सोमवार, 23 अगस्त 2010

राजेश विद्रोही का गीत - अक्‍सर वे ही गीत अमर हो जाया करते हैं

 

दर्द भरे स्‍वरों में जिनको गाया करते हैं।

अक्‍सर वे ही गीत अमर हो जाया करते हैं॥

 

जाने कितने गीत लिखे हैं मीत जुदाई में।

सावन के स्‍वागत में, पावस की अगुवाई में॥

फिर भी उन गीतों का दर्जा सबसे उपर हैं।

पोर-पोर तक पगे रहे जो पीर पराई में॥

विरही के व्‍याकुल मन को जो भाया करते हैं।

अक्‍सर वे ही गीत अमर हो जाया करते हैं॥

 

महज कल्‍पना से जिनका श्रृंगार नहीं होता।

दिवा स्‍वप्‍न जिनका अक्‍सर आधार नहीं होता॥

जिनके शब्‍द विहंग आदी हैं अमित उड़ानों के

जिनके अम्‍बर का निश्‍चित आकार नहीं होता॥

जो सपनों के समीकरण सुलझाया करते हैं।

अक्‍सर वे ही गीत अमर हो जाया करते हैं॥

 

शायर,सिंह, सपूतों का आदर्श रहा जिनका,

बंध्‍ो नहीं जो परम्‍परा की अंधी कारा में।

जिनका वर्गीकरण असभ्‍भव प्रायः होता है,

किसी वाद या बंधी-बंधाई चिंतन धारा में॥

वादों का व्‍यामोह सदा झुठलाया करते हैं।

अक्‍सर वे ही गीत अमर हो जाया करते हैं॥

 

सिवा दर्द की भाषा के अन्‍यत्र किसी में भी,

जिनके भावों का अक्‍सर अनुवाद नहीं होता।

किसी एक भाषा तक सीमित रह जाने का भी,

जिनके अन्‍तस को बहुधा असवाद नहीं होता॥

ढाई आखर तक सीमित रह जाया करते हैं।

अक्‍सर वे ही गीत अमर हो जाया करते हैं॥

 

प्‍यासे तन की भूख भले अभिव्‍यक्‍ति पा जायें,

मगर हिये की हूक कहां शब्‍दों में ढलती है।

शब्‍दों का सामर्थ्‍य समर्पण जब कर देता है,

आंखों के जरिये अन्‍तर की व्‍यधा पिघलती है।

जो आकुल अन्‍तस की दाह बुझााया करते हैं।

अक्‍सर वे ही गीत अमर हो जाया करते हैं॥

 

सभ्‍भव है कुछ गीत तुम्‍हीं को संबोधित होंगे।

लेकिन यह संबोधन भी सांकेतिक भाषा में॥

अभिधा और व्‍यंजना में जो व्‍यक्‍त न हो पाये,

कुछ ऐसे ही भाव चढ़े परवान निराशा में॥

कुछ मजबूर गीत ऐसे भी होते है जिनमें,

सर्वनाम संज्ञाओ पर छा जाया करते हैं॥

लेकिन वे ही गीत अमर हो जाया करते हैं॥

 

मुझे न ये अफसोस कि मेरे अनगढ़ गीतों की,

भाषा और व्‍यंजना अब तक प्रौढ़ न हो पायी।

मेरे बिम्‍बों से अब तक बचपना झलकता है॥

शिशुवत शब्‍दों में न अभी तक आई तरुणाई॥

मगर स्‍नेह के स्‍वर में जो तुतलाया करते हैं।

अक्‍सर वे ही गीत अमर हो जाया करते हैं॥

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राजेश ‘विद्रोही'

लाडनू नागौर राजस्थान

341306

6 blogger-facebook:

  1. ऐसे ही गीत तो टिप्पणियों को उकसाया करते है!

    उत्तर देंहटाएं
  2. राजेश विद्रोही जी
    का ओजस्वी गीत यहां पढ़ कर सुखद आश्चर्य हुआ ।
    प्रस्तुत गीत का शब्द शब्द प्रभावशाली है ।

    संभव है कुछ गीत तु्म्ही को संबोधित होंगे।
    लेकिन यह संबोधन भी सांकेतिक भाषा में॥
    अभिधा और व्यंजना में जो व्यक्त न हो पाए,
    कुछ ऐसे ही भाव चढ़े परवान निराशा में॥
    कुछ मजबूर गीत ऐसे भी होते है जिनमें,
    सर्वनाम संज्ञाओ पर छा जाया करते हैं॥
    लेकिन वे ही गीत अमर हो जाया करते हैं॥

    वाह राजेश जी !
    गीत के एक एक बंद को उद्धृत करने को मन करता है ।

    बहुत बहुत बधाई और मंगलकामनाएं !



    - राजेन्द्र स्वर्णकार
    शस्वरं

    उत्तर देंहटाएं
  3. rajsh vidrohi ki kavta padh kar laga ki unhone ye kavita itani hi kyon likhi.bhai ne is itani si kavita men chhand,alankar,shbd shilp,laxana,vyanjana'abhidha sab kuchh hai. yani ek padhya rachana men jitani khubiyan hoti hai vo sab ki sab kewal ek hi rachana men samahit kar di.yun kahen ki ye ek dimgal ki pratikriti hai to sayad atishayokti nahi goga.bhai ravi ratalami ji ko is rachana se rubaroo karwane ke kiye dhanyawad

    उत्तर देंहटाएं
  4. rajesh vidrohi ji,
    kyaa kahoon, kaise kahoon ?
    padh kar gajal tumhaari main hosh men nahee.

    उत्तर देंहटाएं
  5. MAGAR SNEHA SWAR ME JO TUTLAYA KARATE HAI
    AISE Hi GEET AMARA HO JAYA KARTE HAI.

    VERY NICE .

    उत्तर देंहटाएं
  6. कुछ मजबूर गीत ऐसे भी होते है जिनमें,

    सर्वनाम संज्ञाओ पर छा जाया करते हैं॥

    लेकिन वे ही गीत अमर हो जाया करते हैं॥
    @कौन कहता है कि गीत बीती बात हो गया है? गीत आज भी ज़िन्दा है और शान से जिन्दा है। राजेश विद्रोही को बधाई। उनके हमनाम एक मेरे मित्र लखनउ में थे जो अब नहीं हैं।

    उत्तर देंहटाएं

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