विजय वर्मा के हाईकु – बाढ़ में बरसात

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(जापानी कविता शैली – त्रिपदम का उच्चारण हाइकु है या हाईकु? अभिव्यक्ति व अनुभूति पर दोनों ही प्रचलित हैं. विकिपीडिया पर मूल जापानी स्वर से हाईकु का आभास होता है. तो चलिए, हाईकु ही प्रयोग में लाते हैं. )

दी में बाढ़

जिंदगी हलकान

मुश्किल घड़ी.

 

डूबे मकान

बर्बाद खलिहान'

ये कैसी घड़ी?

 

रातभर थी

ठिठुरती गईया

जल में खड़ी.

 

आसमान से

गिरेगा खाना, आँखें

ऊपर गड़ी.

 

अभी तो. रुकी

डर है होगी शुरू,

फिर से झड़ी.

 

जिस नाव  पे

हम चढ़े,उस पे

नागिन चढ़ी.  

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विजय कुमार वर्मा डी एम् डी -३१/बी,बोकारो  थर्मल

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5 टिप्पणियाँ "विजय वर्मा के हाईकु – बाढ़ में बरसात"

  1. वाह बहुत ही सुन्दर

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  2. बेनामी9:28 pm

    बढ़िया

    उत्तर देंहटाएं
  3. जिस नाव पे
    हम चढ़े,उस पे
    नागिन चढ़ी.

    ..यह हाईकु एक अलग अर्थ रोमांचित कर देता है. मंजिल की तरफ जब हम कदम बढ़ाते हैं तो अक्सर आस्तीन के सांप हमें डस लेते हैं.

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  4. बाढ की विभिषका से लबरेज़ ये कविता अपने संयोजन के दम से
    हल्का हास्य बोध भी करा रही है । वर्मा जी को बहुत बहुत बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

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