शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

दामोदर लाल जांगिड़ की ग़ज़लें

ग़ज़ल .1

जाने कैसी खबर छप गयी है अब के अखबारों में।

खौफज़दा है मची खलबली सारे इज्‍जतदारों में॥

 

मंदिर मंदिर ढूंढ रहा हूं धूप बत्‍तियां लेकर मैं,

दीनानाथ हुआ करता था इक तेरे अवतारों में।

 

कभी कटोरा होता था उस हाथ में खंजर देखा तो,

पाप पुण्‍य पर बहस छिड़गयी धर्म के ठेकेदारों में।

 

भरे पड़े भण्‍डार डॉलरों से फिर भूख से मरते क्‍यों,

रोटी खाकर चिंतन करते दरबारी दरबारों में।

 

नई गरीबी रेखा खिंची फुटपाथों की छाती पर,

मिटी गरीबी निर्धन सारे आ बैठे जरदारों में।

 

लाशों के अम्‍बार देखकर गिद्ध कराहकर बोले,

जीने का अधिकार भी शामिल हो मौलिक अधिकारों में।

 

आस पास जो बिखरा देखा वो कागज पे लिख डाला,

लोग तुझे क्‍यों शामिल करते ‘‘जांगिड़'' तंजनिगारों में।

 

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ग़ज़ल 2

हाथ में थाम कर मेरे घर का पता।

और फिरी पूछती सब शहर का पता॥

 

जब हुआ भूखा जागा उठ चला पड़ा़,

जानवर ढूंढ़ने जानवर का पता ।

 

फर्द सरगस्‍ता फहरिस्ते चौराहों से,

खोजता इब्‍दिताये सफर का पता।

 

सब बयाजों के पन्‍ने परीशां पड़े,

अब कहां ढूंढ़े लख्‍ते जिगर का पता।

 

बात सुन इक पते की हैं मेरा पता,

नाम और गाँव के डाक घर का पता।

 

कुछ तख्‍ल्‍लुस से चलता नहीं बारहा,

क्‍या कह देगा इक सुखनवर का पता।

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ग़ज़ल 3

बुरा नहीं है किसी का बन जाना खाना-दामाद।

सारा माल ससुर का मिल जाता शादी के बाद ।

 

हो इज्‍जत चाहे दरवाजे के कुत्‍ते से बदतर ,

समझदार ससुराल में होते खाना आबाद।

 

काम किया चक्‍की चूल्‍हे का बर्तन भांज दिये,

पांव दबा के सास श्‍वसुर के ले ले आशीर्वाद।

 

अपनी किस्‍मत कोस रहे क्‍यों जलते औरों पे,

कुछ नेक काम करके गये थे शायद मेरे अज्‍जाद।

 

मन मर्जी से कुछ करने का जब जब जी चाहे,

जो खाना दामाद हुऐ हैं खुद्‌दारी पे खेल,

 

ऐसे मौकों पर बाबुल का घर आता है याद।

इन बदकिस्‍मत लोगों की ‘‘जांगिड'' खूब बड़ी तादाद।

...

(खाना दामाद = घर जँमाई)

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ग़ज़ल 4

हम ले सके थे आसमान ताकते रहे।

दिलों के दरमियां पड़ी दरारें नापते रहे॥

 

किताबे दिल में जो सफा मुड़ा हुआ मिला हमें,

वो पढ़ा हुआ कलाम जान फाड़ते रहे।

 

रुप ओ मकरंद का व्‍यापार तिसका कर्म था,

डस मधुप को वाटिका का मीत मानते रहे।

 

नितान्‍त सहज भाव से तूफान तो चला गया,

हिला गया जड़ें उन्‍हीं का दर्द आंकते रहे।

 

तमाम वाकयात का बयाने मुख्‍तसर हैं ये,

सिले हुऐ से होंठ बार बार कांपते रहे।

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