रूप से स्थापित करने की क्षमता एवं सामर्थ्य से युक्त है। अब उसे किसी की सेविका बनकर उसका दया भाव स्वीकार्य नहीं है। नारी रूप का यह बदला तेवर मृदुला गर्ग की कहानियों में साफ सुनाई देता है। यह नारियाँ अपने अधिकारों एवं वैचारिकता को प्राथमिकता देती है, स्त्री पुरुष संबंध में किसी भी प्रकार के छल को बर्दाश्त नहीं करती है, इसलिए उसकी कथनी और करनी में एक प्रकार का खुलापन है।

नारी स्वातंत्र्यता विमर्श प्रस्तुत करती यह कहानियाँ विवाह संस्थान की उपादेयता को पुनःपरिभाषित करने पर जोर देती है। मृदुला गर्ग के लेखन के शुरुआती दौर में ही उनकी नायिकाओं ने विवाह संस्था के बेमानी हो जाने, उसमें स्त्री के स्वतंत्र व्यक्तित्व के बाधित होने की भावना को ही अभिव्यक्ति नहीं दी अपितु प्रदत स्थितियों को नकारते हुए अपने व्यक्तित्व को पूरी तरह स्वमान के साथ स्थापित करने का दृढ. मनोबल और निर्णय दर्शाया है। इस दृष्टि से ‘खरीदार’, ‘एक और विवाह’, ‘तुक’, ‘हरी बिंदी’, ‘कितनी कैदें’,‘मीरा नाची’ आदि कहानियाँ विशेष महत्त्वपूर्ण है। संपूर्ण स्वस्थता एवं बौद्धिकता से स्त्री ने जब अपने अधिकारों एवं सामाजिक स्थिति पर विचार किया तो उसे लगा कि विवाह संस्था उसके स्वतंत्र व्यक्तित्व को बुरी तरह अपने कबजे में ले रही है। आधुनिक युग में नारी किसी भी रूप में पुरुष से हीन और कमजोर नहीं है। नारी चाहे तो क्या नहीं कर सकती। वह अपनी योग्यता के बल से पुरुष को आदेश भी दे सकती है। ‘खरीदार’ कहानी में नायिका नीना विवाह संस्थान के परंपरागत ढांचे को चुनौती देती है। अपनी संकल्पशक्ति के बल से आगे बढ़कर असिस्टेन्ट कमिश्नर और आगे पदोन्नति प्राप्त करके गृहमंत्रालय में संयुक्त सचिव के पद पर बैठी नीना अपने प्रेमी सुनील के यह पूछने पर कि ‘‘नीना जी आपने अब तक विवाह क्यों नहीं किया ?’’2 नीना उत्तर देती है - ‘‘तुम तो ऐसे पूछ रहे हो जैसे कोई कहे आज खाना क्यों नहीं खाया ? यह भी कोई अनिवार्य क्रिया है क्या ?’’3

‘एक और विवाह’ कहानी में भी मूदुला गर्ग ने विवाह संस्थान पर कुछ प्रश्न उपस्थित किये है। कहानी की कोमल विवाह के विषय में कहती है -‘‘मैं व्यवस्थित विवाह में विश्वास नहीं करती, वह विवाह नहीं है जबरदस्ती किसी का पल्लू पकड़ लेना होता है। दो कारणों से ऐसा करने की आवश्यकता पड़ सकती है, आर्थिक अवलंबन की खोज या शारीरिक भूख। पहले की कम से कम हमें जरूरत नहीं है और रहा दूसरा तो उसके लिए विवाह के बंधन की आवश्यकता नहीं है। बेहतर है मुक्त प्रेम जो बासी होने पर फेंक दिया जा सकता है। विवाह तब करना चाहिए जब पुरुष को उसके बिना सब अर्थहीन मालूम पड़े और स्त्री उसके बिना भी पूर्ण समर्पण के लिए व्यग्र हो, तभी वास्तविक ऐक्य हो सकता है।’’4 कोमल को इस बात से एतराज है कि उसका भावी पति मदन उसके गुणों की तारीफ कुछ इस प्रकार कर रहा है जैसे वह किसी कंपनी का शेयर हो। न ही उसे बिना इच्छा की परवाह किए चुंबन ही पसंद है। वह इस बात से क्षुब्ध है कि उसका पति उसकी इच्छाओं का सम्मान किए बिना किसी उत्पाद कमोडिटी की तरह उसका इस्तेमाल कर रहा है। प्रथम रात्रि के प्रथम मिलन को जब कोमल एक उत्सव के रूप में मनाने का उपक्रम करती है तो अगली सुबह पति की यह टिप्पणी- ‘‘वाह, तुम तो अमेरिकन स्त्रियों को भी मात करती हो।’’5 उसे हतप्रभ कर जाती है।

ऐसा नहीं है कि मृदुला गर्ग की कहानियों की स्त्री अपने को भारतीय आदर्शों की महिमा मंडन से गौरवान्वित कर पति नामक जीव में बुराइयाँ ही तलाशे और अपना पक्ष मजबूत करती रहे, वह तो वस्तु स्थिति को पूर्णतः स्वीकार ने की हिंमत से पूर्ण है। ‘तुक’ की नायिका कहानी के प्रारंभ में ही सूचित करती है -‘‘अपने बारे में दो बातें आपको बतला दूँ। पहली यह कि मैं उन बेवकूफ औरतों में से हूँ जो अपने पति से प्यार करती है। या कहना चाहिए कि मैं उन बेवकूफ औरतों में से हूँ जो अपने पति को प्यार करती है। मेरी शादी को छह महिने हो चुके है और इस बीच मैं बहुत सी शादी शुदा औरतों से मिल चुकी हूँ। अपने सिवा मुझे कोई औरत नहीं मिली, जो अपने पति को दिल से चाहती हो।’’6 भारतीय विवाह संस्थान से उत्पन्न पत्नी की स्थिति के विषय में उसकी सोच हैं- ‘‘पति का होना उनके लिए एक स्थिति है, जिसके भीतर से कुछेक सुखदायक स्थितियाँ पैदा होती है, जैसे बच्चों का होना, घर का होना और अपनी तरह के जोड़ो के साथ सामाजिक ताल्लुकात होना। पति का होना उसके लिए एक तरह का व्यवसाय है, जिनके माध्यम से उन्हें पैसा और व्यस्तता दोनों मिलते है।’’7 नायिका मीरां देह मन से न मिलने के कारण हर रात वह अपनी देह का पुरस्कार या नुकसान की तरह हुआ प्रयोग अनुभव करती है।‘‘मेरी समझ में आ गया कि उसके लिए ताश का खेल भी बैंक में नौकरी की तरह एक व्यवसाय है और मैं फुटकर कैश, जिसका प्रयोग वह व्यवसाय में हुए नुकसान को भरने के लिए या लाभ पर खुशी मनाने के लिए करता है।’’8

परंपरागत विवाह द्वारा स्वतंत्रचेता स्त्री को उसकी इच्छानुकूल साथी नहीं मिलता तब ऐसी स्थिति में उसका दाम्पत्य जीवन भार रूप बन जाता है। ‘ग्लेशियर से’ कहानी की मिसेज दत्ता सोचती है - ‘‘हर औरत के लिए मुनासिब नहीं है कि वह अपने से चौथाई दिमाग वाले आदमी से शादी करके उम्र भर उसके कहे जुमले दुहराती हुई जिए जो उसने बासी किताबों से चुरायें हो।’’9 ऐसी वैवाहिक मान्यताओं के साथ जीती यह नारी प्रेम और दाम्पत्य के बीच डूबती उभरती रहती है।

सिर्फ शारीरिक स्तर पर मौजूद पति पत्नी के वैवाहिक सम्बन्धों की मृदुला गर्ग ने तीव्र आलोचना की है। साथ ही लेखिका ने उसी दाम्पत्य को काम्य माना है जिसमें स्त्री और पुरुष दोनों के स्वतंत्र अस्तित्व की स्वीकृति हो। ‘एक और विवाह’, ‘ग्लेशियर से’, ‘हरी बिंदी’, ‘मिजाज’ आदि कहानियाँ इन स्थितियों को बार बार नए नए कोणों और पहलुओं से उठाती है।

‘मेरा’ मृदुला गर्ग की संतान के निर्णय के विषय में नारी की निजता, स्वतंत्रता के प्रश्न को सचोट ढंग से निरूपित करती है। मीता के पति महेन्द्र को जब यह पता चलता है कि मीता माँ बननेवाली है तब महेन्द्र क्रूरता से उस संभावना को नष्ट करना चाहता है किन्तु मीता शीशु को जन्म देना चाहती है। इस विषय में महेन्द्र मीता को दोषी ठहराता है कि ‘वह गोली खाना कैसे भूल गयी ?’ महेन्द्र आने वाले बच्चे को अपने भविष्य के लिए बाधक समझता है। अतः वह चाहता है कि मीता गर्भपात करा लें। संतान को इस संसार में लाना है या नहीं, गर्भपात करवाना है या नहीं इसके निर्णय की भूमिका में महेन्द्र अपनी इच्छाओं को सर्वोपरि मानता है। जब डॉक्टर गर्भपात को स्त्री का निज मामला बताते हुए सिर्फ मीता के निर्णय के विषय में पूछती है तब मानो मीता के हाथों में निर्णय की दौर आ गयी। वह गर्भपात न कराने का निर्णय पति महेन्द्र और स्वयं की माँ के विरुद्ध में जाकर लेती है। मीता को अपना गर्भ सिर्फ ‘मेरा और मेरा ही लगता है। गर्भपात न कराने का मीता का यह दृढ. निर्णय उसे शांति देता है।‘‘पर उस शांति में निष्क्रियता नहीं निर्णय झलक रहा है। तुष्टि का ऐसा भाव है, जो पर्वतारोही के मुख पर दुर्गम पर पहुँच जाने पर खिल आता होगा।’’10 यह कहानी नारी चरित्र के एक नये आयाम को उद्धाटित करती है।

मृदुला गर्ग ने अपनी कहानियों में नारी की स्वतंत्रता के प्रश्न को ही नहीं उठाया अपितु उसे निर्णय शक्ति से युक्त भी दिखाया है। इस दृष्टि से उनकी ‘मेरा’ के साथ ‘हरी बिंदी’, ‘तीन किलो की छोरी’, ‘मिजाज’, ‘खरीदार’ आदि कहानियाँ भी विशेष महत्त्वपूर्ण है।

‘कितनी कैदें’ मृदुला गर्ग की चर्चित मनोवैज्ञानिक कहानी है। कहानी की नायिका मीना विवाह के पूर्व हुए बलात्कार से यौनग्रंथि की शिकार है। अतः वह विवाह के बाद अपने पति मनोज के साथ शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करने में घबराहट और निष्क्रियता का अनुभव करती है। उसकी यह ग्रंथि तब खुलती है जब कोयना बाँध में भूचाल की भयंकर त्रासदी धटित होती है और मीना अपने पति के साथ लिफ्ट में बंद हो जाती है। ऐसे समय में आसन्न मृत्यु और दहशत का माहौल उसमें भय और वासना का संचार कर देता है। कामावेश थम जाने पर वह मनोज को अपने उस अतीत की धटनाओं के विषय में बताती है जिसके कारण वह कोल्डनेश की स्थिति तक पहुँची थी। अतीत की घटना का पूरा ब्यौरा मनोज को सुनाकर वह लिफ्ट से ही नहीं बल्कि जिन्दगी की कैद से बाहर निकलकर मुक्ति का अहसास करती है। पुरानी यादों की कैद से आजाद हो कर वह मनोज के साथ जिन्दगी शुरू करना चाहती है। परन्तु यहाँ कहानी खतम नहीं होती। यहाँ से पति के रूप में मनोज की दुविधा और उद्विग्नता शुरू होती है। पति का उसके अतीत से परिचय क्या उसे सहज दाम्पत्य जीवन जीने देगा, क्या फिर मीना कितनी कैदों में तो नहीं घिर जायेगी ? इस प्रश्न पर कहानी में पति पत्नी के संभावित दरारपूर्ण सम्बन्धों का संकेत मिल जाता है।

मृदुला गर्ग की कहानियाँ नारी स्वातंत्र्य के प्रश्न को यथार्थ एवं आडम्बरहीन रूप में उठाती है। साथ ही यह कहानियाँ स्त्री विमर्श को अनेक संदर्भों में प्रस्तुत करती है। नारी स्वातंत्र्य, अस्तित्व एवं अस्मिता के संदर्भ में उठाये गये विभिन्न प्रश्न मृदुला गर्ग की कहानियों को एक विशेष पहचान देते है।

संदर्भ- 1 ‘संचेतना’ दिसम्बर 1996 मृदुला गर्ग के लेख ‘आज की भारतीय स्त्री’ से पृष्ठ 22 2

संगति विसंगति मृदुला गर्ग ‘खरीदार’ पृष्ठ343 3

संगति विसंगति मृदुला गर्ग वही पृष्ठ343 4

संगति विसंगति मृदुला गर्ग ‘एक और विवाह’ पृष्ठ28 5

संगति विसंगति मृदुला गर्ग वही पृष्ठ 36 6

संगति विसंगति मृदुला गर्ग ‘तुक’ पृष्ठ325 7

संगति विसंगति मृदुला गर्ग वही पृष्ठ325 8

संगति विसंगति मृदुला गर्ग वही पृष्ठ330 9

संगति विसंगति मृदुला गर्ग ‘ग्लेशियर से’ पृष्ठ294 10

संगति विसंगति मृदुला गर्ग ‘मेरा’ पृष्ठ238

सम्पर्क- डॉ दीप्ति बी परमार प्रवक्ता-हिन्दी विभाग श्रीमती आर आर पटेल महिला महाविद्यालय राजकोट

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ड़ॅ।. ललि‍त पंडया
म़दुला गर्ग की कहानि‍यें। के द्वारा डॅ।. दीप्‍ि‍त जी ने भारतीय नारी के
बदलते तेवर को मुखरि‍त कि‍या है। नारी स्‍वातंत्रय और समानत। की
पक्षधरता में प्रस्‍तुत वि‍चारां के लि‍ए बधाई ।

[‘‘मैं उन बेवकूफ औरतों में से हूँ जो अपने पति को प्यार करती है। मेरी शादी को छह महिने हो चुके है और इस बीच मैं बहुत सी शादी शुदा औरतों से मिल चुकी हूँ। अपने सिवा मुझे कोई औरत नहीं मिली, जो अपने पति को दिल से चाहती हो।’]
मानव ने जब से जन्म लिया है पृथ्वी पर, तब से यह बात पुनः पुनः स्थापित हो चुकी है कि स्त्री हो या पुरुष, स्वतंत्रता निजता में होती है, वह औरों का अनुसरण करने में नहीं होती। अगर पुरुष हो और उसे लगे कि वह उन बेवकूफ लोगों में है जो अपनी पत्नी को दिल से प्रेम करते हैं और अगर स्त्री हो और उसे लगे कि वह उन बेवकूफ स्त्रियों में से है जो पति को दिल से प्यार करती हैं तो ऐसे स्त्री और पुरुष कहीं से भी स्वतंत्र नही हैं जब वे अपनी निजता का ही सम्मान नहीं कर सकते और समितियों और संगठनों जैसे परतंत्रता को बढ़ावा देने वाले मानव प्रवृत्तियों में स्वतंत्रता खोज रहे हैं तो इसे बेवकूफी तो नहीं किंतु चेतना का अभाव जरुर कहा जा सकता है। हरेक का जीवन अलग है, उसके लिये परिभाषायें अलग हैं, स्वतंत्रता की परिभाषा भी वही नहीं है जो पड़ोसी के लिये है।

शोध छात्रों के अत्यंत ही उपयोगी जानकारी । धन्यवाद........

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