गुरुवार, 26 अगस्त 2010

अपर्णा की कविता : पूस की रात (एक भूली-बिसरी कहानी जो चल रही है .....)


ल्कू , मुन्नी और जबरा -
हूँ .. कितनी पीढ़ियों तक ?
पूस की आदत है क्या ?
तुम्हारे खून में रात बनकर बैठी है ?
या ठहर गयी है सूखी हड्डियों में ?
तीन रूपये का कम्बल खरीदने की अभिलाषा ....
अब भी कहाँ मिला ?
अंटी में तीन सौ हैं तो ....!
कहते हैं अब मालगुजारी भी नहीं ...!
फिर क्यों ये पूस टलता नहीं ?
तुम्हारे ऊख कहाँ हैं ?
नीलगाय अब हैं क्या ?
तुम्हारी मड़ैया?
अब ज़रूरत नहीं क्या ?
पड़ोस के आम के बगीचे में पतझड़ ....
अलाव तो मिला था ...
तुम और जबरा सो पाए थे
बटोरी पत्तियाँ जला कर ...!
वह तो अच्छा था कि पतझड़ उन्हीं दिनों होता है ......!
उधर -
नेपथ्य से लड़ता रहा था पूस
तुम्हारी अकर्मण्यता से .
अब भी लड़ रहा है ...
सुना है हार कर बैठ गया है ...
ठिठुरते तारों की सौगात लिए !
परास्त जान पड़ता है !
उधर -
कितने निर्लिप्त हैं वे !
संतुष्ट !
सब छोड़ कर -
एक चौड़ी सड़क से गुज़रकर
यहाँ फुटपाथ पर
तपी पड़े हैं -
पूस किनारे बैठा देख रहा है ...
पास से कई गुज़र गए ...
क्या अब शिनाख्त भी मुझे करनी होगी ?

4 blogger-facebook:

  1. बेनामी12:17 pm

    आदमी सिक्के को, सिक्के आदमी को
    खोटा बनाते हैं, वो एकदूसरे को छोटा बनाते हैं।
    आजकल सिक्के टकसाल में नहीं
    आदमी की हथेली पर ढल रहे हैं,
    और बच्चे मां की गोद में नहीं सिक्के की परिधि में पल रहे हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  2. पूस की रात अच्छी लग रही है, अच्छी लग रही है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. पूस की रात अच्छी लग रही है , अच्छी चल रही है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. पूस की रात अच्छी लग रही है, अच्छी चल रही है। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

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