रविवार, 15 अगस्त 2010

दामोदर लाल 'जांगिड़‘ की स्वतंत्रता दिवस विशेष रचनाएँ

शहीदों के नाम

देश की रक्षा की खातिर प्राण न्‍योछावर किए है,

ऐ धरा तू धन्‍य है वो शूरमां पैदा किए है।

गोद सूनी देखकर भी अश्‍क जिसने पी लिए है ,

वीर मां का रुप वो केवल मिसालों के लिए है।

पूत का तुतलाता बचपन याद जब भी आयेगा,

देख लेना मां का क्रन्‍दन आसमां छू जायेगा।

आखिरी लम्‍हों में बाबा लाल की राहें तकेगें

तो दायरें श्रद्धाजंलि के सर्वथा छोटे पड़ेंगे।

 

ब्‍याह की रश्‍में भी तो आधी अधूरी ही पड़ी थी,

सेज के सुमनों की खुश्‍बू भी कुंवारी ही खड़ी थी।

लाज के मारे मुई पलके नहीं ऊपर उठी थी,

ठीक से दीदार तक ही तो नहीं वो कर सकी थी।

भौर होते ही बुलावा फर्ज का जो आ गया था,

लौट कर जल्‍दी आ जाने का वादा भी किया था।

उस पीह की प्रतीक्षा में जब द्वार पै दीपक जलेंगे

तो दायरे श्रद्धाजंलि के सर्वथा छोटे पड़ेगे।

लाड़ली बहना उड़ी के बालहठ बुनकर सलोने,

वीर भैया आयेगा मेरे लिए लेकर खिलौने।

एक बहना जो कहीं पर देश में ब्‍याही हुई है,

वो मिलन की आस लेके मायके आयी हुई है।

 

ये हर किसी से पूछती फिरती है भाई का ठिकाना,

रो पड़ोगे देख लेना सामने उसके न जाना।

जब चित्र पै राखी चढ़ाती बहन के आंसू गिरेगे,

तो दायरे श्रृद्धाजंलि के सर्वथा छोटे पड़ेगे।

एक वो अंकुर जो कल की कोख में ही पल रहा हैं,

तो कहीं निर्बोध वो घुटनों के बल ही चल रहा हैं।

होश आने पर वो पूछेंगे कि मां पापा कहां हैं,

तो भोली जिज्ञासा को मां कैसे बतायेगी कहां हैं।

हाय रे बिटिया के वादे सरहदों पें सो रहें हैं,

जो अधूरे रह गये अरमान छुप छुप रो रहें हैं ।

जब वीरता के पदक जब दीवार की शोभा बनेगे।

तो दायरे श्रृद्धाजंलि के सर्वथा छोटे पड़ेंगे।

 

 

ग़ज़ल

है शहीदों की निशानी आज लहराता तिरंगा,

शौर्य के पर्याय थे पुरखे ये बतलाता तिरंगा।

वो सभी बलिदान जो कि नींव के पत्‍थर बने थे,

वीर गाथाएं उन्‍हीं की गर्व से गाता तिरंगा।

जीते जी मां भारती की आन पै ना आंच आए,

सरहदों पर आज भी इतिहास दुहराता तिरंगा।

धर्म की रक्षा के आगे जान की परवाह कैसी,

दे गये श्री कृष्‍ण वो उपदेश दुहराता तिरंगा।

पार्थ का गांडीव जब जब शत्रु को ललकारता है,

गर्व से छाती फुला कर और तन जाता तिरंगा।

 

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गये है जंग में उनको नहीं हैं जान की परवाह।

लुटाने के लिए सब कुछ जहां तत्‍पर हैं भामाशाह॥

जिन्‍होंने लोरियों में भी सुनी हैं वीर गाथाएं ।

पिलाती हैं निडरता दूध के ही साथ माताएं॥

सुने रणभेरियां तो खूं रगों का खौल उठता हैं ।

जरा देखें हमारी ओर किसका हाथ उठता हैं॥

पलों में शत्रु की हस्‍ती को मिट्टी में मिला देंगे।

कभी कुरुक्षेत्र में गुजरे वो पसमंजर दिखा देंगे॥

धरा की धीर माटी ने दिया जन्‍म शेरों को ।

चटायी सदा ही धूल जिन्‍होंने लुटेरों कों ॥

बहा के खून जो सरहद परे इतिहास रचते हैं।

उन्‍हीं की ही समाधि पे श्रद्धा के फूल चढ़ते हैं॥

गवाह बन खड़ा हैं पोकरण जिनके पराक्रम का ।

कहीं नक्‍शा न मिट जाये धरातल से नराधम का॥

हमीं पर्याय प्रलय के ये दुश्‍मन को जता देंगे ।

कभी कुरुक्षेत्र में गुजरे वो पसमंजर दिखा देंगे॥

  

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पोकरण ।

निगल कर घास की रोटी भी जो संग्राम जीते है,

जरुरत आ पड़ी तो भामाशाह बनकर दिखा देंगे।

मदद देते हो स्‍वाभिमान के बदले तो रहने दो,

दफा करके सहारों को भी सब कुछ कर दिखा देंगे।

हुई पाबंदिया आयद नहीं परवाह करेंगे हम,

बिना बैसाखियों के हूबहू चल कर दिखा देंगें।

यहां पर लोरियों में वीर गाथाऐं सुनी मां से,

वतन पर जां फना करने को है तत्‍पर दिखा देंगे।

क़आनत की हिफाजत के लिए ताकत जरुरी है,

कभी कुरुक्ष्‍ेात्र से गुजरे वो पसमंजर दिखा देंगे।

पराक्रम की महागाथा जुबानी पोकरण कहता,

धरा से दुश्‍मनों का खात्‍मा हम कर दिखा देंगे।

विलक्षण बात है रण पोकरण, संगम अनूठा है,

उठी है यवनिका नाटक का मंचन कर दिखा देंगे।

3 blogger-facebook:

  1. स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आप एवं आपके परिवार का हार्दिक अभिनन्दन एवं शुभकामनाएँ.

    सादर

    समीर लाल

    उत्तर देंहटाएं
  2. ... स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं !!!

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर...रग रग में जोश भर देने वाली प्रस्तुति| सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाये|

    उत्तर देंहटाएं

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