सोमवार, 9 अगस्त 2010

राजश्री की कहानी : नीचों की गली

बूंदाबांदी फिर से चालू होते ही प्रियंवदा और एरिक ने अपनी अपनी छतरियां खोल लीं। वे छतरियों को दोनों हाथों से मजबूती से पकड़े गिट्टी डली आधी कच्ची पक्की पहाड़ी पगडंडी पर चल रहे थे। पगडंडी घाटी में कही जाती हुई लगती थी। बारिश तेज हो चुकी थी। पगडंडी प्राचीन से लगने वाले मंदिर पर खत्म हो गयी। दोनों दौड़ते हुए मंदिर के अहाते में घुस गये।

यह घाटी कुमारी पर्वतमाला के बीच थी , जिसका कुमारी पर्वत तीन नदियों का उदगम स्थल था। नदियों के गिरने की आवाज मंदिर में नगाड़ों की भांति आ रही थी। पहाड़ों से घिरी घाटी में घनघोर मानसून, चारों ओर गहरे हरे अंधेरे का साम्राज्य, चारों ओर से पानी गिरने की आवाज, रह रह कर कड़कती बिजली की जगमगाहट सब कुछ मंदिर के खुले प्रांगण में रहस्यमयी संसार की सृष्टि कर रहा था। प्रकृति के रौद्र सम्मोहन ने दोनों को कुछ क्षणों के लिये निशब्द निराकार कर दिया।

एरिक बोला “ वाइल्ड एंड अनटेम्ड। जहाँ कोई अपने आपको या तो बंधनमुक्त पा सकता है या भयभीत। प्रकृति की चरमता। यहाँ की हर चीज फोटोजेनिक है। क्या तुम यहां पर अपनी पेंटिंग के लिये कुछ नहीं ढूंढ सकती? द मेजेस्टी आफ नेचर। ”

प्रियंवदा सम्मोहन को तोड़ने की कोशिश करते हुए बोली “इस रौद्र रूप में कितना सम्मोहन है? इसे लकीरों में नहीं बांधा जा सकता। इस स्वच्छंद चीत्कार का गांभीर्य मुझे सहमा रहा है। ”

“प्यारे प्यारे बच्चे जो बकरियों के साथ दुबके बैठे हैं इन्हें तो बांधा जा सकता है। ”

“हां पर मेरे पास केनवास नहीं है। लगता है यह शिवमंदिर है। पहाड़ियों और गुफाओं में वहीं रहते है। चारों ओर ये कलात्मक खम्बे जिन पर यह छत टिकी है । बड़े पुराने लग रहे है। बीच में बना यह यज्ञकुड कितना विलक्षण है। लगता है यहाँ हवन होता है। किन्तु यह आंगन कितना वीराना लगता है?”

बच्चे उसके पास आ गये। एक बच्चा बोला “यहाँ पर इसी कुंड में सती माता भस्म हुई थी। ”

दूसरा बच्चा उसकी बात काटते हुए बोला “अरे पागल सती माता यहाँ नहीं भस्म हुई थी। । यहाँ तो उनकी भस्म गिरी थी। ”

तीसरे बच्चे ने गहन गंभीरता से सिर हिला कर अधिकारपूर्वक दोनों की बात काटी “नहीं। यहाँ पर तो अमृत घट से अमृत की बूंद गिरी थी। ”

बच्चे बहस करने लगे। सभी की कहानियाँ सैकड़ों साल पीछे जाती थी। सभी की नानियाँ दादियाँ इतनी पुरानी थी। किसी की कहानी झूठी नहीं हो सकती।

कई कहानियाँ। कहानियों में कितनी सच्चाई है? प्रियंवदा सोचने लगी।

ऐरिक ने बच्चों को पैसे दिये। जबकि उसे एक भी कहानी समझ में नहीं आयी थी। एरिक ने बच्चों के कई फोटो खींचे। कैमरे के व्यूफाईन्डर में आँख लगाये एरिक काई कोणों से फोटो खींचता रहा। प्रियंवदा ने सोचा कितना अच्छा होता है कैमरे का व्यूफाईंन्डर। संयोजना को सुंदर बनाने के लिये आँख पर कैमरा लगाकर ढूंढते रहो। पर उसके लिये भी आँख चाहिये जो देख सके कि क्या चुनना है?

एरिक ने प्रियंवदा से पूछा कि बारिश हो चुकी है। उसका क्या प्लान है?

वह अभी वहीं रूकना चाहती थी। बारिश बंद हो चुकी थी किंतु घाटी में चल रही हवाओं और नदियों के गिरते पानी की आवाज के सम्मोहन ने प्रियंवदा को अवश कर दिया था।

एरिक को कल वापस जाना था। वह कुछ और जगह भी देखना चाहता था। अतः उसने वापस सिटी जाने का निश्चय किया। एरिक ने देखा प्रियंवदा सिगरेट का पैकेट टटोल रही थी। उसने प्रियंवदा को अपना सिगरेट पैकेट दिया “प्रिया पैकेट रख लो। बीड़ी मत पीना। बी सेफ” कहकर वह अपनी छतरी उठा कर निकल गया।

प्रियंवदा की सिगरेट खत्म हो चुकी थी और वह अपनी उंगली व अंगूठे को मिलाकर व्यूफाईन्डर की तरह बना कर निरूद्धेश्य फ्रेम बनाकर देख रही थी। आड़ी टेढ़ी शाखाएँ कभी त्रिभुज, कभी चतुर्भुज बनाती। कभी खुली शाखा के बीच दूर के पेड़, पास के पेड़, पहाड़ों को देखती। हाँ यह सब फोटोजेनिक है पर केनवास में मैं इस सम्मोहन को कैद नहीं कर सकती।

उसने होलिस्टिक ऐप्रोच वाले प्रोफेसर रसेल के बारे में सोचा। सिर पूरा गोल गंजा, लंबी सफेद दाढ़ी, उन्हें इस उम्र में भी चश्मा नहीं लगता था। वो कई बार आश्चर्य करती इस आदमी के बाल कैसे उड़ गये? जबकि आँखें एकदम 20। 20 । नामी चित्रकार सस्ती जींस पर बहुत महंगा शर्ट पहनने वाले। एक हाथ की स्लीव चढी हुई। जैसे सरदारजी साफे के साथ टाई मैच करते प्रोफेसर शर्ट के साथ साक्स मेच करते। प्रोफेसर की अंगूठियाँ महंगी मेहनत से चुनी होती थी। समथिंग पिक्यूलर।

एक दिन वह काफे फासेट की नीटिंग की बुक देख रही थी। जिसमें फासेट ने पेंटिग्स को निटिंग में बदल दिया था। उसे देखकर प्रोफेसर ने कहा “जब मैनी और मैं अपने पहले बच्चे का इंतजार कर रहे थे। तब दोनों ने मिलकर बडा सा मोटा सा अफगान बच्चे के लिये बुना था। हमने अपनी जिंदगी भी इसी तरह बुनी है। ” उनकी आवाज और आँख में स्वयं के वैवाहिक जीवन के लिये गहरा आदर था। प्रियंवदा ने उसे महसूस किया जबकि उसे मैरिज इंस्टीट्यूशन में कोई विश्वास न था। उन्हें अपनी पत्नी के साठवें जन्मदिन पर कुछ विशेष उपहार देना था इसलिये वे उसके पास सुझाव लेने आये थे।

“पश्मीना की शाल बहुत अच्छी गिफ्ट है। हम उन रंगों का संयोजन ढूंढ सकते है जिस तरह का अफगान आप दोनों ने बुना था। ”

प्रोफेसर को सुझाव बहुत अच्छा लगा। वे प्रियंवदा को अपने साथ माल ले गये। प्रियंवदा के दिमाग में पश्मीना शाल के रंग व संयोजन का जो चित्र था उसे ढूंढने के लिये उन्हें कई दुकानों में जाना पड़ा। प्रोफेसर का धैर्य गजब का था।

माल के हर छोटे बड़े सुपर स्टोर में सस्ते, महंगे, इकोलाजिकल आदि आदि प्रसाधनों के काउंटरों पर काले ऐप्रन पहने सजी धजी लड़कियाँ रंगों व प्रसाधनों से भरी ट्रे और ब्रश लिये खड़ी थी। उनके पास सुन्दर महक थी। उनके रंग अलग-अलग थे। सबकी आंखों के और पलकों के रंग अलग-अलग थे पर भाषा एक जैसी थी। सबकी हंसी एक जैसी थी।

प्रोफेसर ने कहा था “कुछ नहीं है यह सिर्फ गुड़िया बनाने का काम है। जस्ट मेकिंग ए डॉल। प्रिया तुम मेकअप नहीं पहनती। गुड। ”

प्रियंवदा ने जवाब दिया “माल की लाइट बड़ी आर्टिफिशियल होती है। लड़कियाँ उस चौंधियाती लाइट में मेकअप करवाती है वैसा ही सीखती है। जब वे सूर्य की रोशनी में होती है वे बेरूप हो जाती है। ”

प्रोफेसर ने सराहना से देखकर कहा “एक्सीलेंट आब्र्जर्वेशन”

पूरी क्लास अपनी अपनी फायनल पेंटिंग पर काम कर रही थी। वह केनवास से कुछ दूर खड़ी हो कर पेंटिंग का आकलन कर रही थी। प्रोफेसर कब से उसके पीछे खड़े देख रहे थे वह जान नहीं पाई। उनकी आवाज सुन कर वह चौंकी।

“तुम्हारी पेंटिंग की सब तारीफ कर रहे है। तुम सोच रही हो आर्ट के सभी प्रिसिंपल युनिटी डायवर्सिटी फोर्स इमोशन गोल्डन मीन पर अरेंजमेंट सब तो है। ” प्रोफेसर ने उसका केनवास देखकर दुख और अफसोस से कमेंट किया “ड़ोंट मेक ए डाल । कम से कम तुमसे मै ये उम्मीद नहीं करता। ”

प्रोफेसर की आलोचना की गंभीरता को समझते ही उसका चेहरा उतर गया और आँखें भर गयी। फ्रस्टेड, आंखों में आंसू भरे हुए वह बोली “ मुझे अभी तक देखना नहीं आया। ”

“तुम्हें देखना तो आ गया पर तुम्हें जानना सीखना पड़ेगा। पेंटिंग एब्स्ट्रेक्ट है ये कई चीजें इवोक करती है। तुम अभी तक जानना नहीं सीखी। एक बार अपने आपको कही खो दो तुम जानना सीख जाओगी। मुझे विश्वास है। सभी जानते है सच्चा और दुर्लभ मोती ढूंढने के लिये समुद्र में गोता लगाना पड़ता है। जो कि एक कठिन काम है। आसान रास्ता है कल्चर्ड पर्ल, लेब क्रियेडेट स्टोन। टू इवोक इनर ब्युटी इज ए डिफिकल्ट टास्क। द ब्यूटी देट हेज इटस ओन लेग्वेज विदाउट वर्डस एंड वाईस”

काफी देर तक वह प्रकृति के रौद्र सम्मोहन और प्रोफेसर के शब्दों में बंदी बही रही। अतंतः किसी तरह उसने स्वयं को मुक्त किया।

घाटी के बाहर का वातावरण एकदम भिन्न था। प्रियंवदा को लगा वह अनंत काल बाद बाहर आई है। वह अपने आपको वातावरण से जोड़ने की कोशिश करने लगी। काफी दूर जाने के बाद कुछ बूंदाबांदी शुरू होने पर उसे छतरी की याद आयी। कुल तीन दिनों में यह तीसरी छतरी थी। उसने सोचा अब छतरी नहीं। मैं ऐसे ही घूमूंगीं । मैं भी अब इन पेड़ों की तरह भीगते हुए, काँपते हुए चारों ओर आँख फैला कर देखूंगी। उसने दोनों हाथ फैलाकर बारिश को अंगीकार कर लिया। उसने सोचा “मेरे बाल इतने छोटे है। मुझे इनके बिगड़ने का भय नहीं है। हवा मेरे सिर की चमड़ी को ही छुएंगी। अब हाथ मुक्त है क्योंकि इन्हें छतरी नहीं पकड़ना है। ” तभी उसे एक उल्टी पड़ी छतरी दिखाई दी। उसने सोचा शायद एरिक की छतरी उल्टी हो कर हवा में उड़ गयी। पर यह एरिक की छतरी नहीं लगती। यह तो दुबली पतली छतरी है जो हवा के हल्के झोंके में भी कच्ची पगडंडी पर घिसटती जा रही है। अगले क्षण उसका विचार बिल्कुल ही अलग दिशा में दौड़ा। वो सोचने लगी और कौन छतरी उड़ने देगा? यंग लवर्स, एक छतरी में पास पास दोनों के बीच कोई मस्ती और हवा का शरारती झोंका? किसकी छतरी होगी? जरूर कोई मोटर सायकिल पर जा रहा होगा पीछे वाले ने छतरी पकड़ रखी होगी। या कोई गांववाला अपनी घरवाली को सायकिल पर ले जा रहा होगा। उसकी घरवाली ने सिर ढंक रखा होगा। बूंदाबांदी रूक चुकी थी। प्रियंवदा ने आसपास के पेड़ों की तरह ही खुद को धुला हुआ महसूस किया।

वह परिचित रास्तों से अलग रास्ते पर चल रही थी। जिस रास्ते पर वह चल रही थी कुछ देर बाद वह तीन दिशाओं में बंट रहा था। एक दिशा जो किसी गली की ओर जाती थी उस तरफ निचाई की ओर होते हुए छोटे छोटे घर थे। दूसरी दिशा ऊँचाई की ओर किसी पहाड़ी टीले की ओर जा रही थी। तीसरी दिशा शहर की तरफ जा रही थी।

प्रियंवदा ने पहाड़ी टीले की ऊँचाई पर जाती सड़क का अनुसरण किया। आसमान में फैले स्याह बादल सूर्यास्त के नशीले रंगों से भरे जाम जैसे लग रहे थे। वह सूरज की गिरती किरणों में गली की रम्यता व विचित्रता को कौतुक से देख रही थी। लग रहा था जैसे घनघोर घटाओं में एक पेंचवर्क की रजाई या अफगान में घर दुबक कर बैठे हुए है। बड़ी देर तक वह वहाँ खड़ी उस गली को निहारती रही। चिमनी, कहीं-कहीं से उठता धुंआ, पहाड़, समतल जमीन। उस गली को जानने की इच्छा अदम्य होने के कारण वह पहाड़ी टीले से उतर कर गली की दिशा में चलने लगी।

कहीं खामोश रोशनी, कहीं बोलता अंधेरा। प्रियंवदा गली में चलने लगी। चारों ओर कीचड़, घरों पर खिडकियों दरवाजों पर जगह-जगह लटके चीथडें जो टीले पर से पेंचवर्क की रजाई जैसे दिख रहे थे। किसी-किसी घर में चीथड़ों को सलीके से लगाने की कोशिश की गयी थी। गेरू, पीला रंग, सस्ता सफेद रंग। गली में उबलती दाल , लहसुन प्याज के मसाले, बघार की गंध, जगह-जगह रूके पानी की बदबू, लकड़ी और कोयले जलने की धुंए की घुटन भरी थी। कोई भी गंध किसी से अलग नहीं की जा सकती थी। कई तरह की बातें और आवाजें बाहर तक सुनाई आ रही थी। मौसम खराब होने व अंधेरा हो जाने के कारण बाहर कोई नहीं दिख रहा था।

कोई बच्चा जोर जोर से पहाड़े रट रहा था। बरतन घिसती उसकी मां गर्व से उसे देख रही थी।

किसी घर से बच्चे की पिटाई के साथ भींचे स्वर बाहर आये “नहीं ला सकता तेरे लिये किताब। मास्टर को कहना खुद ला दे। क्लास की किताब के बाद कौन-सी किताब?”

किसी घर-घर में किसी से दिन भर बेचे गये भुट्टों, गुटकों, बीड़ी, चाकलेट का हिसाब पूछा जा रहा था। हिसाब पूछने वाली मिले हुए पैसे से संतुष्ट न थी।

कहीं से दुधमुंहे बच्चे के रोने की आवाज के साथ घंटी की टुनटुन और भजन का गान सुनकर उसने अधखुले दरवाजे में झांका । कोई वृद्धा दिया लगाकर भजन करते हुए बच्चे को चुप कर रही थी।

एक घर में कोई महिला आश्चर्य से पूछ रही थी “ आज मिठाई कैसे ले आये?”

जवाब आया “पंडित ने मंदिर साफ करने भेजा था। कोई अफसर पूजा करने के लिये आने वाला है। वहाँ एक बड़ी महंगी छतरी पड़ी मिली। हम क्या करते उसका। मैंने बेच दी। ”

कुछ दूरी पर प्रियंवदा ने देखा एक औरत अपनी साड़ी छुड़ा रही थी “छोड़ मुझे रंडी समझ रखा है क्या? चूल्हे की आग बुझ गयी तो और लकड़ी नहीं है मेरे पास जिस पर रोटियाँ सेंक लूं”

एक धूसर सा मकान जहाँ गली खत्म होती थी वहाँ अंदर कोई शराबी कह रहा था “थोड़ा पानी ही पिला दे। ”

औरत दांत पीसते हुए बोली “तेरी औरत नहीं हूं जो तेरे नखरे उठाऊॅ । अब यहाँ से फूट ले। तेरी आग को पानी की जरूरत नहीं है। मुझे पैसे चाहिये कल के लिये। ”

वहीं पर एक बुढ्ढा ठिठुर रहा था। वह प्रियंवदा से बोला “बेटी थोड़ा सहारा देकर सामने वाली झोपड़ी तक पहुंचा दो। छतरी तो हवा में उड़ गयी ठीक से पकड़ नहीं सका। ”

जिस तरह गली की कोई गंध पृथक नहीं की जा सकती थी उसी तरह कोई आवाज भी पृथक नहीं की जा सकती थी। जब वह गली से बाहर आयी तब घाटी, प्रकृति का सम्मोहन और गली का अनुभव दोनों जीवन का प्रवाह बन कर उसकी नसों में दौड़ रहे थे।

युनिटी, डायवर्सिटी, एम्फेसिस, गोल्डन मीन बिना किसी के बारे में सोचे वो केनवास के पास खड़ी आकलन कर रही थी।

दो तेरह चौदह साल के लड़के बातें करते उपर आ रहे थे “कीरत , वो साहब अच्छा था। जब मैंने उसके कमरे में खाने की थाली छोड़ी उसको कहा कि साहब अगर खाना बच जाये तो थाली में हाथ मत धोना। बचा खाना मै खा लूंगा। मैं जब थाली लेने गया तब देखा उसने मेरे लिये खाना निकाल कर खाना खाया था। ”

“अच्छा हुआ मालू। नहीं तो तू सबकी दाल सब्जी चखता रहता” कीरत ने ठहाका मारा।

दोनों प्रियंवदा को देखकर ठिठक गये और कौतुक से उसके पास रूक गये।

“आप वहीं मेम है न जो धोती वाले गोरे साहब के साथ घूम रही थी। अंगूठा और उंगली को गोल करके तालाब देख रही थी। ”

“अरे मालू नीचों की गली ऊंची टेकरी से कितनी अच्छी दिख रही है। ” कीरत ने केनवास को देखा और पहाड़ी से नीचे की ओर देखा। “हमने तो कभी यहाँ से उस तरफ देखा नहीं । ”

तभी मालू ने कीरत को कहा “देख यहाँ से दिख रहा है कि मेरे घर आज खाना नहीं है। ”

प्रियंवदा ने आश्चर्य से पूछा “कैसे मालूम तुझे?”

मालू ने प्रियंवदा की तरह उंगली और अगूंठे को गोल कर रखा था। उसमें से देखते हुए वह बोला “वो लाल रंग का मकान है एकदम कोने वाला उसमें से धुंआ नहीं उठ रहा” फिर केनवास की तरफ मुड़ा और संतुष्टि से बोला “तुमने सही बनाया है। ”

कीरत ने कहा “तालाब पर ही तो आपने हमसे हाथ भर लंबा भुट्टा खरीदा था। आपने बीड़ी भी तो खरीदी थी। हमको बड़ा अचरज हुआ था। आपके बालों और कपड़ों से हम आपको लड़का समझे थे। ”

उसके बायेँ हाथ पर बने गहरे नीले से जख्म को देखकर प्रियंवदा ने सहानुभुतिपूर्वक पूछा “ तेरा हाथ भुट्टा सेंकते हुए जल गया?”

कीरत “नेई उसमें तो कभी नहीं जला। उस दिन बारिश बहुत हो रही थी। मेरी मां बेचे हुए सामान से मिले पैसे से वैसे ही नाखुश थी। जब देखा कि मेरे पास छतरी भी नहीं है तो उसने गुस्से से चिमटा खींच कर दे मारा वो गरम था। छतरी मैंने रगडू को दे दी थी। बूढ़ा बेचारा काँप रहा था। पर उससे छतरी उड़ गयी।

वो ध्यान से कीरत को देखने लगी। चेहरे के केनवास पर दो कान, दो आँख, बीच में नाक, ओंठ। युनिटी, डायवर्सिटी, एम्फेसिस। सबकुछ पर सबसे बढ़कर कीरत के चेहरे पर मानवता, दया, करूणा, दर्द। चेहरे पर गोल्डन मीन, आंखों में गोल्डन मीन, आवाज में गोल्डन मीन ‘द मेजेस्टी आफ नेचर’।

प्रोफेसर रसेल उसकी पेंटिंग ‘नीचों की गली’ देखते ही उसमें खो गये। वे मंत्रमुग्ध बोले “यह एवार्ड विनिंग पेंटिंग है। तुमने जानना सीख लिया है। ”

“हां” वह बोली “जानने के लिये छतरी को भूलना पड़ता है। ‘गोल्डन मीन’ प्लेसमेंट में नहीं खामोशी में होता है। ”

विशेष नोट कला की संयोजना में ‘गोल्डन मीन’ को बहुत महत्व दिया जाता है। गणित में गोल्डन मीन ‘फाइ’ ‘पाइ’ की तरह का नियतांक है। गोल्डन मीन को कई नामों से जाना जाता है जिसमें से एक नाम है ‘दिव्य अनुपात’ ( डिवाइन रेशो )

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(वर्तमान साहित्य में पूर्व प्रकाशित)

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राजश्री का पौराणिक उपन्यास – क्षितिज की संतान यहाँ पढ़ें

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