विजय वर्मा की लघु कविता – एक बरसाती शाम

एक बरसाती शाम

तरु-पत्रों से गिरते

बूँद, बूँद, बूँद

कल के सूखे गड्ढे

आज  के   समुद्र.

ऊंचे-ऊंचे टीले पर

हरी-हरी दूब

शनैः शनैः सूरज

रहा है डूब.

जैसे सौन्दर्य की चादर

तान दी हो किसी ने

या कि अल्हड़ के होठों को

छुआ हो प्रेमी ने.

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v k verma
vijayvermavijay560@gmail.com

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2 टिप्पणियाँ "विजय वर्मा की लघु कविता – एक बरसाती शाम"

  1. दिल से लिखी प्रेम रस में डूबी इस प्राक्रितिक ख़ूबसूरत कविता के लिये शत शत बधाई।

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  2. अल्हड़ , कमाल का शब्द प्रयोग

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