मंगलवार, 3 अगस्त 2010

शरद जायसवाल की कविता – सुपुर्द-ए-खाक

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सुपुर्द-ए-खाक

जब करना

मुझे

ताकीद कर देना !

दिल

मैं साफ कर लूंगा

बहा के

अश्क आंखों से !!

 

(2)

थाम के

हाथ में पत्थर

चला वो सामना करने !

ये

आदिम -युग नहीं यारों

यहां

बंदूक चलती है!

---

 

-शरद जायसवाल कटनी म.प्र. इंडिया

4 blogger-facebook:

  1. सुपुर्द-ए-ख़ाक...कर देना..
    खूब अंदाज़ है.आप तो लिजेंड हो गए हैं ब्लॉग jagat के.

    पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार-लेखक गिरीश पंकज को : बाज़ार में मीडिया
    http://hamzabaan.blogspot.com/2010/08/blog-post.html

    उत्तर देंहटाएं
  2. दोनो ही अनमोल हैं………………क्या भाव संजोये हैं……………एक बहुत ही गहरी बात कह दी………………दोनो रचनाये दिल मे उतर गयीं।

    उत्तर देंहटाएं
  3. दोनों अच्छी लघु कवितायें

    उत्तर देंहटाएं
  4. छोटी कविताओं में एक युग की फ़िलासफ़ी। बधाई

    उत्तर देंहटाएं

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