हरीश नारंग की हास्य कविता – दफ़्तर पुराण

दफ़्तर पुराण

हरीश नारंग harish narang

इकतारा बोले तुन तुन

क्या कहे ये तुमसे सुन सुन

बात है सच्ची, मतलब साफ़

लगे बुरी तो करना माफ़,

फिर उसके ----तक धुन धुन धुन

कुछ ऐसे बाबू होते हैं

जो दफ़्तर आ कर सोते हैं

सारा दिन मौज मनाते हैं

फिर ओवरटाईम को रोते हैं

जब बिल न उनका पास हुआ

तब मूड का सत्यानाश हुआ

फिर उसके ----तक धुन धुन धुन

दो रूपी अफ़सर होते हैं

कभी सख्त तो कभी नरम होते

कभी सबसे हंस के बात करें

कभी बात बात पे गरम होते

इनको तो हुआ जिस से भी गिला

बस सबको उसको मीमो मिला

फिर उसके ----तक धुन धुन धुन

कुछ ऐसे भी हैं चपड़ासी

जो आफ़त हैं अच्छी खासी

कभी कोई न कहे कुछ काम इन्हें

बस करने दो आराम इन्हें

भूले से अगर कोई कह दे काम

इनको लगते रोग तमाम

फिर उसके ----तक धुन धुन धुन

 

दफ़्तर में अकसर महिलायें

सारा दिन इत-उत बतियायें

इसकी उसकी सब सुनती हैं

चुपचाप स्वेटर बुनती हैं

आवें जो लेट न टोको इन्हें

जावें जल्दी मत रोको इन्हें

फिर उसके ----तक धुन धुन धुन

इकतारा बोले तुन तुन

क्या कहे ये तुमसे सुन सुन

बात है सच्ची, मतलब साफ़

लगे बुरी तो करना माफ़,

फिर उसके ----तक धुन धुन धुन

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हरीश नारँग

१५, , अरावली अपार्ट्मेंट्स

अलकनन्दा,

नई दिल्ली – ११००१९

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