शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

पुरुषोत्तम विश्‍वकर्मा के ४ चुनिंदा व्यंग्य

इस बिजली के मारे

चाचा दिल्‍लगी दास अक्‍सर अखबार में छपी हर छोटी मोटी खबरें पढा करते है। आज चाचा को अखबार पढ़ते-पढ़ते पसीना आ रहा था। बिजली के बिल वितरित हो चुके थे, अंतिम भुगतान तिथि करीब ही थी सो इतनी बिजली भी थी कि धीरे-धीरे ही सही मगर पंखा चल सके। सो चलने को पंखा भी चल रहा था इसके बावजूद भी चाचा को पसीना आने का क्‍या कारण हो सकता था मैं सोच ही रहा था कि काफी देर से चुपचाप बैठे चाचा उबल से पड़े। हां यह तो ठीक है कि सुनने वाला वहां मौजूद था वरना चाचा ने आज तक इसकी कतई परवाह नहीं की हैं।

चाचा बोले कि कमबख्‍त इस बिजली की तो कोई न कोई खबर आ ही जाती है। कहीं तो दिन दहाड़े नगरपालिका की रोड लाइटें जलती रहने की खबर तो कहीं किसी कस्‍बे के रातभर अंधेरे में डूबे रहने के लोभ हर्षक समाचार या किसी गांव में दौड़ती भैंस के बिजली के खम्‍बे से टकराकर मरने की गमजदा खबर और तो और फ्‍यूज बांधने या ढीला जम्‍पर टाईट करने के लाइनमैन द्वारा हफ्‍ता वसूली या नए कनेक्‍शन पर बख्‍शीस लेने तक के समाचार पढ चुका हूं, मैं अखबारों में। चाचा आगे बोले कि एक वक्‍त था जब बिजली के खम्‍बों पर हिन्‍दी,अंग्रेजी,उर्दू में ‘खतरा' शब्‍द लिखी प्‍लेटे लगी होती थी जिसके नीचे क्रास का निशान बनाती दो हडि्‌डयां व एक खोपड़ी का चिन्‍ह भी होता था ताकि हिन्‍दी,अंग्रेजी,उर्दू लिपि न जानने वाला भी झट से समझ जाए कि इसके पास नहीं जाना हैं। इतना ही नहीं लगभग आधा खम्‍भा कंटिले तारों से लिपटा रहता था। तब यह सब करने की इसलिए जरुरत पड़ती थी क्‍योंकि तब इन खम्‍बों पर झूलते तारों में बिजली प्रवाहित हुआ करती थी। आजकल तो खम्‍बों पर चीनी मिट्टी के इन्‍सूलेटर लगाने की जरुरत ही नहीं महसूस की जाती हैं। चाचा ने मुसलसल्‍ल अपना तफसरा जारी रखते हुए कहा तब तो बहुत कुछ हुआ करता था। नई लाइन बिछाने के लिए विभाग की अपनी टीम आती थी, विभाग अपनी गाड़ियों में भर-भर कर खम्‍बे, तार व अन्‍य सामान लाता था। आजकल की तरह न तो उपभोक्‍ताओं को खुद के ट्रेक्‍टर से खम्‍बे व सामान नहीं ढोना पड़ता था,न खुद के मजदूर लगवा कर पोल खड़े करने पड़ते थे। तब लाइनमैन बुलाने पर सरपट दौड़ा आता था और झट बंदर की तरह खम्‍बे पर चढ़कर फट से काम कर डालता था,आज की तरह किराये की सीढ़ी नहीं मंगवाता था। तब मीटर रीडर भी मीटर देखकर पठन लिया करता था और मीटर के पास टंगे रीडिंगचार्ट पर पठन तिथि व मीटर पठन भी अंकित करता था। तब के मीटर रीडर्स के पास महाभारत काल के ‘संजय' की तरह दिव्‍य दृष्‍टि नहीं हुआ करती थी कि घर बैठे ही तमाम मीटरों का पठन कर ले।

अन्‍त में चाचा ने अपनी धोती के पल्‍लू से फिर से छलक आए पसीने को पौंछा और बोले कि मुझे पसीना इसलिए नहीं आया था कि बिजली की दरें बढ गई है। न इस वजह से पसीना आया था कि गर्मी ज्‍यादा है और पंखा धीरे चल रहा है। मुझे पसीना इस कारण से आ रहा है कि बिजली के कारण होने वाले महापड़ाव का वो कैसे सामना करेंगे, क्‍या जवाब देंगे वो प्रदर्शनकारियों के नारों का। वो कहेंगे कि बिजली समुचित मात्रा में देंगे तो कोई पूछ लेगा कि अब तक क्‍यों नहीं दी तो बोलती बंद नहीं हो जाएगी? वो कहेंगे कि बिजली की दरों में की गई बढ़ोत्तरी वापस ले लेंगे तो कोई चुटकी काट लेगा कि बिजली दरों में इजाफा कर क्‍या तजुर्बा करना चाह रहे थे। मुझे तो शंका है कि हमारे ऊर्जा मंत्री में इतनी सी ऊर्जा भी शेष नहीं रहेगी कि वो इस उमड़े हुए जन सैलाब से खिताब भी कर सके। कहकर चाचा ने उतरते हुए पूछा कि क्‍या मुझे भी अमरूदों वाले बाग में जाना हैं। मैं तो देखने जा रहा हूंकि ये बिजली किसकी कुर्सी पर गिरने वाली है।

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यहां भूख से मरना कानूनन जुर्म है

चाचा दिल्‍लगी दास बचपन से ही एक नाटक कंपनी में काम करते आ रहे है। मगर जब से दूरदर्शन पर लोकसभा की दुर्दशा का सीधा प्रसारण शुरु किया गया है तब से लोगों का मंचीय नाटकों के प्रति रुझान घटता ही जा रहा है। सो इन दिनों चाचे का धंधा एकदम मंदा चल रहा है। कभी-कभी तो दर्शक श्राद्धपक्ष के कौओं की तरह विलुप्‍त हो जाते हैं। इसी कारण फाके पड़ने की प्रबल संभावनाएं बनती नजर आने लगी है। सो चाचा यही सोच-सोच कर अधमरा हुआ जा रहा था कि अब भूखे मरना पड़ेगा चाचा एक आध दिन में भूखे से मरने ही वाला था कि सरकार ने न्‍यायालय के डर से यह घोषणा कर दी कि अब किसी को भी भूख से मरने नहीं दिया जाएगा। चाचा ने यह सुनकर संतोष व्‍यक्‍त किया कि चलो मैं अब तक भूख ये मरा नहीं अगर इस घोषणा से पहले भूख से मर जाता तो यकीनन इस सरकारी ऐलान के फायदों से महरुम रह जाता। मगर मैं अब भी भूख से मरुँ तो मेरा कौन क्‍या बिगाड़ लेगा, और चाचा ताबड़तोड़ में नुक्‍कड़ के ठेके पर आए और एक पूरी थैली उदरस्‍थ करने के उपरांत सार्वजनिक बयान जारी कर दिया कि मैं भूख से मर रहा हूं। ' पांच-दस दिन गुजर जाने के बाद भी चाचा की तरफ से इस वक्तव्‍य का कोई आधिकारिक खंडन नहीं आया तो चाचा के भूख से मरने की खबर जंगल की आग की ज्‍यूं फैलने लगी। दृश्‍य मीडिया चिंघाड़ रहा था, प्रिन्‍ट मीडिया बड़े-बडे़ संपादकीय लिख रहा था। पटवारी से लेकर जिलाधिकारी तक सब के सब हरकत में आ गये थे। चहूं दिश एक ही चर्चा थी कि चाचा दिल्‍लगी दास भूख से मर रहा हैं। लाल, पीली, हरी, नीली आदि आदि रंगों की बत्‍तियों वाली गाड़ियां टूटी फूटी सड़कों को और रौंदती हुई दनदनादन दौड़ रही थी। गाड़ियों पर बड़े-बड़े पर्दे लगा थे। जिन पर लिखवाया गया था कि किसी को भी भूख से नहीं मरने दिया जाएगा। लाउड स्‍पीकरों पर कान फोड़ू आवाज़ में चेतावनियां दी जा रही थी कि भूख से मरना कानूनी अपराध है। अगर कोई भूख से मरने की गुप्‍त साजिश रच रहा हो तो तत्‍काल अपने आप को कानून के हवाले कर दे वरना क्‍या अंजाम होगा यह तो सर्वविदित है। उधर मंत्रीजी औसत वर्षा वाले क्षेत्रों का हवाई दौरा करके भूख से मरने वालों को सांत्‍वना दे रहे थे। सक्षम नेता भूख से मरने वालों को श्रद्धांजलि प्रदान कर रहे थे,उने रिश्‍तेदारसें को तसल्‍ली। सभी का ध्‍यान इसी तरफ था और उधर भूख से मरने से घबराकर सांसदों ने ताबड़तोब में अपने भत्ते और सहूलियात बढा लिए और जनता के लिए कई महत्‍वपूर्ण दिशा निर्देश जारी किए गए थे।

पटवारी को शमशान घाट के मुख्‍य रास्‍ते पर बैठाया गया था जो दफन होने जा रहे हर मुर्दे की अर्थी खुलवा कर देख रहा था। उसके भूख से न मरने की पुष्‍टि कर रहा था और नजराना लेकर शव उठाने दे रहा था। पुलिस ने सतर्कता बरतने के लिहोज से ऐलान करवा दिया था कि शव यात्रा के दौरान प्रयुक्‍त होने वाले शाश्‍वत वाक्‍यों के साथ-साथ 'यह व्‍यक्‍ति भूख से नहीं मरा है', वाक्‍य भी बोला जाए। इसे वैधानिक चेतावनी माना जाए। अस्‍पतालों में शव परीक्षण रिपोर्ट में एक घोषण छपवा दी गई थी, मैं भूख से नहीं मरा हूं और नीचे मकतूल के अंगूठे व चारों अंगुलियों के निशान लिए जा रहे थे। चिकित्‍सक मेडिकल रिपोर्ट में लिखते हुऐ मुर्दे के पेट में बिना पची सार्वजनिक वितरण प्रणाली, अन्‍त्‍योदय अन्‍न योजना, मध्‍यान भोजन योजना और अन्‍नपूर्णा योजना जैसी अनेक सरकारी योजनाओं के दाने पाए गये और इसके भूख से मरने के कोई इोस प्रमाण नहीं मिले।  मगर इन तमाम तामझाम और दौड़-भाग के बाद भी चाचा दिल्‍लगी दास भूख से मर रहा था। कोई साक्षात्‍कार ले रहा था तो कोई ऑटोग्राफ्‍स। एक समाज सेवी संस्‍था का प्रतिनिधि अवश्‍य एक दोने में कुछ लाया मगर चाचे को खिलाया नहीं केवल पास आया और खिलाने का उपक्रम करते हुए फोटो खिंचवाई बस। चाचा ये सब देखकर देखकर मन ही मन सोच रहे थे कि चलो गुमनामी की मौत से भूख से ही मरना भला। टीवी अखबारों में जगह मिल गई, मैं इस सदी की एक चर्चित शख्‍शियत बन गया हूं। वाह रे सरकारी घोषणा पास बैठे सरकारी नुमाइंदे की बुलेटिन भेजने की ड्‌यूटी लगी थी और समय हो गया था कंट्रोल रुम में रपट भेजने का सो वो संदेश भेज रहा था, चाचा दिल्‍लगी दास अभी तक तो भूख से नहीं मरा है,हां मर तो जाएगा पर अभी इसके भख से मरने का निश्‍चित समय बताना बहुत मुश्‍किल है। अभी और कितनी प्रतीक्षा करनी होगी कहा नहीं जा सकता। परदा गिरता है और नेपथ्‍य से आवाज आ रही है।

लो एक और मर गया भूख से।

तर्के ताअल्‍लुक कर गया भूख से॥

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'विचार जगत' में 14.12.2002 को प्रकाशित

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राजनीतिक पीड़ित पुर्नवास कोष

चाचा दिल्‍लगी दास भी उन बाज लोगों में से एक हैं जो अपने गमो गुस्‍से का इजहार फक़त झल्‍लाकर ही करना जानते हैं। आज भी वो लगभग शिकायत भरे लहजे में ही बोले, कहा कि भतीजे इस मुल्‍क में बाल सुधार गृह चलाये जा रहे हैं। खूंखार अपराधियों को ध्‍यान योग द्वारा आम शहरी बनने को मजबूर किया जा रहा हैं। यहां तक कि डाकुओं तवायफों के पुर्नवास के निरर्थक प्रयास किए जा रहे हैं। कहीे सूखा पड़ने की जरा सी भी भनक लगी नहीं कि उनकी सहायता के लिए तत्‍काल चंदा उघाना शुरु, कहीं बाढ़ आ जाने का समाचार मिलने भर कि देर हैं बस लोग मदद करने को हाजिर नाजिर , कई समाज सेवी संस्‍थाएं तो ईश्‍वर से अनवरत प्रार्थनाएं करती रहती हैं कि कहीं भूकम्‍प आये और उन्‍हें कुछ करने का मौका मिले। और तो और कई लोग तो दंगा पीड़ितों तक की सेवा करने के लिए सदेव एक टांग पर खड़े रहते हैं। मगर अफसोस बेचारे इन राजनीतिक पीड़ितों की खैर खबर लेने वाला कोई नहीं, यहां तक कि वो पार्टियां भी जिनके बेनरों तले वो चुनाव लड़ चुके होते हैं,उनको यदि इनसे अगर जरा सी भी हमदर्दी हो तो इन्‍हें राज्‍य सभा खेंचा जा ही सकता हैं और नहीं तो किसी बोर्ड वोर्ड में भी कोई नया पद सृजित कर इनको एडजस्‍ट करना कोई ज्‍यादा मुश्‍किल काम नहीं , हां पब्लिक हल्‍ला करे तो करती रहे । मुझे इन राजनीतिक विस्‍थापितों की बेचारगी पर मुझे बड़ा तरस आता हैं।

चाचा आगे बोले कि भतीजे इन चुनाव पीड़ितों की व्‍यथा कथा भी कर्ज के कारण खुदकुशी करते किसानों, गरीबी से तंग आकर अपराधी बने बच्‍चों ,सबलों से प्रतिकार लेने डाकू बने निर्बलों,मजबूरीवश जिश्‍म फरोशी करती औरतों से तनिक भी कम नहीं बल्‍कि देखा जाय तो उनकी तुलना में इनकी स्‍थिति कहीं ज्‍यादा दुःखद हैं कारण ये कि बेचारे ये राजनीतिक विस्‍थापित राजनीति करने के अलावा और कुछ करना ही तो नहीं जानते। अगले चुनावों का इन्‍तजार या मध्‍यावधि चुनावों की खुदा से दुआ के अलावा कुछ कर भी तो नहीं सकते। इनमें से कई कई बेचारे तो ऐसे भी हैं जिनकी पुश्‍तें ही इस लाइन में आ गयी थी अब जाएं भी तो कहां जाएं ? करें तो क्‍या करें ? सो मजबूरन इसी क्षेत्र में पड़े हैं। पूछो तो बड़ रुँआसे होकर कहते हैं कि अब तुम्‍ही बताओ बाबूजी हम राजनीति नहीं करेंगे तो खायेंगे क्‍या। इस पेट की खतिर यहीं पड़े हैं। अब हमें कुछ भी नहीं अखरता,हमने तो खुद को हालात के हवाले कर दिया हैं। बस जीना यहीं मरना यहीं,जब तक सांस हैं कुर्सी की आस हैं। वैसे भी आपका ये तथाकथित समाज हमें कौनसी इज्‍जत की नज़र से देखता हैं। चलो आप कोई जगह बता दो जहां हरामखारी कर शान शौकत से रह सकें। आपकी कसम फिर कभी इस तरफ कभी नजर उठा कर भी नहीं देखेंगे। मगर आप हमें सुखी सहानुभूति जता रहे हो ,अपने घर ले चलो किसी काम पर रख लेना।

कहते कहते चाचा की आँखों में आंसू छलक आये थे। आंसू अपने फटे कुर्ते की आस्‍तीन से पोंछ कर फिर कहने लगे कि भतीजे मुझे तो इन चुनाव पीड़ितों पर बड़ा तरस आ रहा हैं और जो चुनाव हार जाते हैं उनकी दुर्गति तो बयान करना भी मुमकिन नहीं। पैसे खर्च कर टिकट का जुगाड़ करते हैं ,चुनावों में बेतहाशा पैसा उड़ते है और वोट मांगते मांगते रोटियां मांगने तक की नौबत आ जाती हैं। तभी तो मैं सोच रहा हूँ कि एक ‘चुनाव पीड़ित राहत कोष‘ स्‍थापित किया जाए, जिससे इन मजलूमों की कुछ मदद की जा सके, और ये तो उनके सोचने की बात हैं जो आज राजनीतिक पदों पर काबिज हैं, यह दिन एक न एक दिन तो उनको भी देखना हैं। जब तक कोई पुख्‍ता इन्‍तजाम नहीं हो जाता इनको तत्‍काल देने के मकसद से इनसे बिजली पानी टेलिफोन के बिलों की वसूली मुल्‍तवी कर दी जाये। सरकारी बजट में इसके लिऐ एक निश्‍चित प्रतिशत का प्रावधान हो। जिस कोष में से एक रकम हर माह इन विस्‍थापितों को दी जाए। अगर वो रकम कम पड़े तो शेष रकम इनको कालाबाजारियों, घूसखोरों से वसूलने की खुली छूट देकर कम से कम इनका जीवनयापन तो सुरक्षित किया जाए।

चाचा जाते-जाते अपने मसखरेपन पर उतर आए, बोले कि ये हार जाने का गम बड़ी आसानी से बर्दाश्त कर लेते हैं। हृदयघात इनको इसलिए नहीं होता है कि इनके सीने में हृदय होता कहां है। कैंसर इनको होगा कहां से ये खुद ही राजनीति के लिए कैंसर है। फ़ालिज इन पर रहम कर देता है कि जब बेचारे का भविष्‍य ही फ़ालिज का शिकार है तो क्‍यों इसकी गंदी काया पर गिरकर खुद को नापाक करूं।ये कभी मरेंगे तो सिर्फ किसी सड़क हादसे में। सो इनका कार एक्‍सीडेंट करवा दिया जाए। ताकि एक बार फिर सचित्र समाचार छपे कि ‘फलां नेता की सड़क हादसे में मौत'। जब इनकी रूह अपनी खबर कई दिनों बाद अखबार में पढ़ेगी और तत्‍काल दोजख का रास्‍ता पकड़ेगी ।

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यह इंडिया की डेमोक्रेसी है!

आज जब चाचा दिल्‍लगी मिलें तो जरा खामोश से थे। मेरे नमस्‍कार का प्रत्‍युत्तर भी बिना किसी गर्मजोशी के महज खानापूरी के बतौर हाथ की जुंबिश से ही दिया। जब-जब भी चाचा को इस दशा में देखा है उनकी जुबान जल्‍दी-सी नहीं खुलती। भले ही चाचा की बक-झक कोई हजम होने वाली चीज नहीं, मगर चाचा की चुप्‍पी भी प्रायः एक मूक आंदोलन साबित हुई है। सो,चाचा के होठों की हड़ताल तुड़वाने की गरज से मैंने कहा, क्‍यों चाचा! आज फिर मौनव्रत धारण कर लिया है या बोलती बंद हो गई? मगर चाचा ने मेरी ओर पुतलियां करके एक उचाट-सी नजर से देखा और फिर उसी स्‍थिति को प्राप्‍त हो गए।

काफी इंतजार के बाद भी चाचा न बोले, तो मुझे यकीन हो गया कि मेरी छेड़खानी नाकाफी रही हैं सो चाचा की पसंद के ताजातरीन मुद्दों पर आ गया और बोला-चाचा! कल संसद के अंदर देखा, क्‍या हुआ? संसद सब्‍जी मण्‍डी सी नजर आ रही थी, बिके हुए लोग फिर बिक रहे थे। मुँहमांगी रकम नहीं मिलने पर कई बिकते-बिकते रह गए थे। अपने ‘ईमानदार' अर्थशास्‍त्री जी पूरी संसद को खरीदने जितने अर्थ की व्‍यवस्‍था करके आए थे। कुर्सी बचाए रखने की धुन में अपनी ईमानदारी दिखाने की ठान कर आए थे। अपने पाले में पाले हुए, खरीदे हुए, धमकाए हुए, जेलों से निकाल कर लाए हुए कांधियों की फौज जमा किए बैठे थे। सही अर्थों में मनमोहन सिंह जी ने सबको अपनी-अपनी औकात से रुबरु करवा दिया।

मेरा मानना है कि ‘परमाणु करार' जैसे मुद्दे पर इतना हो-हल्‍ला मचाना मात्र एक बहाना था। न तो अविश्‍वास प्रस्‍ताव लाने के पिछे कोई राष्‍ट्र हित का मुद्दा था न ही अविश्‍वास प्रस्‍ताव के विरुद्ध विश्‍वास मत हासिल करने के आगे कोई राष्‍ट्र हित नजर आता। जो सरकार के पाले में खड़े है, उनको भी राष्‍ट्रहित से कोई लेना-देना नहीं, तो जो सरकार गिराने पर आमादा है, न उनको आम आदमी के हितों से कोई सरोकार। अगर मौजूदा सांसदों में किसी को भी देश की फिक्र होती, तो अपने पदों से इस्‍तीफे दे दिए होते। देश की फिक्र न सही, अपनी नाक की थोड़ी-बहुत ही परवाह रही होती, तो अब तक कितने ही मौके आए थे खुदकुशी कर लेने के।

चाचा फिर भी नहीं बोले, तो मुझे अपनी खुद की काबिलियत पर शक होने लगा और बोला कि चाचा! देखा होगा अपने सोमनाथ दादा को पार्टी के समर्थन वापस न लेने तक पार्टी के पॉलित ब्‍यूरो की हर छोटी-बड़ी मीटिंग में गए और तब कोई पूछता कि दादा! एक स्‍पीकर के पद पर बैठे व्‍यक्ति को किसी राजनीतिक पार्टी से क्‍या लेना देना, तो वो यकीनन कहते पार्टी लाइन से कुछ भी बड़ा नहीं और आज जब पार्टी के मना करने पर भी कुर्सी से चिपके रहे, तो स्‍पीकर का पद पार्टी लाइन से ऊपर हो गया। विपक्ष वालों को कभी खुलकर बोलने नहीं दिया और सत्ता पक्ष वालों ने जब विपक्ष की खिल्‍ली उड़ाई, तो दादा ने सबसे पहले ठहाका लगाया और सबके बाद हंसना बंद किया। सिर्फ स्‍पीकर की गरिमा के लिए। अबकी बार मुझे लगा कि चाचा कुछ कहना चाह रहे हैं। लोहा गर्म देखा, तो फिर चोट की और बोला कि चाचा! अपने प्रधानमंत्री जी कह रहे है कौन कहता है कि विश्‍वास मत हासिल करने के लिए सांसदों की खरीद-फरोख्‍त हुई है? किसी के पास कोई प्रूफ है, तो बताए। बताओ चाचा! मैं अब सबूत-प्रूफ कहां से लाऊँ? इन दो कौड़ी के सांसदों को क्‍या पक्‍का बिल लेकर करोड़ों में खरीदा गया था ? वो सच्‍चे है,तो साबित करके दिखाएं, चाचा उठे और जाते जाते कह गए ‘यह इण्डिया की डेमोक्रेसी है भीडू'

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