गुरुवार, 12 अगस्त 2010

शशांक मिश्र ‘भारती' का निबंध चरित्र और मानव

रित्र से युक्‍त ही मनुष्‍य है। मानव संस्‍कृति के विकास में चरित्रवान ही अपनी अमूल्‍य भूमिका निभा सकता है। समस्‍त प्रकार की कर्तव्‍य भावना को जाग्रत करने वाला चरित्र ही है। जो अपनी उज्‍ज्‍वलता के द्वारा मनुष्‍य को महानता का सन्‍देश है। चरित्रीय गुण ही उसे अच्‍छे और बुरे का बोध कराते हैं। उसकी लाभ-हानि का ज्ञान देते हैं। चरित्र हीन व्‍यक्‍ति अपंग होता है। धन से हीन व्‍यक्‍ति हीन नहीं;किन्‍तु चरित्र से हीन मरे हुए के समान है। उसके ऊपर चरित्रीय दोषों का आवरण इस भांति चढ़ जाता है, कि वह अपने स्‍वार्थ में ही डूबा रहता है।

चरित्रवान व्‍यक्‍ति समाज की धुरी होता है। जिस पर समाज की सामाजिक व सांस्‍कृतिक प्रगति का पहिया चलता-फिरता रहता है। समाज के विकास में अपना योगदान चरित्रवान व्‍यक्‍ति ही दे सकता है। चरित्र एक महान सम्‍पत्ति है, जिसके पास है वह समाज में उच्‍च स्‍थान पाता है तथा मरने बाद भी लोगों की स्‍मृति पटल पर अंकित रहता है। चरित्र के आधार पर मनुष्‍य को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। एक वे जो चरित्र से हीन होते हैं अर्थात्‌ सामान्‍य जन। जो अज्ञान के तत्‍वों असत्‍य,आलस्‍य ईर्ष्‍या,द्वेष घृणा,हिंसा प्रमाद आदि से घिरे होते हैं। जिनमें विद्यमान ज्ञान के प्रकाश को चरित्रीय अवगुण ढक लेते हैं। यह पराक्रम विहीन,जिनमें अज्ञान से युक्‍त होने के कारण कल्‍याण की भावना से विहीन,जिनमें अज्ञान से युक्‍त होने के कारण कल्‍याण की भावना स्‍व परिवेशीय या क्षेत्रीयता तक ही होती है। दूसरे वो चरित्रवान मनुष्‍य होते हैं जिनका चरित्र उज्‍ज्‍वल होता है। ये समाज के विकास के चक्र को संचालित करते हैं। इनको महापुरूष या महान जन भी कहा जाता है।

चरित्र की धुरी सत्‍य,धर्म,दया क्षमा और परोपकार हैं; जिनसे महापुरूष युक्‍त होते हैं। इनकी कल्‍याण भावना लोकोत्‍तर होती है। जो कि समस्‍त समाज की भलाई करना चाहते हैं। जिनका उद्‌देश्‍य बसुधैव कुटुम्‍बकम्‌ वाला ही होता है। अर्थात्‌ समस्‍त पृथ्‍वी ही उनका अपना परिवार है और जिसकी सेवा करना उनका पुनीत कर्त्तव्‍य है। महापुरूषों के उच्‍च गुणों की प्रेरणा से साधारण से साधारण मनुष्‍य भी समाज के ढांचे को अपने जीवन रस की हरियाली से हरा-भरा बना देते हैं।

महापुरूष धीर या चरित्रवान व्‍यक्‍ति जो कि सत्‍य,धर्म के उच्‍च आदर्शों से अपना जीवन प्रत्‍यक्ष कर दिखाते हैं। सत्‍य, धर्म,धृति, अभय, धन,तप, अहिंसा, करूणा, दया, मैत्री आदि जितने भी ईश्‍वरीय गुण होते हैं। वह सभी इनमें दिखलायी पड़ते हैं। मन के अन्‍दर का अलौकिक प्रकाश इनसे बाहर प्रकट हुए बिना नहीं रहता। जिससे समस्‍त विश्‍व आलोकित होता है। किसी भी समाज मे महापुरूष क्रांति का नव अग्रदूत बनकर आता है तथा जो अपने ज्ञान के प्रकाश से समस्‍त संसार के अंधकार को दूर कर एक नयी संस्‍कृति व प्रणाली को जन्‍म देता है।

आदिकवि वाल्‍मीकि ने चरित्र का सम्‍बन्‍ध धर्म से स्‍थापित किया है। उनके अनुसार-‘चरित्र ही धर्म है और धर्म ही चरित्र है। चरित्र के गुणों के आधार पर उन्‍होंने जहां श्री राम को; वहीं महर्षि व्‍यास ने श्री कृष्‍ण को आदर्श रुप मे रखकर उनकी सत्‍य, धर्म, ज्ञान, त्‍याग, परोपकार, अहिंसा, कर्त्तव्‍य परायणता आदि गुणों के आधार पर महत्‍वपूर्ण व्‍याख्‍या की है।

 

निष्‍कर्षतः चरित्र एक आदर्श है, जिस पर मानव के विकास की समस्‍त अवस्‍थायें टिकी हुई हैं। चरित्र से ही मानव के साधारण और महान होने की पहचान होती है।

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“शशांक मिश्र‘‘भारती

दुबौला-रामेश्‍वर-262529

पिथौरागढ़- उ.अखण्‍ड

shashank.misra73@rediffmail.com

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