गुरुवार, 19 अगस्त 2010

अशोक गौतम का व्‍यंग्‍य : जागो․․․ सरकार प्‍यारे․․․

ashok gautam

ज्‍यों ही पंचायत समिति के मिंबर बुद्धू ने नंदू प्रधान को स्‍नेहा दिया कि अमुक डेट को सरकारों की सरकार, बड़ी सरकार उसकी पंचायत के द्वार आ रही है तो उसकी दमे की मार से सिकुड़ी छाती फूल कर कुप्‍पा हो गई। अब देखता हूं बिपच्‍छी घुंघरू को! बड़ा बनता है अपने को सरकार का खासमखास! ला पाया क्‍या इतने सालों में वह सरकार पंचायत के द्वार? मेरे राज में आई। चौथे महीने ही। इसे कहते हैं धाकड़ नेता!

नंदू प्रधान ने हाट से लेकर घराट तक गंगे की पीठ पर नगाड़ा पिटवा सुबह सात बजे से लेकर रात के आठ बजे तक हफ्‌ता भर अपने खर्चे पानी पर मुनादी करवा उसकी पीठ छिलवा दी,‘ सुने! सुने!! सुने!!! पंचायत का आम- खास सुने! पंचायत का घराटी हो या लाट सुने! साह सुने !! साहनी सुने! पुरोहित सुने, यजमानी सुने! होरी सुने,मसान में रहने वाला अघोरी सुने!! लखिया बाबा सुने, उसके कारदार सुने!!लुहार सुने, कुम्‍हार सुने!! छान छवाने वाला कीत्‍थु सुने! टोकरियां, सूप बुनने वाला गीत्‍तु सुने!! पंचायत में प्रधान के परताप से आने वाली चार तारीख को नंदू जी और केवल नंदू जी की पंचायत में रात आठ बजे सरकार पधार रही है। पांच तारीख को सुबह आठ बजे सरकार ने आम जनता को अपने दर्शन देने का मन बनाया है। जो सेवक सरकार के दर्शनाभिलाषी हों वे पंचायत के प्रधान के पास दो तारीख से पहले ही नाम दर्ज करा दें। जो प्रधान जी के आर्डर का मजाक उड़ाएगा वह सरकार के दर्शन तो दर्शन, सरकार की हवा भी नहीं ले पाएगा। और एक बात और ! सरकार पहली बार उनकी पंचायत में आ रही है। याद रखें- यह प्रधान जी की नाक का सवाल है। यह प्रधान जी का फरमान है कि जो भी सरकार से मिले, चुप मिले। बिना किसी शिकवे के, बिना किसी शिकायत के। उसके आगे रोना रोने की कोई जरूरत नहीं। हम गांव वाले रोते- रोते ही जीने के लिए पैदा होते हैं और रोते- रोते ही मरने के लिए बने होते हैं। गलती से भी जो सरकार के आगे अपना रोना रोने की जो हिम्‍मत करेगा उसके साथ पूरी पंचायत का सात पुश्‍तों तक हुक्‍का पानी बंद। एक हिदायत और- रोनी सूरत वालों को सरकार से मिलने की इजाजत नहीं दी जाएगी।'

और बड़ी सरकार के आने की खुशी में रास्‍ते के साथ लगते गांव के गिरते चकंधे बुहारे गए, माटी- गोबर से संवारे गए। पता नहीं सरकार का मन किस घर पर आ जाए! पंचायत के साथ लगती पशु शालाओं के ढोरों को रगड़- रगड़ कर गोरा किया गया। बड़ी सरकार के आने के चक्‍कर में बेचारी भैंसों की चमड़ी तक छिल गई। पर क्‍या कहतीं! सरकार को जो रिझाना था! उन्‍होंने पता नहीं किस से सुन रखा था कि सरकार को काले कारनामों के सिवाय और कुछ भी काला अच्‍छा नहीं लगता। पंचायत के मिंबरों और प्रधान न देवी के चढ़ावे में से कुछ पैसे निकाल अपने लिए एक जैसे कुरते पाजामें बनवा लिए ताकि बड़ी सरकार को लगे कि पंचायत मिंबरों में एका है। पंचों की डरेस के लिए देवी के चढ़ावे में से पैसे लेने का बिरोध कीरपु पुजारी ने किया ,‘प्रधान जी! ये चढ़ावा तो आने वाले नवरात्रों में देवी की नई पोसाक के लिए खर्च होना था। अब नवरात्र में देवी को पहनाएंगे क्‍या?'

‘अरे पुजारी जी! बड़ी सरकार अगर एक बार खुश हो गई न तो देवी तो देवी, उसके साथ रखे लौंकड़ों को भी कपड़े न पहना दूं तो मेरा नाम भी नंदू प्रधान नहीं। अभी पंचायत की नाक का सवाल है। जब देवी की नाक का सवाल होगा तो देख लिया जाएगा। जाओ! मंदिर के चिमटे, ढोलक साफ करो! अगर रात को बड़ी सरकार का मन नाच गाने का हुआ तो साज जरा चमकते दिखें। और हां! उन बरलाजिओं को भी कह देना कि सरकार की मौज के लिए रात भर बरलाज गाने को अभी से गले गरारे कर चमका लें। बड़ी सरकार खुश हो गई तो आकासवानी से सीधा परसारन न हो तो एक मूंछ कटवा दूं। भजनिए को भी कह देना की तेरी कला की परीच्‍छा अब है। अगर उस दिन फटे ढोल से सुर निकाले तो गला सदा के लिए बंद समझना हां!'

अगले दिन पंचायत में रात- रात भर हंगामी मीटिंग हुई! बड़ी सरकार के लिए और क्‍या- क्‍या करना है? इसकी रूपरेखा तैयार की गई। प्रधान के मुंह लगे नजरू ने भांग की चिलम संतू को पकड़ाते कहा,‘ अगर बड़ी सरकार का मन नाच गाने को हुआ तो? सुना है सरकार के यहां तो ये आम है! वह जब काम करते- करते थक जाती है तो․․․․․'

‘फिर तो यार पीने का इंतजाम भी करना होगा, बड़ी सरकार जब काम करते -करते थक जाती है न तो ․․․․' प्रधान ने सामने दीवार पर लगी गांधी की कीड़ों द्वारा अधखाई तस्‍वीर को सिर खुजलाते देखा।

‘वह तो इंतजाम हो जाएगा। मोहणिया का ठररा किस दिन काम आएगा। एक घूंट में बड़ी सरकार चित्‍त न हो तो साले का दारू बनाना बंद न करवा दूं। सेवा पानी के लिए वह मिंबरनी है न! अब काम नहीं आएगी तो कब काम आएगी। ज्‍यादा ही बोलेगी तो दो चार सौ पंचायत फंड में से दे देंगे उसे सजने धजने के लिए। इसी बहाने सज तो लेगी। वरना, उसे देख कर तो उसके खसम को भी कै आती है,' कृपु ने कहा तो पूरी पंचायत में लगा बादल फट गए हों।

‘ और मीट???'

‘बड्‌डे के पास हैं न पचास- पचास किलो के बकरे। वे किस दिन के लिए मोटे हुए जा रहे हैं। जो -जो बड़े सरकार के पेट में जाएंगे तो मोक्ष के अधिकारी होंगे,'रामसरन मिंबर ने कहा तो पूरी पंचायत में ठहाका गूंजा। बड्‌डे को लगा की सौ बिया का एक बकरा तो चढ़ा बड़े सरकार के बलि।

बड़ी सरकार के आने की सांझ तक पंचायत घर में पूरी तैयारी हो चुकी थी। नए बिस्‍तर प्रधान अपने घर से ले आया था।

बड़ी सरकार का इंतजार करते -करते थका सूरज पहाड़ की ओट में आराम करने जा रहा था कि तभी पटवारी ने दूर पहाड़ी पर से आवाज दी,‘ होशियार! खबरदार!! बड़ी सरकार आ रही है,‘ कि सामने बड़ी सरकार का काफिला दिखा। उसमें एक से एक बड़ी सरकार! सब एक से। प्रधान के इशारे की देर थी कि लुहार की बाजा पार्टी ने बंबई से आया मेरा दोस्‍त․․․ बजाना शुरू कर दिया। उसकी मूंछों पर लगे लौंग के तेल ने पूरे पंचायत घर को महकाया हुआ था।

रात भर बड़ी सरकार की आदर खातर होती रही। प्रधान बड़ी सरकार के चरणों को धो निहाल हुआ। ये लाओ, वो लाओ ․․․सारी रात सफर में थकी सरकार की सेवा में बरतन खनकते रहे, ढोल- चिमटे बजते रहे। ठररे के गिलास छलकते रहे।

सुबह जनता बड़ी सरकार के दर्शनों को पांत लगाए बेचैन! सात बजे-आठ बजे․․․फिर दोपहर हुआ! सांझ हो गई! दुधारू पशु दूध दुहाने को रंभाने लगे। चूल्‍हे जलने के लिए पुकारने लगे। पर बड़ी सरकार सोई हुई। आखिर तंग आकर एक दोपहरी धनिया ने प्रधान से पूछ ही लिया,‘ रे प्रधान! तेरी सरकार कब जागे?'

‘सब्र कर धनिया! सब्र कर!! सब्र का फल मीठा होता है। अभी सरकार खा पीकर थकी है। जब द्वारे बड़ी सरकार आ ही गई है तो जाग भी जाएगी ही। आत्‍मा अनमुई तो स्‍वर्ग जाती नहीं।' प्रधान की मूंछों पर लगा लौंग का तेल पंछी की तरह उड़कर अपने देस जा चुका था।

जागो․․․․․․सरकार प्‍यारे․․․․․ जागो․․․․․․

अशोक गौतम

गौतम निवास, अप्‍पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन-173212 हिप्र

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