मंगलवार, 31 अगस्त 2010

दीनदयाल शर्मा की बाल कहानी – मित्र की मदद

बाल कथा-

मित्र की मदद : दीनदयाल शर्मा

Rajasthani Hindi child writer Deendayal Sharma. 1 JPG

एक थी गिलहरी और एक था तोता। गिलहरी का नाम था गिल्लू और तोते का नाम था टिल्लू।

गिल्लू और टिल्लू पक्के दोस्त थे। गिल्लू पीपल के पेड़ पर रहती थी और टिल्लू नीम के पेड़ पर। पीपल और नीम के दोनों पेड़ भी पास-पास ही थे। इस कारण गिल्लू और टिल्लू दोस्त के साथ-साथ पड़ोसी भी थे। दुख-सुख में दोनों एक दूसरे की मदद करते।

एक दिन की बात है। गिल्लू पेड़ के कोटर में सो रही थी। उसे हल्की-हल्की ठण्ड महसूस होने लगी। धीरे-धीरे उसे ज्यादा ठण्ड लगने लगी। गिल्लू को घबराहट सी होने लगी। उसने देखा कि उसका शरीर कुछ गर्म सा हो रहा है। उसे अपनी मां की याद आने लगी। मां कहती थी-कि यदि सर्दी लगकर बुखार चढ़े तो यह मलेरिया बुखार का लक्षण है। ऐसा होने पर पास ही लगे सिनकोना के पेड़ की दो-दो पत्तियां सुबह-शाम खानी चाहिए। बुखार तभी ठीक होगा। गिल्लू को अपने शरीर में कुछ कमजोरी सी महसूस होने लगी।

उसने लेटे-लेटे ही अपने दोस्त टिल्लू को आवाज दी-टिल्लू। टिल्लू। ओ टिल्लू। कई बार आवाजें दी लेकिन टिल्लू की तरफ से कोई उत्तर नहीं आने पर वह उठी और सिनकोना के पेड़ से चार पत्तियां तोड़कर लाई। उसने दो पत्तियां चबा ली। अब उसे सर्दी लगना कुछ कम हो गया था। वह पेड़ के कोटर में आकर सो गई। सुबह अपनी आदत के अनुसार गिल्लू जल्दी ही उठी और कुल्ला - मंजन करके सिनकोना की दो पत्तियां फिर चबा ली। कुछ देर बाद उसने महसूस किया कि उसका बुखार उतर गया है। वह अब स्वस्थ थी। वह अपनी कोटर से बाहर आई और अपने दोस्त टिल्लू तोते को आवाज दी। टिल्लू की तरफ से कोई उत्तर नहीं आया।

वह पीपल के पेड़ से नीचे उतरी और नीम के पेड़ के पास पहुंची। उसने टिल्लू को फिर आवाज दी। वह सोचने लगी कि टिल्लू को भी बुखार हो गया होगा। वह नीम के पेड़ पर चढ़ी तो देखा कि टिल्लू घोंसले में नहीं था। उसे चिंता होने लगी कि टिल्लू कहां चला गया। गिल्लू नीम के पेड़ से नीचे उतरी तो देखा कि कुछ लोगों के पैरों के निशान थे। उसने सोचा कि टिल्लू को कोई आदमी पकड़ कर ले गया है। वह पैरों के निशान देखती-देखती आगे बढऩे लगी। तभी उसे टिल्लू की आवाज सुनाई दी। गिल्लू के कदम रुक गए। वह इधर-उधर देखने लगी। उसे टिल्लू की आवाज फिर सुनाई दी। वह उस आवाज की तरफ बढ़ऩे लगी।

उसने देखा कि एक बहुत बड़े मकान के सामने लगे नीम के पेड़ पर एक पिंजरा लटक रहा है। टिल्लू तोता उसी में कैद था। गिल्लू दबे पांव पेड़ पर चढ़ गई। पिंजरे के पास जाकर वह टिल्लू तोते से धीरे से बोली-घबराओ नहीं टिल्लू, तुम्हारी मदद के लिए मैं आ गई हूं। इतना कहते-कहते गिल्लू ने पिंजरे के दरवाजे की कुंडी खोल दी। खुशी से टिल्लू की आंखों में आंसू आ गए। गिल्लू बोली टिल्लू देर मत करो, उड़ जाओ और फिर टिल्लू फुर्र से उड़ गया। टिल्लू की आजादी देखकर गिल्लू गिलहरी की आंखें भी नम हो आईं। वह अपनी नम आंखों से उसे बहुत देर तक देखती रही।

-दीनदयाल शर्मा, मानद साहित्य संपादक, टाबर टोल़ी, हनुमानगढ़ जं. -335512, राजस्थान,

2 blogger-facebook:

  1. प्रेरक कथा।
    ..दीन दयाल शर्मा जी का बाल मन में, अपनी कविताओं और कहानियों के द्वारा अच्छे संस्कार डालने का प्रयास, अनुकरणीय है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह शर्मा जी

    उत्तम विषय पर उतम बालकथा.......

    उम्दा पोस्ट !

    उत्तर देंहटाएं

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