गुरुवार, 5 अगस्त 2010

महेन्द्र वर्मा की ग़ज़ल

ग़ज़ल

कोई शख्‍़स ग़म से घिरा लग रहा था,

हुआ जख्‍़म उसका हरा लग रहा था।


मेरे दोस्‍त ने की है तारीफ मेरी,

किसी को मगर ये बुरा लग रहा था।


ये चाहा कि इंसा बनूं मैं तभी से,

सभी की नज़र से गिरा लग रहा था।


लगाया किसी ने गले खु़शदिली से,

छिपाता बगल में छुरा लग रहा था।


मैं आया हूं अहसान तेरा चुकाने,

ये जिसने कहा सिरफिरा लग रहा था।


जो होने लगे हादसे रोज इतने,

सुना है ख़ुदा भी डरा लग रहा था।


‘ग़र इंसाफ तुमको दिखा हो बताओ,

वे जीता हुआ या मरा लग रहा था।

---

- महेन्‍द्र वर्मा

व्‍याख्‍याता, डाइट, बेमेतरा

जिला दुर्ग ,छ.ग.,491335

4 blogger-facebook:

  1. अति उत्तम। अति उत्तम। लगे रहिए....... भाई जी।
    सफलता आपके चरण चूमने वाली है।
    सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

    उत्तर देंहटाएं
  2. ग़ज़ल बहुत अच्छी बन पडी है
    सभी शेर मन को छू लेने में कामयाब हैं
    लेकिन ये शेर मुझे ख़ास तौर पर पसंद आया......

    ये चाहा कि इंसा बनूं मैं तभी से,
    सभी की नज़र से गिरा लग रहा था।



    मुबारकबाद .

    उत्तर देंहटाएं
  3. मेरे दोस्त ने की तारीफ़ मेरी,किसी को मगर ये बुरा लग रहा था।

    बहुत अच्छी ग़ज़ल , बहुत अच्छी लाइन।

    उत्तर देंहटाएं
  4. मेरे दोस्त ने की है तारीफ़ मेरी, किसी को मगर ये बुरा लग रहा था।

    बहरे मुतकारिद मुसम्मन सालिम (122 122 122 122)में अच्छी गज़ल।

    उत्तर देंहटाएं

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