सोमवार, 23 अगस्त 2010

संजय दानी की दो ग़ज़लें

(1)

दर्दे- दिल के अब नज़ारे नहीं होते, आजकल उनके इशारे नहीं होते ।
छोड़ कर जबसे गई तुम, कसम तेरी, अब तसव्वुर भी तुम्हारे नहीं होते ।

 
गर पतंगे बे-खुदी में नहीं जीते, शमा में इतने शरारे नहीं होते ।
जीत कर भी हारना है मुहब्बत में, जंग में इतने खसारे नहीं होते ।

 
है हिदायत उस खुदा की,करो उनकी तुम मदद जिनके सहारे नहीं होते ।
ये दग़ाबाज़ी घरों से हुई अपनी, वरना हम भी जंग हारे नहीं होते ।

 
ज़ख्म भी गहरा दर्द भी तेज़ है वरना, दुश्मनों को हम पुकारे नहीं होते ।
रो रही है धरती धूल धुआं कचरा से, आजकल मौसम इतने करारे नहीं होते।

ज़ीस्त की कश्ती चली जनिबे सागर, इस सफ़र में फ़िर किनारे नहीं होते ।
हुस्न से गर रब्त रखते नहीं दानी, तो जीवन भर हम अभागे नहीं होते।

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तसव्वुर- यादें, शरारे=आग, खसारे -नुकसान, ज़ीस्त--जीवन, जानिबे सागर  -सागर की ओर
रब्त -संबंध।

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(2)

तू मेरे सुर्ख गुलशन को हरा कर दे, ज़मीं से आसमां का फ़ासला कर दे।
हवाओं के सितम से कौन डरता है, मेरे सर पे चरागों की ज़िया कर दे ।

 
या बचपन की मुहब्बत का सिला दे कुछ,या इस दिल के फ़लक को कुछ बड़ा कर दे।
तसव्वुर में न आने का तू वादा कर, मेरी तनहाई के हक़ में दुआ कर दे।

 
पतंगे की जवानी पे रहम खा कुछ, तपिश को अपने मद्धम ज़रा कर दे ।
हराना है मुझे भी अब सिकन्दर को, तू पौरष सी शराफ़त कुछ अता कर दे।

 
मुझे मंज़ूर है ज़ुल्मो सितम तेरा, मुझे जो भी दे बस जलवा दिखा कर दे ।
तेरे बिन कौन जीना चाहता है अब, मेरी सांसों की थमने की दवा कर दे ।

 
शहादत पे सियासत हो वतन में तो, शहीदों के लहद को गुमशुदा कर दे।
यहीं जीना यहीं मरना है दोनों को, यहीं तामीर काशी करबला कर दे।
भटकना गलियों में मुझको नहीं आता, दिले-आशिक़ को दानी बावरा कर दे।

7 blogger-facebook:

  1. बड़ा ही मनभावन गज़ले है आपकी ..........बढ़िया

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  2. वाह! बहुत ही बढ़िया गज़लें हैं बधाई स्वीकारें।

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  3. किसी से भी नहीं निभा पाए 'मजाल',
    हमें तो लगा सिर्फ हमारे नहीं होते!

    उत्तर देंहटाएं
  4. या बचपन की मुहब्बत का सिला दे कुछ,या इस दिल के फ़लक को कुछ बड़ा कर दे।
    तसव्वुर में न आने का तू वादा कर, मेरी तनहाई के हक़ में दुआ कर दे।

    बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचनाएं, बधाई ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत अच्छी ग़ज़लें हैं...बधाई डॉ. साहब। पहली ग़ज़ल में इशारे, तुम्हारे, शरारे, खसारे, सहारे, हारे, पुकारे, करारे और किनारे जैसे सुंदर काफ़िये के साथ मक़ते के दूसरे मिसरे में अभागे जैसे काफ़िये को पढ़कर ताज्जुब हुआ।

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  6. आदरणीय महेन्द्र वर्मा जी उर्दू अदब में काफ़िया का निर्माण (आ,ए(ये),ऊ,) से मुकम्मल रूप से होता है। जैसे उपरोक्त रचना में "रे" की जगह जे,से,थे जैसे कोई भी वर्ण आ सकता जिस्में ए की मात्रा लगी हो क्यूंकि उर्दू में आलिफ़, वाव ,ये अपना अलग अस्तित्व रखते हैं। हम हिन्दी वालों को शुरू शुरू में ये अटपटा लगता है पर ये गज़ल की गायकी को स्थापित रखता है। मैं "अभागे" की जगह "बिचारे" लिख सकता था पर उर्दू में सही श्ब्द बेचारे है जो छंद को तोड़ रहा था। बहरहालआपकी टिप्पणी के लिये तहेदिल शुक्र्गुज़ार हूं। आपकी हर प्रकार की टिप्पणी देखने के लिये मैं आतुर रहूंगा।

    उत्तर देंहटाएं
  7. आदरणीय वर्मा जी हिन्दी के लिहाज़ से आपका प्रश्न उचित है ,लेकिन उर्दू अदब में आ,ऊ,ए सेपरेट वर्ण होते हैं अत: ओर अलग से नी्चे( जिस पर ये लगे हों उनकी समानता क़तई ज़रूरी नहीं है,( रे की जगह थे,ले भे सब पूर्ण रूप से काफ़िये का निर्वाह मुकम्मल रूप से करते हैं।टिप्पणी के लिये धन्यवाद। आगे भी आपकी किसी भी प्रकार की टिप्पणी का तहेदिल स्वागत है।

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