बुधवार, 25 अगस्त 2010

पुरुषोत्तम विश्‍वकर्मा का व्यंग्य - मुन्‍तजर सैलाब के

 

लेह में आए सैलाब की खबर पढ़कर चाचा दिल्‍लगी दास बोले कि सैलाब चाहे लेह में आये या गुजरात में आए चाहे किसी और सूबे में, हलाक होने वाले सिर्फ और सिर्फ गरीब ही होते हैं,सैलाब की भेंट चढते हैं मेहनत की कमाई से पेट काटकर बनाए गए घासपूस के घर या कच्‍चे मकानात। हराम की कमाई से बनी बहुमंजिला इमारतों को छेङने से तो सैलाब भी गुरेज करता है। वैसे भी इन बहुमंजिला इमारतों व सैलाब का पुराना याराना मालूम पङता है। ये एक दूसरे के मददगार है और सबब भी। देखा होगा हर सैलाब की बदौलत हुई तबाही को। तबाही जितनी ज्‍यादा होती है उसी तनासुब में पक्‍की इमारतों की तादाद और बढ जाती है। और पुरानी इमारतों में दो चार मंजिलों का इजाफा हो जाता है। तभी तो इन पक्‍की और ऊँची इमारतों के मसकीन हमेशा सैलाब आने का इन्‍तजार करते हैं ताकि इमारत के किसी महफूज गौसे के झरोखे में खङे होकर सैलाब के नजारों का लुत्‍फ उठा सके।

चाचा आगे बोले कि मरते वो हैं जो सिर्फ सरकारी इमदादा का इन्‍तजार करते हैं। उन्‍हें तवक्‍को रहती है कि पिछले चुनावों में आवाम की खातिर जीने मरने वाले नेताजी जब उनके चुनाव क्षेत्र में आई बाढ़ के समाचार सुनेंगे तो अपनी पहाड़ की छुटि्‌टयां या स्‍वयं के इलाज के लिए की जाने वाली विदेश यात्रा बीच ही में छोड़कर आनन-फानन से हमारे लिए सहायता सामग्री लेकर आयेंगे। वे लोग ही नजरें सैलाब होते है जो कि खबरों पर यकीन कर लेते है कि सैलाब के मुतासिरान को अमुक-अमुक इमदाद भेजी जा रही है। सरकारी प्रयासों के अलावा कई निजी सस्‍ंथाएं भी जी जान से इस अभियान से जुटी है जब कोई प्रकार की सहायता जरुरतमंदों तक पहुंचती तब तक बड़ी देर हो चुकी होती है। पहुंचते हैं खाना, कपड़े, कम्‍बल, दवाइयां टीन और वहां जरुरत होती है कफन काठी की।

चाचा जान मेरे कान के पास फुसफुसाते हुए यूं बोले मानो बड़ी राज की बात बताना चाह रहे हो, कहा कि सैलाब कितना भंयकर था इसका अंदाज हर कोई नहीं लगा सकता। प्रभावित लोंगों की त्राहि-त्राहि पर कोई भरोसा नहीं करता कारण ये मान कर चला जाता है कि ये तो कोरा नाटक है सहायता हथियाने के लिए। और सरकारी अहलकारों की रपटें इस बिना पर खारिज कर दी जाती है कि वो तो मुख्‍यालय पर बैठकर बनाई गई है। अखबार वालें वैसे भी किसी बात को बढ़ा-चढ़ाकर छापने के लिए बदनाम है सो सुबह-सुबह अखबार उनींदी आंखों से पढ़कर शाम को रद्दी में डाल दिया जाता है। विपक्ष वालों की बातों को भला कौन तवज्‍जुह देता है उनका तो काम ही सत्तापक्ष की विफलता साबित करना होता है। सैलाब की भंयकरता, प्रभावित क्षेत्र व जान माल की हानि का सही-सही आकलन तो प्रभावित क्षेत्र का हवाई दौरा कर सत्ता पक्ष के मंत्री ही लगा सकते हैं। उनकी रपट ही आधिकारिक होती है।

चाचा अपनी फुसफुसाहट का सिलसिला जारी रखते हुए कुछ और आहिस्‍ता से बोले कि भतीजे चाहे तटीय क्षेत्रों में सुनामी आए चाहे गुजरात में भूकम्‍प या बाढ़ एक तबका और है जो हर प्राकृतिक आपदा के बाद हर बार इन कुदरती कहरों के मुतासरीन के साथ-साथ और शर्तिया उनसे कुछ ज्‍यादा आहत होता है। वो है सरकारी कर्मचारी। इन नेता लोगों को तो तुम जानते ही हो ऐसे मामलात में अपनी जेब से एक फूटी कौड़ी भी नहीं देते। बिचारे इन गरीब कर्मचारियों की जबरन एक-एक दिन की तनख्‍वाह काट लेते हैं। परायी पोटली से पुण्‍य कर वाह-वाही कमाते हैं और हर बार इन कुदरती कहरों की जद में आए लोगों तक केवल चार रुपये का कूपन ही मिलता है। ये बड़े-बड़े चंदे, सहायता राशि, सरकारी कर्मचारियों का वेतन सब के सब प्राकृतिक प्रकोप ही को नजर कर दिया जाता होगा।

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