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रामनिवास ‘मानव' की कविताएँ

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आदमी और पहाड़

थोड़ी-सी ठंड क्‍या पड़ी,

सिहर उठा आदमी।

लेकिन

पहाड़ की छाती तो देखो,

हजारों वषोंर् से ओढ़े लेटा है

बर्फ़ की मोटी चादर,

लेकिन कभी

उफ़ तक नहीं करता।

 

रिश्‍तों के धागे

सुलझाता रहता है जंगल

नदी-नालों रूपी

रिश्‍तों के धागे,

लेकिन आकाश लांघकर

पहाड़ों की सीढ़ियां

पल-भर में

बढ़ जाता है आगे।

 

जंगल में सूर्यास्‍त

बहुत नीचे उड़ रहा था

कोई सुनहला सारस।

ऊंचे-ऊंचे वृक्षों की

सघन टहनियों में फंस गया,

और देखते-ही-देखते

हरियाली के सागर में

दूर कहीं धंस गया।

 

टिमटिमाती रोशनी

कहीं दूर,

सुनसान अंधेरी घाटियों में

जल रही हैं कुछ ढिबरियां

या चस-बुझ रही हैं लालटेनें।

किसी गहन अंधकूप में

टिमटिमा रहे हों

जैसे कुछ जुगनू।

लगता है, जैसे

रात में धरती पर

उतर आया है आकाश

सितारों सहित,

और लेटा है पहाड़ पर

पहनकर काला-मटमैला

जंगल का लिबास।

 

दयारा बुग्‍याल

बिछाकर दूधिया चादर

निकाल रही है उसमें

स्‍वयं प्रकृति

रंग-बिरंगी, सुन्‍दर,

मनमोहक फुलकारी।

लेकिन इस महंगी

मखमली चादर को

खरीदेगा कौन !

यहां सभी तो हैं मौन।

 

कत्‍यूरी घाटी

कत्‍यूरी घाटी

समाये आगोश में

एक भरी-पूरी सभ्‍यता,

सबल संस्‍कृति

और जीवन्‍त परिपाटी।

व्‍यक्‍ति और प्रकृति,

दोनों मिलकर

जहां बनते हैं एक,

यही है, यही है

वह सुन्‍दरता की टेक।

---

डॉ0 रामनिवास मानव', डी0लिट्‌

706, सैक्‍टर-13, हिसार-125005 (हरि0)

---

चित्र – सुमन एस खरे की कलाकृति

विषय:

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डॉ रामनिवास ‘मानव' की कविताएं पढ़ने का अवसर प्रदान करने के लिए आपका बहुत बहुत आभार !
मुक्तछंद के नाम पर लेखकीय हिमाक़तें इतनी प्रचुरता से होने लगी हैं कि कविता से सर्वत्र ऊब होने लगी । …लेकिन डॉक्टर 'मानव' की रचनाएं मुझ जैसे छंद के पक्षधर को भी पसंद आईं । अर्थात वाकई श्रेष्ठ कविताएं हैं ।
आदरणीय रविरतलामीजी , आप निरंतर श्रेष्ठ सकारात्मकता के लिए सक्रिय रहते हैं , आपके कार्य का मूल्यांकन असंभव है ।
मैं आपकी लगन और श्रम साधना को प्रणाम करता हूं ।
- राजेन्द्र स्वर्णकार
swarnkarrajendra@gmail.com
शस्वरं

एक से बढ़ कर एक...............

वाह !

I have no words to praise. really very nice praiseworthy poems. heart felt congratulations. special thanks to raviratlamiji for providing us such gems out of jeweleers stores. harendra

"पहाड़ की छाती तो देखो,

हजारों वषोंर् से ओढ़े लेटा है

बर्फ़ की मोटी चादर,

लेकिन कभी

उफ़ तक नहीं करता।"-----
-----क्या पहाड और मनुष्य में अन्तर नहीं है ? यह तुलना ही हास्यास्पद है।
---इसी प्रकार सभी कवितायें निरर्थक एवं तात्विक तथ्यार्थ दोष से युक्त हैं, सिर्फ़ कविता लिखने के लिये लिखना??

----मुक्त छंद कविता भी एक सशक्त विधा है, गुणी-ग्यानी जन छंदों में विभेद नहीं करते।

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