मंगलवार, 10 अगस्त 2010

ओमप्रकाश यती की दो ग़ज़लें

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गाँव की समझी कभी क़ीमत नहीं

रौशनी को शहर से फुरसत नहीं


सत्य की ही जीत होगी अन्तत:

हर कोई इस बात से सहमत नहीं


क्या चुनावों का यही निष्कर्ष है

सज्जनों के साथ है जनमत नहीं


ठीक है वो लोग हैं भटके हुए

प्रेम है इसकी दवा, नफ़रत नहीं


हर ज़रूरत पर दुआएं चाहिये

यूँ बुज़ुर्गों की भले इज़्ज़त नहीं


 

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कितने टूटे , कितनों का मन हार गया

रोटी के आगे हर दर्शन हार गया


ढूंढ रहा है रद्दी में क़िस्मत अपनी

खेल-खिलौनों वाला बचपन हार गया


ये है जज़्बाती रिश्तों का देश, यहाँ

विरहन के आँसू से सावन हार गया


मन को ही सुंदर करने की कोशिश कर

दर्पन तो तू बदल-बदल कर हार गया


ताक़त के सँग नेक इरादे भी रखना

वर्ना ऐसा क्या था रावन हार गया

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(चित्र – एल एन भावसार की कलाकृति)

1 blogger-facebook:

  1. ्ढूंढ रहा है रद्दी में क़िसमत अपनी
    खेल खिलौनों वाला बचपन हार गया।
    (बह्त सुंदर रचनायें , मुबारक बाद)

    उत्तर देंहटाएं

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