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August, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

महेन्द्र वर्मा की ग़ज़ल

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ग़ज़ल उनकी भोली मुस्कानों से जलते हैं कुछ लोग, जाने कैसी-कैसी बातें करते हैं कुछ लोग। धूप चांदनी सीप सितारे सौगातें हर सिम्त, फिर भी अपना दामन खाली रखते हैं कुछ लोग। उनके आंगन फूल बहुत हैं मेरे आंगन धूल, तक़दीरों का रोना रोते रहते हैं कुछ लोग। इस बस्ती से शायद कोई विदा हुई है हीर, उलझे-उलझे खोए-खोए दिखते हैं कुछ लोग। खु़शियां लुटा रहे जीवन भर लेकिन अपने पास, कुछ आंसू कुछ रंज बचा कर रखते हैं कुछ लोग। जुल्म ज़माने भर का जिसने सहन किया चुपचाप, उसको ही मुजरिम ठहराने लगते हैं कुछ लोग। इतना ही कहना था मेरा बनो आदमी नेक, हैरां हूं यह सुनते ही क्यूं हंसते हैं कुछ लोग। ---- - महेन्द्र वर्मा व्याख्याता, डाइट, बेमेतरा जिला दुर्ग ,छ.ग.,491335 e mail-            vermamahendra55@yahoo.in

दीनदयाल शर्मा की बाल कहानी – मित्र की मदद

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बाल कथा- मित्र की मदद : दीनदयाल शर्मा एक थी गिलहरी और एक था तोता। गिलहरी का नाम था गिल्लू और तोते का नाम था टिल्लू। गिल्लू और टिल्लू पक्के दोस्त थे। गिल्लू पीपल के पेड़ पर रहती थी और टिल्लू नीम के पेड़ पर। पीपल और नीम के दोनों पेड़ भी पास-पास ही थे। इस कारण गिल्लू और टिल्लू दोस्त के साथ-साथ पड़ोसी भी थे। दुख-सुख में दोनों एक दूसरे की मदद करते। एक दिन की बात है। गिल्लू पेड़ के कोटर में सो रही थी। उसे हल्की-हल्की ठण्ड महसूस होने लगी। धीरे-धीरे उसे ज्यादा ठण्ड लगने लगी। गिल्लू को घबराहट सी होने लगी। उसने देखा कि उसका शरीर कुछ गर्म सा हो रहा है। उसे अपनी मां की याद आने लगी। मां कहती थी-कि यदि सर्दी लगकर बुखार चढ़े तो यह मलेरिया बुखार का लक्षण है। ऐसा होने पर पास ही लगे सिनकोना के पेड़ की दो-दो पत्तियां सुबह-शाम खानी चाहिए। बुखार तभी ठीक होगा। गिल्लू को अपने शरीर में कुछ कमजोरी सी महसूस होने लगी। उसने लेटे-लेटे ही अपने दोस्त टिल्लू को आवाज दी-टिल्लू। टिल्लू। ओ टिल्लू। कई बार आवाजें दी लेकिन टिल्लू की तरफ से कोई उत्तर नहीं आने पर वह उठी और सिनकोना के पेड़ से चार पत्तियां तोड़कर लाई। उसने दो…

जया अपर्णा की कविता – अभी सभ्य होना शुरू ही किया है…

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अभी सभ्य होना शुरू ही किया है.... पसरे हुए जंगल के किनारे वाला वह पहला गाँव मेरा ही तो है... एक दिन वह जंगल ... ओझल हो चुका होगा आँखों से... एक दिन हमारा गाँव दूर होता पहुँच जायेगा शायद बीहड़ चाँद पर.... अभी सभ्य होना शुरू ही किया है.... मैंने देखा है - तुम्हारा गाँव उसी वैमनस्य से लड़ता -झगड़ता , फसलें घृणा की काटता .. .नस्लें उपेक्षा की बांटता अलगाव के बीज रोपता किसी दुर्दम्य वासना से चाँद पर सृजन में लगा है और करवट लेने लगे हैं - धर्म सत्ताएं ....! मानव का वही महाकार! चाँद कुछ सहमा -सा है ... बस्तियों का प्रसार .. मेरे बंजर होने में क्या जीवन यूँ छिपा था ? आह ! अब धरती कितनी दूर हो चली है ... और कोई प्रत्याशा? तृषित रेगिस्तान में खोयी .. .समय की झुर्रियाँ... एक और ग्रह की मौत हो गयी पर कन्धा देने को कौन था ? तुम तो परदेश बसे थे ! है न ! ---. (लेखिका द्वय की टिप्पणी - ये रचना हम दोनों का संयुक्त प्रयास है. इसे एक संवाद या परिचर्चा कहना गलत न होगा. - जया-अपर्णा )

सूरज प्रकाश का संस्मरणात्मक आलेख : कहानी की चोरी और चोरी की कहानी

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कथाकार तेजेन्‍द्र शर्मा ने कुछ दिन पहले एक ई-मेल भेज कर सब दोस्‍तों को बताया था कि कहानीकार राजीव तनेजा ने उन्‍हें बताया है कि किसी ने उनकी (राजीव तनेजा की) चार कहानियां चुरा ली हैं। तेजेन्‍द्र जी ने इस मुद्दे को सार्व‍जनिक करते हुए मित्रों से इस मामले से जुड़े नैतिकता , अनैतिकता , चोरी और सीनाजोरी , मूल लेखक के प्रति आभार मानने जैसे सवालों के जवाब चाहे हैं और एक तरह से इस मामले पर रोचक बहस छेड़ी है। कुल मिला कर किस्‍सा मज़ेदार है और इस पर बहस की जा सकती है। शायद तेईस चौबीस बरस पहले की बात रही होगी। तब कमलेश्‍वर जी गंगा नाम की एक पत्रिका के संपादक हुआ करते थे। उसी गंगा में एक दिन गरमागरम मुद्दा उछला। प्रसिद्ध कहानीकार , नाटककार और उपन्यासकार स्‍वदेश दीपक जी ने एक बांग्‍ला लेखक (इस समय लेखक का नाम याद नहीं आ रहा है।) पर आरोप लगाया था कि उस लेखक ने दीपक जी की कहानी बाल भगवान (बाद में इस कहानी पर नाटक भी आया था।) को चुराया है और उस पर बांग्‍ला में देवशिशु नाम से कहानी लिखी है। कमलेश्‍वर जी ने इसे एक सार्वजनिक बहस का मुद्दा बनाया और अपनी पत्रिका के जरिये एक तरह की मुहिम शुरू कर दी कि इस त…

क़ैस ज़ौनपुरी की कविता - मंदिर

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कविता. मंदिर मैं अपने रास्‍ते से जा रहा था रास्‍ते में देखा एक मंदिर था किसी देवी का लाल रंग से पुती हुई चुनरी में लिपटी हुई मैंने सिर झुका लिया आते-जाते, जहां भी मंदिर देखता हूं सिर झुका लेता हूं लेकिन क्‍या हुआ कि कुछ लिखा था, जो मैंने पढ़ लिया अब जब पढ़ लिया तो पूरा पढ़ लिया लिखा था श्री चौरामाई मंदिर सुन्‍दरपुर, वाराणसी अध्‍यक्ष - त्रिभुवन सिंह कोशाध्‍यक्ष - संजय सिंह उपाध्‍यक्ष - प्रभाकर दुबे उपप्रबन्‍धक - अषोक कुमार पटेल आय-व्‍यय निरीक्षक - मुन्‍ना लाल सिंह रजिस्‍टर्ड - 841 प्रबन्‍ध समिति आपका हार्दिक स्‍वागत करता है. प्रबन्‍धक - लालचन्‍द प्रसाद मैंने सोचा चलो....क्‍या करना है....? हमें तो बस सिर झुकाना है मगर सिर झुकाने के बाद जब सिर उठाया, तो भी कुछ था, लिखा हुआ कुछ था, पढ़ने के लिए स्‍वर्गीय बच्‍चा लाल श्रीवास्‍तव द्वारा भेंट (ग्रिल) मतलब, मंदिर का दरवाजा इन्‍होंने लगवाया था मुझे तो यही समझ में आया फिर भी, मैंने अपना ध्‍यान हटाया सिर्फ चौरामाई को देखा वहां भी चौखट पर लिखा था जय माता दी जय चौरामाई और वहीं बगल में संगमरमर के पत्‍थर पर खुदाई करके लिखी गई थी दानदाताओ…

शशांक मिश्र ‘भारती' का निबन्ध : मानव सेवा से ही राष्ट्रोन्नति संभव

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मानव सेवा से ही राष्‍ट्रोन्‍नति सम्‍भव डॉ0 शशांक मिश्र ‘भारती' मनुष्‍य मात्र की सेवा करना तथा पुरूषार्थ के द्वारा हमेशा सत्‍कर्म कर मन, वचन और कर्म से प्राणि मात्र का हित करना मनुष्‍य का कर्तव्‍य है। यह हमारे देश और संस्‍कृति की प्राचीन परम्‍परा एवं विशेषता रही है। मनुष्‍य में दूसरों के प्रति सेवा भाव होना ही परोपकार कहलाता है, जिसके द्वारा व्‍यक्‍ति दूसरों का उपकार करता है। जब तक मनुष्‍य में दूसरों के लिए दयाभाव नहीं होगा तब तक उसमें सेवा भाव होना सम्‍भव नहीं है। इसलिए मनुष्‍य में मनुष्‍य के प्रति सेवा, सहानुभूति, दया तथा परोपकार की भावना विकसित हो और उसका मन-मस्‍तिष्‍क सांसारिक विकारों से दूर हो। तभी मानव सेवा की भावना पनप सकती है। बिना सेवा भावना को अपने अर्न्‍तरंग में संजोये राष्‍ट्रोन्‍नति में भागीदार बनना मनुष्‍य के बस से बाहर की बात है। इसी लिये मनुष्‍य का कर्तव्य है, कि वह मनुष्‍य के प्रति सेवा भावों का अपने अन्‍दर समावेश करे। जिसके द्वारा राष्‍ट्र की प्रगति में अपनी सामर्थ्‍य शक्‍ति के अनुसार सहयोग देकर उसके विकास के पथ को प्रशस्‍त करे। मानव सेवा राष्‍ट्रोन्‍नति का केन्‍…

विजय वर्मा की लघु कविता – एक बरसाती शाम

एक बरसाती शाम तरु-पत्रों से गिरते बूँद, बूँद, बूँद कल के सूखे गड्ढे आज  के   समुद्र.ऊंचे-ऊंचे टीले पर हरी-हरी दूबशनैः शनैः सूरजरहा है डूब.जैसे सौन्दर्य की चादर तान दी हो किसी ने या कि अल्हड़ के होठों को छुआ हो प्रेमी ने.--
v k verma
vijayvermavijay560@gmail.com

अरुणा कपूर की कहानी – अंधकार से आती आवाज

कहानी                                                                                      ...अंधकार से आती आवाज!-डॉ. अरुणा कपूर.आवाज तो कभी हमकिसी को देते है...बुलाते है, कहते है, सुनते है!... और कोई हमें भी आवाज दे करबुलाता है... बतियाता है, अच्छी या बुरी खबर सुनाता है, अपने कहे के अनुसार चलने कोमजबूर भी कर देता है!... लेकिन इस आवाज देने वाले का अपना रंग--रुप होता है...नामहोता है!...एक रिश्ता होता है!... कोई अजनबी भी होता है तो वह रिश्ते से हम जैसा हीएक होता है...इस धरती पर अवतरित एक जीव होता है!... !...अगर वह मनुष्य भी  है तो क्या हुआ?... एक जीव तो होता ही है जो जीवंतहोनेके सभी लक्षणों से युक्त होता है!...और फिरतो क्यानिर्जीव चिज-वस्तुओं की आवाज नहीं होती?... क्यों नहीं होती?...अवश्य होती है!...चीजें गिरने की आवाज होती है....चीजों के ट्कराने की आवाज होती है!... हवा के झोंकेसे सरसराहट करने वाले पत्तों की आवाज होती है...बिजली कड्कने की आवाज होती है...बरसने वाली वर्षा की आवाज होती है!...नदियां, समंदर, झरने....सभी आवाजें ही तो देतेहै..गिनवाने जाएंतो बहुत लंबी सूची बनेगी!…...लेकिन...लेक…

राजेश ‘विद्रोही’ की ग़ज़लें

(1)नानक की नेकियों को भुनाते रहे हैं हम ।गौतम का पुण्‍य बेचकर खाते रहे हैं हम ॥जारी है अब तलक भी अँधेरों की अर्चना ।सदियों से ज्‍योति पर्व मनाते रहे है हम ॥दहशत के दरमियान गुजारी है जिन्‍दगी ।डरते रहे है और डराते रहे है हम ॥‘बोफोर्स' का सौदा हो या कोठों की दलाली।सच मानिये हराम की खाते रहे हैं हम ॥अब तुम इसे जुनून कहो या कि बेबसीं ।ज्‍वालामुखी पे जश्न मनाते रहे हैं हम ॥रिश्वत को इक रिवाज-सा हमने बना दिया।खाते रहे हैं और खिलाते रहे हैं हम ॥‘राजेश' किस जुबां से कहूँ ये सफेद झूठ।कि इंसानियत के दीप जलाते रहे हैं हम ॥ ----.(2)ग़ज़ल बुढ़ापा करेगा असर धीरे-धीरे।झुकेगी तुम्‍हारी कमर धीरे-धीरे ॥उमर भर सुने थे रवानी के किस्‍से।हुई जिन्‍दगानी बसर धीरे-धीरे ॥मिलेगा तुम्‍हें भी किसी रोज चश्मा ।कि कमजोर होगी नज़र धीरे-धीरे ॥अभी इब्‍तिदा में तो समझे हो जन्‍नत ।बढे़गा मग़र दर्दे-सर धीरे-धीरे ॥ अभी तक तो राशन में मिलती नहीं है।सिमेंटेड होगी क़बर धीरे-धीरे ॥ ---राजेश ‘विद्रोही'लाडनू नागौर राज341306

ज्‍योति सिन्हा का आलेख : राग, रोग और रोगी - अन्‍तः सम्‍बन्‍धों की विवेचना

राग, रोग और रोगी - अन्‍तः सम्‍बन्‍धों की विवेचनाडॉ․ ज्‍योति सिनहाप्रवक्‍ता (संगीत)भारतीय महिला पी․जी․ कालेजजौनपुरएवंरिसर्च एसोसियेटभारतीय उच्‍च अध्‍ययन संस्‍थानराष्‍ट्रपति निवास, शिमला-171005भारतीय संस्‍कृति अपनी जीवन्‍त परम्‍पराओं, शास्‍वत मूल्‍यों तथा अपरिवर्तनीय विशिष्‍टता के कारण सर्वत्र सराहनीय है, वन्‍दनीय है, अनुकरणीय है। इसी भारतीय सभ्‍यता व संस्‍कृति की संवाहक है -- समस्‍त कलायें। भारतीय संस्‍कृति में कला को ‘मनसत्‍व' कहा गया है और वह ‘आत्‍मवत्‌-सर्वभूतेषु' के चिन्‍तन से उत्‍प्रेरित है। भारतीय चिन्‍तन के अनुसार चौंसठ कलायें मानी गयी हैं। जिनमें ललित कलायें अन्‍य कलाओं से कुछ विशिष्‍टता रखती है। जीवन में सौंदर्य-बोध विकसित करने के लिये तथा जीवन को सम्‍पूर्णता, समग्रता के साथ जीने के लिये कलायें मन को सदैव प्रेरित करती रही हैं। जिनमें सर्वाधिक उत्‍कृष्‍ट, प्रभावी एवं मुखर कला है-- संगीत। मानवीय भावनाओं एवं संवेदनाओं को स्‍वरों द्वारा अभिव्‍यक्त करने की अविरल धारा ही संगीत है। यह ईश्‍वर द्वारा प्रदत्त्‍ा सृष्‍टि की मधुरतम्‌ अभिव्‍यक्‍ति है। संगीत वह परम्‌ दिव्‍य नाद है ज…

विजय वर्मा की हास्य व्यंग्य कविता : बीती विभावरी

बीती बिभावारी
[जयशंकर प्रसाद जी की आत्मा से क्षमा -याचना सहित] बीती बिभावारी,जाग री !कैसे तू इनके चंगुल में आन पड़ीशिघ्रातिशिघ्रम तूयंहा से भाग री.इनके मधुर वचन औ' शुभ वस्त्रों पे मत जा ,दिखाते है वक पर है तो ये काग री .इनकी शिकायत तू करेगी जाकर थानेकर दूं सचेत तुझेतू जाने कि ना जानेये तो है सांपनाथ वहां बैठे है नाग री.बहुत सोचकर ही पग उठाना इस ज़ग में वरना जीवनभर धोती रह जाओगी दाग री.बीती बिभावारी जाग री !,-   v k वर्माvijayvermavijay560@gmail.com

पुरूषोत्तम विश्वकर्मा के व्यंग्य

सातवीं पढ़ा व्‍यंग्‍यकारचाचा दिल्‍लगीदास कक्षा नवम्‌ की पाठ्‌‌य पुस्‍तक ‘गद्य-पद्य संग्रह भाग एक' का कोई पाठ पढ़ कर एक लंबी सांस लेने के बाद बोले कि मरहूम गोपाल प्रसाद व्‍यास, अल्‍लाह तआला उनकी रुह-ए-पाक को जन्‍नत में मकाम दे, अगर आज जिन्‍दा होते, तो मैं उनसे पूछता जरुर कि क्‍यों हजूर, क्‍या ये गधा ही बचा था आपके कुछ लिखने के लिए? हजरत ने जिस अंदाज से गधे की तारीफें की हैं, उसे देख कर पूरे यकीन से कहा जा सकता हैं कि जनाब ने भले ही कोई गधा न पाला हो, मगर अव्‍वल किस्‍म के गधों से उनका पाला जरुर पड़ा है। चाचा ऊपर हाथ करके जरा संजीदगी के साथ बोले कि परवर दिगार इस जुबां से बेजा न कहलवाए, इस तंजनिगार ‘व्‍यासजी' ने गधे को काफी गौर कर करीब से देखा है, वरना एक उचाट-सी नजर डालते हुए पास से गुजर कर, या दुलत्ती के खौफ से कनखियों से देखते हुए गधे से बच निकलने की स्‍थिति में गधे को इतनी सूक्ष्‍मता से परखा नहीं जा सकता। गधे में पाई जाने वाली या यूं कहे कहना बेहतर रहेगा कि ढूंढी तमाम खुसिसियात के मद्देनजर ये दावा किया जा सकता हैं कि कातिब वाकई गधा विशेषज्ञ रहा होगा। और हो न हो, कोई गैर-मतबुआ ‘…

दामोदर लाल जांगिड़ की ग़ज़लें

ग़ज़ल .1जाने कैसी खबर छप गयी है अब के अखबारों में। खौफज़दा है मची खलबली सारे इज्‍जतदारों में॥ मंदिर मंदिर ढूंढ रहा हूं धूप बत्‍तियां लेकर मैं, दीनानाथ हुआ करता था इक तेरे अवतारों में। कभी कटोरा होता था उस हाथ में खंजर देखा तो, पाप पुण्‍य पर बहस छिड़गयी धर्म के ठेकेदारों में। भरे पड़े भण्‍डार डॉलरों से फिर भूख से मरते क्‍यों, रोटी खाकर चिंतन करते दरबारी दरबारों में। नई गरीबी रेखा खिंची फुटपाथों की छाती पर, मिटी गरीबी निर्धन सारे आ बैठे जरदारों में। लाशों के अम्‍बार देखकर गिद्ध कराहकर बोले, जीने का अधिकार भी शामिल हो मौलिक अधिकारों में। आस पास जो बिखरा देखा वो कागज पे लिख डाला, लोग तुझे क्‍यों शामिल करते ‘‘जांगिड़'' तंजनिगारों में। -- ग़ज़ल 2हाथ में थाम कर मेरे घर का पता। और फिरी पूछती सब शहर का पता॥ जब हुआ भूखा जागा उठ चला पड़ा़, जानवर ढूंढ़ने जानवर का पता । फर्द सरगस्‍ता फहरिस्ते चौराहों से, खोजता इब्‍दिताये सफर का पता। सब बयाजों के पन्‍ने परीशां पड़े, अब कहां ढूंढ़े लख्‍ते जिगर का पता। बात सुन इक पते की हैं मेरा पता, नाम और गाँव के डाक घर का पता। कुछ तख्‍ल्‍लुस से चलता नहीं …

अवनीश सिंह चौहान की पुस्तक समीक्षा : अधूरा सच – रमाकांत दीक्षित का कहानी संग्रह

समीक्षित कृति-‘अधूरा सच‘ – कहानी संग्रहकथाकार – रमाकांत दीक्षितआज के महानगरीय जीवन का सत्‍यअवनीश सिंह चौहान‘साहित्‍य सम्‍पूर्ण सामाजिक अस्‍तित्‍व की अभिव्‍यक्‍ति है। हमारा आज का जीवन न सम्‍पूर्ण है, न सामाजिक, न सच्‍चे अर्थों में जीवन है, तब इसकी अभिव्‍यक्‍ति सम्‍पूर्ण कैसे हो?‘ (जगदीश चन्‍द्र माथुरः ‘भोर का तारा‘) शायद इसीलिए रमाकांत क्षितिज अपनी पन्‍दह कहानियों के संग्रह का शीर्षक ‘अधूरा सच‘ रखते हैं और इस बात को बड़ी ही साफगोई से स्‍वीकारते लगते हैं कि सच चाहे गढ़ा हुआ हो या कि जिया हुआ, अभिव्‍यक्‍ति में हमेशा कुछ न कुछ छूट ही जाता है कभी संघर्ष सूत्रों को ठीक से याद न रख पाने के कारण, तो कभी वैचारिकी पर पड़ने वाले परिस्‍थिति जन्‍य पभावों के चलते फिर भी इस अधूरे सच के प्रकाशन से आज के महानगरीय जटिल जीवन संदर्भो को बारीकी से व्‍यक्‍त करने की सामर्थ्‍य रखने वाले इस नवोदित कथाकार की रचना प्रक्रिया बड़ी ही सहजता, तारतम्‍यता एवं पारदर्शिता से कहानी चोला पहनती है और अपने कथ्‍य की विशिष्‍टता एवं विश्‍वसनीयता के बल पर पाठकों को झकझोर कर रख देती है। आज ‘रेसिंग‘ का दौर है, तेज दौड़ती जिंदगी …

अवनीश सिंह चौहान की पुस्तक समीक्षा – सैयद रियाज रहीम का ग़ज़ल संग्रह : पूछना है तुमसे इतना – जीवन की हकीकत बयान करती ग़ज़लें

हमारे जीवन की हकीकत बयान करती गजलें

समीक्षक- अवनीश सिंह चौहान



जो हजारों साल से मैं कह रहा हूं
फिर वही इक बात कहना चाहता हूं।

सैयद रियाज रहीम के गजल संग्रह पूछना है तुमसे इतनाकी फेहरिस्‍त से पहले उनका उपर्युक्‍त शेर पाठकों से कलमकार की बात बड़ी साफगोई से कह देता है कि वर्षों से साहित्‍यकार समाज के जिस कीचड़-दलदल को साफ करने की बात और उसके तत्‍कालीन सवरूप को प्रतिबिंबित करने का प्रयास करते रहे हैं, वही काम आज भी हो रहा है, बस उसको करने का अंदाज बदल गया है और बदल गयी है कुछ चिन्‍ताएं भी। ऐसे में इस शायर की कहन में समयानुकूल ताजगी, अपना खिंचवा-जुड़ाव, रगड़-घिसड़ के चिन्‍हों का रूपायन स्‍वाभाविक ही है। जिससे इतना तो अंदाजा लगता ही है कि जो बात वह हमसे कहना चाहता है, या पूछना चाहता है, वह हमारी और हमारे परिवेश से जुड़ी बात है, जो हमें रिमाइण्‍डकराती है कि किसमें हमारा हित है और किस में नहीं। उसकी यह सजगता-संवेदनशीलता तब और भी मायने रखती है जबकि आज का आदमी मायावी बाजारवाद के वशीभूत होकर अपनी आदमियत को भूलता-दरकिनार करता चला जा रहा है। इसीलिए वह सीधे-सपाट कह देता है-


आदमी हो, रहो, आदम…

अपर्णा की कविता : पूस की रात (एक भूली-बिसरी कहानी जो चल रही है .....)

हल्कू , मुन्नी और जबरा -
हूँ .. कितनी पीढ़ियों तक ?
पूस की आदत है क्या ?
तुम्हारे खून में रात बनकर बैठी है ?
या ठहर गयी है सूखी हड्डियों में ?
तीन रूपये का कम्बल खरीदने की अभिलाषा ....
अब भी कहाँ मिला ?
अंटी में तीन सौ हैं तो ....!
कहते हैं अब मालगुजारी भी नहीं ...!
फिर क्यों ये पूस टलता नहीं ?
तुम्हारे ऊख कहाँ हैं ?
नीलगाय अब हैं क्या ?
तुम्हारी मड़ैया?
अब ज़रूरत नहीं क्या ?
पड़ोस के आम के बगीचे में पतझड़ ....
अलाव तो मिला था ...
तुम और जबरा सो पाए थे
बटोरी पत्तियाँ जला कर ...!
वह तो अच्छा था कि पतझड़ उन्हीं दिनों होता है ......!
उधर -
नेपथ्य से लड़ता रहा था पूस
तुम्हारी अकर्मण्यता से .
अब भी लड़ रहा है ...
सुना है हार कर बैठ गया है ...
ठिठुरते तारों की सौगात लिए !
परास्त जान पड़ता है !
उधर -
कितने निर्लिप्त हैं वे !
संतुष्ट !
सब छोड़ कर -
एक चौड़ी सड़क से गुज़रकर
यहाँ फुटपाथ पर
तपी पड़े हैं -
पूस किनारे बैठा देख रहा है ...
पास से कई गुज़र गए ...
क्या अब शिनाख्त भी मुझे करनी होगी ?

नन्‍दलाल भारती की कविताएँ

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- बाकी है अभिलाषा सराय में मकसद का निकल रहा जनाजा छल-प्रपंच,दण्‍ड-भेद का गूंजता है बाजा नयन डूबे मन ढूंढे भारी है आज हताशा आदमी बने रहने की बाकी है अभिलाषा । दुनिया हमसे हम दुनिया से नाहिं फिर भी बनी है बेगानी , आदमी की भीड़ में छिना छपटी है कोई मानता मतलबी कोई कपटी है भले बार-बार मौत पायी हो आशा जीवित है आज भी आदमी बने रहने की बाकी है अभिलाषा । मुसाफिर मकसद मंजिल थी परम्‌शक्‍ति मतलब की तूफान चली है जग में ऐसी लोभ-मोह,कमजोर के दमन में बह रही शक्‍ति मंजिल दूर कोसों जवां है तो बस अंधभक्‍ति दुनिया एक सराय नाहिं है पक्‍का ठिकाना दमन-मोह की आग, नहीं दहन कर पायी अर्न्‍तमन की आशा अमर कारण यही,पोषित कर रखा है आदमी बने रहने की अभिलाषा । सच दुनिया एक सराय है मानव कल्‍याण की जवां रहे आशा जन्‍म है तो मौत है निश्‍चित कोई नहीं अमर चाहे जितना जोडे धन-बल सच्‍चा आदमी बोये समानता-मानवता-सद्‌भावना जीवित रखेगा कर्म यही मुसाफिरखाने की आशा अमर रहे आदमियत विहंसती रहे आदमी बने रहने की अभिलाषा । ----. चैन की सांसभय है भूख है नंगी गरीबी का तमाशा खिस्‍सों में छेद कई-कई चूल्‍हा गरमाता है आंसू पीकर आटा गीला हो…

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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