मंगलवार, 31 अगस्त 2010

महेन्द्र वर्मा की ग़ज़ल

ग़ज़ल

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उनकी भोली मुस्कानों से जलते हैं कुछ लोग,

जाने कैसी-कैसी बातें करते हैं कुछ लोग।

 

धूप चांदनी सीप सितारे सौगातें हर सिम्त,

फिर भी अपना दामन खाली रखते हैं कुछ लोग।

 

उनके आंगन फूल बहुत हैं मेरे आंगन धूल,

तक़दीरों का रोना रोते रहते हैं कुछ लोग।

 

इस बस्ती से शायद कोई विदा हुई है हीर,

उलझे-उलझे खोए-खोए दिखते हैं कुछ लोग।

 

खु़शियां लुटा रहे जीवन भर लेकिन अपने पास,

कुछ आंसू कुछ रंज बचा कर रखते हैं कुछ लोग।

 

जुल्म ज़माने भर का जिसने सहन किया चुपचाप,

उसको ही मुजरिम ठहराने लगते हैं कुछ लोग।

 

इतना ही कहना था मेरा बनो आदमी नेक,

हैरां हूं यह सुनते ही क्यूं हंसते हैं कुछ लोग।

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- महेन्द्र वर्मा

व्याख्याता, डाइट, बेमेतरा

जिला दुर्ग ,छ.ग.,491335

e mail-            vermamahendra55@yahoo.in

8 blogger-facebook:

  1. prabhaavit kiya gazal ne..............

    shaandaar post !

    उत्तर देंहटाएं
  2. अच्छे ख़यालात, मुबारकबाद।

    उत्तर देंहटाएं
  3. इतना ही कहना था मेरा बनो आदमी नेक,

    हैरां हूं यह सुनते ही क्यूं हंसते हैं कुछ लोग।
    kya baat, bahut sundar

    उत्तर देंहटाएं
  4. bahut hi achhi aur man ko chhoone wali
    panktiyan hain.... badhai

    उत्तर देंहटाएं
  5. श्रीकृष्णजन्माष्टमी की बधाई .
    जय श्री कृष्ण !!!


    हैरां हूं यह सुनते ही क्यूं हंसते हैं कुछ लोग।

    उत्तर देंहटाएं
  6. प्रिय अलबेला जी, डॉ. दानी जी, विक्रम जी, डॉ. मोनिका जी और अशोक जी, आप सबको ग़ज़ल पसंद आई, आभार। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं।

    उत्तर देंहटाएं
  7. इतना ही कहना था मेरा बनो आदमी नेक,

    हैरां हूं यह सुनते ही क्यूं हंसते हैं कुछ लोग।
    lajawab

    उत्तर देंहटाएं
  8. खु़शियां लुटा रहे जीवन भर लेकिन अपने पास,

    कुछ आंसू कुछ रंज बचा कर रखते हैं कुछ लोग।

    bahut khoosurat gajal.

    उत्तर देंहटाएं

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