महेन्द्र वर्मा की बाल कविता : कितना अच्छा होता

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कितना अच्छा होता

सोमवार से शनि तक छुट्टी,

कितना अच्छा होता।

 

केवल रवि को शाला लगती,

कितना अच्छा होता।

 

सोमवार को खेल खेलते,

मंगल रहते बाग़ में,

बुध को घर पर महफिल जमती,

कितना अच्छा होता।

 

गुरु को चिड़ियाघर हो आते,

शुक्रवार को पिकनिक,

शनि टी वी पर फ़िल्में चलतीं,

कितना अच्छा होता।

 

पढ़ने तो जाते ही रवि को,

लेकिन यदि हो ऐसा,

सुबह से बारिश होती रहती,

कितना अच्छा होता।

 

कविता लिख झट भेजी मैंने,

छुपा-छुपा कर छपने,

पापा पढ़ लेते यदि इसको,

पता नहीं क्या होता।

 

.. महेन्द्र वर्मा, व्याख्याता, डाइट, बेमेतरा, जिला दुर्ग, छ.ग.

vermamahendra55@yahoo.in

(बाल भारती, नई दिल्ली दिसम्बर 1996 में पूर्व प्रकाशित)

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