रविवार, 29 अगस्त 2010

राजेश ‘विद्रोही’ की ग़ज़लें

(1)

नानक की नेकियों को भुनाते रहे हैं हम ।

गौतम का पुण्‍य बेचकर खाते रहे हैं हम ॥

 

जारी है अब तलक भी अँधेरों की अर्चना ।

सदियों से ज्‍योति पर्व मनाते रहे है हम ॥

 

दहशत के दरमियान गुजारी है जिन्‍दगी ।

डरते रहे है और डराते रहे है हम ॥

 

‘बोफोर्स' का सौदा हो या कोठों की दलाली।

सच मानिये हराम की खाते रहे हैं हम ॥

 

अब तुम इसे जुनून कहो या कि बेबसीं ।

ज्‍वालामुखी पे जश्न मनाते रहे हैं हम ॥

 

रिश्वत को इक रिवाज-सा हमने बना दिया।

खाते रहे हैं और खिलाते रहे हैं हम ॥

 

‘राजेश' किस जुबां से कहूँ ये सफेद झूठ।

कि इंसानियत के दीप जलाते रहे हैं हम ॥

----.

(2)

ग़ज़ल बुढ़ापा करेगा असर धीरे-धीरे।

झुकेगी तुम्‍हारी कमर धीरे-धीरे ॥

 

उमर भर सुने थे रवानी के किस्‍से।

हुई जिन्‍दगानी बसर धीरे-धीरे ॥

 

मिलेगा तुम्‍हें भी किसी रोज चश्मा ।

कि कमजोर होगी नज़र धीरे-धीरे ॥

 

अभी इब्‍तिदा में तो समझे हो जन्‍नत ।

बढे़गा मग़र दर्दे-सर धीरे-धीरे ॥

 

अभी तक तो राशन में मिलती नहीं है।

सिमेंटेड होगी क़बर धीरे-धीरे ॥

---

राजेश ‘विद्रोही'

लाडनू नागौर राज

341306

2 blogger-facebook:

  1. बेहद ख़ुबसूरत ग़ज़लियात ख़ासकर प्रथम वाली,"अब तुम इसे जुनून कहो कि बेबसी,ज्वालामुखी पे जश्न मनाते रहे हैं हम" बेहतरीन शे"र। मक्ता की दूसरी पक्ति में "कि" शब्द शायद धोखे से लग गया है,हटा लें बहर को तोड़ रहा है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. अब तुम इसे जुनून कहो या कि बेबसी,
    ज्वालामुखी पे जश्न मनाते रहे हैं हम।, ख़ूबसूरत शे"र ,सुन्दर ग़ज़ल।
    पर मक्ता की दूसरी लाईन में "कि" शब्द शायद धोखे से लिखा गया है,
    "बहर "को प्रभावित कर रहा है ,क्रिपया हटा लें।

    उत्तर देंहटाएं

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