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September 2010
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सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष 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दिख रही है मंच पर, जो सुन्दरी ऐ दोस्तों

कल दिखेगी भूतनी, मैकप उतर जाने के बाद।

 

कर रही है नाज अपने खेत और खलिहान पर

घास फूंस रह जायेगी, साजन के घर जाने के बाद।

 

सप्त सुर की ढोलकी सी, बज रही है रात दिन

ढपला वो रह जायेगी, चमड़ी उधड़ जाने के बाद।

 

रंग रोगन से सजाई, सेकण्ड हैण्ड दूकान को

कौन पूछेगा उसे कबाड़ी के दर जाने के बाद।

 

कांच की दूकान में जब पड़ती है पत्थर की चोट

कौन पूछेगा प्रिय, दर्पण दरक जाने के बाद।

 

साधु सन्यासी महात्मा मुल्ला हो या पादरी

खाक में मिल जाएंगे, पतझर में झर जाने के बाद।

 

धीरे-धीरे भोगिये, जीवन के आनंद को

क्या रखा है देखना, बसंत गुजर जाने के बाद।

 

चढ़ गई है मंच पर, फिर देखिए सुर की नदी

कीचड़ ही कीचड़ बचेगी, नदिया उतर जाने के बाद।

 

रात दिन नोटों की बारिश, खा रही दीमक जिन्हें

मिट्टी में मिल जायेगी, ठुइयाँ के उर जाने के बाद।

 

शोहरतें मिलती है केवल, एक सीमा तक हुजूर

जमीन पर आ जाएगी, पर के कतर जाने के बाद।

 

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धूमकेतु के हास्य व्यंग्य काव्य संग्रह – देख रहे हो भोलेनाथ से साभार.

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मुक्‍तक

त्‍यागकर स्‍वार्थ का छल भरा आवरण

तू दिखा तो सही प्‍यार का आचरण

शूल भी फिर नहीं दे सकेंगे चुभन

जब छुअन का बदल जाएगा व्‍याकरण

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सत्‍य को त्‍यागकर व्‍यक्‍ति जीवित नहीं

सत्‍य की राह में ग्‍लानि किंचित नहीं

झूठ बेशक परेशान करता रहे

पर कभी सत्‍य होता पराजित नहीं

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भोर बचपन लगी तो सुहानी लगी

दोपहर में जवानी दिवानी लगी

जब ढली साँझ मुख पर पड़ीं झुर्रियाँ

रात को मृत्‍यु ही राजरानी लगी

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द्वंद हर साँस का साँस के संग है

हो रही हर समय स्‍वयँ से जंग है

भूख - बेरोज़गारी चुभे दंश - सी

ज़िन्‍दगी का ये कैसा नया रंग है

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; 2 द्ध

मंद शीतल सुगंधित पवन का कथन

है निराला यहाँ रोशनी का चलन

जुगनुओं के नयन की थकन को नमन

हैं अधूरे सपन पर न कोई शिकन

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प्‍यार इतना न मुझसे जताया करो

बादलों को पता मत बताया करो

ये पवन भी चुगलखोर-सी हो गई

खुशबुओं को न यूँ ही उड़ाया करो

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दर्द की दास्‍ताँ क्‍या कहूँ क्‍या लिखूँ

बुझ रही हर शमा क्‍या कहूँ क्‍या लिखूँ

कर रहीं खुदकुशी नित नई कोंपलें

रो रहा आसमाँ क्‍या कहूँ क्‍या लिखूँ

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ज़िन्‍दगी को सुहानी कहें किस तरह

दर्द की हर कहानी कहें किस तरह

मौन साधे रही पुष्‍प की हर व्‍यथा

खुशबुओं की रवानी कहें किस तरह

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नाम ः योगेन्‍द्र कुमार वर्मा

साहित्‍यिक नाम ः व्‍योम'

पिता का नाम ः स्‍व0 श्री देवराज वर्मा

जन्‍मतिथि ः 09ण्‍09ण्‍1970

शिक्षा ः बी.कॉम.

सृजन ः गीत, ग़ज़ल, मुक्‍तक, दोहे, कहानी, संस्‍मरण आदि

कृति ः इस कोलाहल में (काव्‍य-संग्रह)

प्रकाशन ः प्रमुख राष्‍ट्रीय समाचार पत्रों, साहित्‍यिक पत्रिकाओं

तथा अनेक काव्‍य-संग्रहों में रचनाओं का प्रकाशन

प्रसारण ः आकाशवाणी रामपुर से अनेक बार कविता कार्यक्रम

प्रसारित

सम्‍प्रति ः लेखाकार (कृषि विभाग, 0प्र0)

विश्‍ोष ः संयोजक - साहित्‍यिक संस्‍था अक्षरा' , मुरादाबाद

सम्‍मान ः काव्‍य संग्रह इस कोलाहल में' के लिए भाऊराव देवरस सेवा न्‍यास

लखनऊ द्वारा पं0 प्रताप नारायण मिश्र स्‍मृति सम्‍मान-2009'

पत्राचार एवं स्‍थायी पताः ।स्‍.49, सचिन स्‍वीट्‌स के पीछे, दीनदयाल नगर फेज़-प्रथम्‌,

काँठ रोड, मुरादाबाद-244001 (0प्र0)

ईमेल -  vyom70@yahoo.in

yashwant kothari

यदि आंकडे प्रमाण है कि तो पिछले दो-तीन दशकों में बाल अपराधियों और युवा वर्ग में हिंसा और पराध करने की प्रवृति में बहुत वृद्धि हुई हैं। 16 वर्ष से कम आयु के लगभग 1500 बच्‍चें जेल में बंद हैं। बड़े शहरों में युवाओं द्वारा किए जाने वाले अपराधों में निरंतर वृद्धि हो रही हैं।

इन अपराधियों में आपराधिक प्रवृत्ति का विकास हाने का एक प्रमुख कारण हमारी दूषित शिक्षा पद्धति हैं। दस जमा दो हो या इससे पूर्व की पद्धति, सभी में अपराधों की रोकथाम या शिक्षार्थी को अपराधों की ओर जाने से रोकने का कोई प्रावधान नहीं हैं। बढ़ती बेरोजगारी, अनिश्‍चित भविष्‍य और शिक्षा की अर्थहीनता स्‍पष्‍ट हो जाने पर बालक, किशोर, युवा अपराधों की दुनिया में किस्‍मत आजमाते हैं। शुरू की सफलताएँ उन्‍हें और आगे जाने की ओर प्रवृत्त्‍ा करती हैं।

समाजशास्‍त्रियों का मत है कि कानून का उल्‍लंघन करने वाले बच्‍चों के अन्‍दर अपराध के बीच प्रारंभिक वर्षों में स्‍कूलों में या कॉलेजों में पड़ जाते हैं और समय पाकर विकसित होते रहते हैं।

लगभग हर अपराधी किसी न किसी मारक परिस्‍थिति का शिकार होता है। चोरी-चकारी, उठाईगिरी या ऐसे मामूली अपराधों का मूल कारण गरीबी, अशिक्षा और पेट की भूख हैं।

बच्‍चें चाहे सरकारी स्‍कूल में हों या पब्‍लिक स्‍कूल में या महंगे बोर्डिंग स्‍कूलों में, अध्‍यापकों, अभिभावकों की मानसिकता लगभग एक जैसी होती हैं। यदि किसी कक्षा में 2 छात्र लड़ पड़े तो अध्‍यापक दोनों को डाँट फटकारकर भगा देंगे। पेंसिल, पेन कॉपी, किताब आदि की चोरियाँ मामूली बात हैं, जो हमारी शिक्षा पद्धति के कारण बढ़ती ही चली जा रही हैं।

पिछले कुछ वर्षों में स्‍कूलों में फिजिकल पनिशमेंट का स्थान डांट, फटकार, धमकी और आर्थिक दण्‍ड ने ले लिया है, जो छात्रों के कोमल मन को लम्‍बे समय तक प्रभावित कर उसे अपराधी जीवन की ओर ले जाती हैं।

स्‍वच्‍छंद व्‍यवहार, बढ़ती आर्थिक खाई और बदलते सामाजिक मूल्‍यों तथा राजनीतिक जागरूकता ने छात्रों व अध्‍यापकों के बीच खाई को बहुत बढ़ा दिया हैं। पाश्‍चात्‍य सभ्‍यता की अंधी नकल, सिनेमा, टी․वी․ का प्रसार और ड्रग लेने की बढ़ती प्रवृति भी छात्रों में बढ़ी हैं। एक स्‍कूली छात्र ने बताया कि टी․वी․ पर लगातार दिखाए जाने वाले धारावाहिकों से उसने ड्रग लेने की सीख पाई। कैसे बचेगी किशोरों की दुनिया।

मनोवैज्ञानिकों का विश्‍वास है कि बालक और किशोर अपने आस-पास, घर स्‍कूल आदि के वातावरण से ही सीखता है। बालक का मस्‍तिष्‍क अपरिपक्‍व होने के कारण वह स्‍वयं अच्‍छे और बुरें कार्यों में अंतर नहीं समझ पाता। ऐसी स्‍थिति में गलत रास्‍तों की ओर बढ़ता है और अपराधों की दुनिया में प्रवेश पा जाता है।

वास्‍तव में 5 से 15 वर्ष की आयु बच्‍चे के मानसिक विकास की आयु है। वह हर नई वस्‍तु की ओर जिज्ञासा से देखता है। ऐसी जिज्ञासाओं की पूर्ति के लिए वह अध्‍यापक या माता-पिता की ओर देखता है। अध्‍यापक उपलब्‍ध नहीं होते, माता-पिता व्‍यस्‍त रहते हैं। फलस्‍वरूप बालक कुंठित हो जाता है और बड़े घर के बच्‍चों को तो अपने माता-पिता के दर्शन भी हफ्‍ते में एक-दो बार ही हो पाते हैं।

वस्‍तुतः जिस सामाजिक परिवेश, देश, काल व परिस्‍थितियों से हम गुजरते हैं, उनका हमारे बच्‍चों के दिमाग पर असर होता है और बाल मन पर होने वाले इस असर के लिए अध्‍यापक और शिक्षा पद्धति जिम्‍मेदार हैं। शिक्षा पद्धति का विकास करते समय हमें बाल मनोविज्ञान और अपराधों की दुनिया से बच्‍चों को दूर रखने की कोशिश का भी ध्‍यान रखना चाहिए।

शिक्षा पद्धति बच्‍चों को किताबी ज्ञान के साथ-साथ नैतिक ज्ञान तथा सामयिक दिशा निर्देश भी दे, तभी बाल अपराधों में कमी होगी और देश को अच्‍छे नागरिक मिल सकेंगे।

लेकिन हमारी शिक्षा पद्धति कुछ इस प्रकार की है कि छात्र-अध्‍यापक सम्‍पर्क बहुत कम होता है। कॉलेजों में तो यह सम्‍पर्क नाममात्र का ही होता है, लेकिन स्‍कूलों में छात्रों को अध्‍यापकों के अधिक सम्‍पर्क में लाए जाने की कोशिश की जा सकती है, ताकि छात्र कोर्स के अलावा भी बहुत कुछ सीख सके।

यदि बच्‍चों को शुरू से ही बाल अपराधों तथा उनके परिणामों से अवगत कराया जा सके तो बालक किशोर स्‍वयं इन अपराधों से दूर रहने की कोशिश करेंगे।

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यशवन्‍त कोठारी

86, लक्ष्‍मीनगर, ब्रह्मपुरी बाहर

जयपुर - 302002

फोन - 2670596

sanjay dani

आईनों  से नहीं है  दुशमनी  मेरी ,

अक्श से अपनी डरती ज़िन्दगी मेरी।

 

हुस्न ही है मुसीबत का सबब मेरा,

क्यूं इबादत करे फ़िर बे-खुदी मेरी ।

 

साहिलों की अदा मंझधार के दम से।

लहरों को पेश हरदम   बन्दगी  मेरी ।

 

घर वतन छोड़ आया हुस्न के पीछे,

आज खुद पे हंसे   सरकशी मेरी ।

 

सूर्य   से क्यूं   नज़र लड़ाई    थी ,

खफ़ा नज़रों से अब रौशनी मेरी ।

 

सब्ज गुलशन समझ बैठा मै सहरा को

अब    कहां   से बुझेगी  तशनगी    मेरी।

 

शमा के प्यार मे मै जल चुका इतना

मर के अब रो रही है खुदकुशी मेरी ।

 

मै बड़ी से बड़ी खुशियों को पकड़ लाया

दूर    जाती गई     छोटी खुशी     मेरी।

 

तू नहीं    तो      नशा काफ़ूर है दानी ,

इक नज़र ही तुम्हारी मयकशी मेरी ।

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Rajasthani Hindi child writer Deendayal Sharma. 1 JPG

चिकोटियां / दीनदयाल शर्मा

 

खत्म होने लगा सैंस

जिसकी लाठी उसकी भैंस।

 

गिर गए दाम

आँधी के आम।

 

खत्म होने से ना डर

चींटी के आ गए पर।

 

रहा बात पे अड़ा

चिकना घड़ा।

 

धन बना न दूना

लगा गया चूना।

 

बातों का कहर

उगले जहर।

 

शक है लाला

दाल में काला।

 

मत बन होशियार

पंख मत मार।

 

बिक गए बाट

उलट दी टाट।

 

नहीं है अनाड़ी

पेट में दाढ़ी।

 

पुलिस ने डंडे मारे

दिन में दिख गए तारे।

 

पेट दिखा बाई

मैं मौहल्ले की दाई।

 

होगा वही जो होना

घोड़े बेचकर सोना।

 

मिल गई गोटी

हाथ में चोटी।

 

जीत गया जवान

जान में आ गई जान।

 

बेमतलब ना बोल

जुबान को तौल।

 

जीत ली लंका

बज गया डंका।

 

मत कर रीस

दाँत पीस।

 

ऐसे मत कुलबुला

पानी का बुलबुला।

 

मिट गए ठाट

अब पेट काट।

 

दोस्ती तगड़ी

बदल ली पगड़ी।

 

मंत्री बना लल्ला

पकड़ लिया पल्ला।

 

मान ली हार

डाले हथियार।

 

नहीं करना काम

सुबह-शाम, सुबह-शाम।

 

मीचे अक्खियां

मारे मक्खियां।

 

अब मत हो लाल

बासी कढ़ी में उबाल।

 

चल गई चाल

गल गई दाल।।

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अध्यक्ष, 

राजस्थान साहित्य परिषद्,

हनुमानगढ़ संगम-335512

सब कुर्सी का खेल

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बड़ी कुर्सी पे बैठ के मानस मचा रहा धमाल

नहीं जनता के ये सब तो बस कुर्सी का कमाल

 

लोग आगे पीछे घूमे जी-जी का राग अलापे

सर -जी के पसंद हैं क्या ये पहले से भांपे

 

कोई लेकर बैग घूमता कोई छतरी ताने

सोसायटी में रोब जमता कि साहब हम को जाने

 

लगा -लगा माखन सेर भर पीछे -पीछे भागे

जो सर जी का काम पड़े तो रात-रात भर जागे

 

घर का सारा काम करे ये सब्जी भी लाए

जो सर जी की मैडम कह दे वो काम है भाए

 

बचो को स्कूल छोड़ मैडम को कराए "शॉपिंग"

अपने घर वालों को भूल कर सर से करे है "सेटिंग"

 

सिर जी की तारीफ उन्हीं के मूह पे है करते

सिर जी भी गर्व से हर बात पे हामी भरते

 

सोच -सोच कर खूब इतराते देख के लंबी फौज

सोचा जब से मिले है कुर्सी हो गए है मौज

 

अपने घर पे दावत देकर साम करेंगे रोशन

हर तरह से खुस करेंगे पाने को परमोसन

 

एक ज़रा से बात पर किसी के समझ ना आई

तेरे कोई वक्त नहीं ये कुर्सी का खेल है भाई

 

जिस दिन कुर्सी पे बैठेगा दूजा कोई ऑफीसर

नहीं कोई तेरी बात करेगा नहीं कहेगा सर-सर

 

तेरे सामने ही तेरे चमचे होंगे बेगाने

हर किसी को बोलेंगे के हम इन्हें ना जाने

 

सोच रहा "राजीव दुनिया का है कैसा खेल

कुर्सी के "वॅल्यू" देख कर लोग बढ़ाए मेल

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rajeev shrivastava

डॉक्टर राजीव श्रीवास्तव

मेडिकल कॉलेज हल्दवानी

© copyright reserved by author

 

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काले घने घुँघराले ये शब्द, दो शब्दकोश से निकाल

क्योंकि इनका बालों की लिए होता है इस्तेमाल !

 

कभी ये तीनों शब्द मुझे भी बहुत प्रिय थे ,

लगता था की जैसे ये मेरे लिए ही बने थे !

 

सर पे लहलाहाती खेती पे मुझ को था अभिमान ,

मेरी गर्लफ्रेंड को भी मेरे बालों पे था गुमान !

 

याद है कैसे प्यार से मेरे बालों पे हाथ फेरती थी ,

जलने वालों की नज़र मुझे ही टेरती थी !

 

हर पार्टी मैं बालों की तारीफ करते थे यार ,

मैं भी क्रीम और जेल लगा के देता नित-नये आकर !

 

कोई मुझे ऋतिक तो कोई संजय द्त्त पुकारता ,

मैं भी बड़े चाव से अपने बालों को निहारता !

 

याद है वो मनहूस घड़ी,बुरा हुआ था मेरा हाल ,

जब कंघी करी और देखा झड़ रहे थे मेरे बाल !

 

एक-एक कर लगे थे गिरने ,मेरा सर रहे थे छोड़ ,

लग रहा था जैसे जल्दी निकलने की लगी थी उनमें होड़ !

 

मेरे तो होश उड़ गये तब लोगों से ली राय ,

सोच रहा था किस कम्बख़त की मुझ को लग गयी हाय !

 

दही, माखन ,शहद, नींबू सब कुछ बालों मैं लगाया ,

पर कुदरत को कुछ और मंजूर था कुछ काम ना आया !

 

जड़ी-बूटी,दवाई और लगाए कई सारे तेल ,

पर मेरे सर पे लगते ही सभी हो गये फेल !

 

मेरा तो चेहरा बदल गया और आया नया रूप ,

दूर से ही पहचाना जाता जब सर पे पड़ती धूप !

 

अपनों ने अनदेखा किया ,गर्लफ्रेंड ने भी छोड़ा

मुझसे नाता तोड़ घने बालों वाले से नाता जोड़ा!

 

शुभचिंतको ने खूब समझाया,कहा ना लो टेन्शन ,

आज तो हीरो भी सर मुंडा रहे गंजेपन का ही फैशन !

 

कई गंजे हीरो की दिखा के फोटो मन मेरा बहलाते ,

मुझे ग़ज़नी का आमिर ख़ान बता मुझे खूब फुसलाते !

 

मैंने चंद दिनो मैं ही अपना सब कुछ खोया ,

कई बार दुखी हुआ अपनी फोटो देख के रोया !

 

समझ ले प्यारे एक बार जो फसल ये कट जाती ,

लाख कर लो कोशिश ये फिर वापस नही आती !

 

आओ बताऊं एक बात ,जो मेरे दादी मुझे बतलाती ,

बाहर की काया तो मिट जाती, मन की सुंदरता ही रह जाती !

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डॉक्टर राजीव श्रीवास्तव

मेडिकल कॉलेज हल्दवानी

© copyright reserved by author

मन की गंगा

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गंगा मैली हो गयी घटा देश का मान

गंगा को साफ करने का चला रहे अभियान

 

एक और गंगा है जो सब के मन में बहती

मुझे भी साफ करो ये दबी जुबां में कहती

 

क्रोध जा मिला है इस में, नफ़रत ने जगह बनाई

एक दूसरे का वध कर रहे,लड़ रहे है भाई-भाई

 

छल-कपट से हो रही आरती,क्रोध से लगता भोग

लहू से कर रहे अर्चना,नहा रहे सब लोग

 

कभी जहाँ बस्ती थी सच्चाई, और सुन्दर थी काया

आज अधर्म और अंधकार जा मिला, जब से कलयुग आया

 

करना ही है साफ, तो कर साफ मन की गंगा

नहीं तो वो दिन दूर नहीं ,जब होगा हर तरफ दंगा

 

जो मन की गंगा साफ रहे तो गंगा भी तर जाए

जो स्वच्छ मन ही लगाए डुबकी ,तो गंगा भी स्वच्छ हो जाए

 

मन की गंगा को साफ करने का बता रहा उपाय

काम-क्रोध, ईर्ष्या, देख कभी पास ना आय

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डॉक्टर राजीव श्रीवास्तव

© copyright reserved with author 

उदघाटन से पहले टूटा पुल

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लाखों का निकला टेंडर और जेबें हो गयी फुल

उद्घाटन से पहले देखो टूट गया था पुल

 

जनता के मेहनत की कमाई इस पुल मैं हुई बर्बाद

पर किसी के घर बन गये कोई हुआ आबाद

 

पुल से नदी पार करने का सपना मन मैं थे संजोए

सोच रहे थे उनके ख़ुशियों को किन के लग गई हाए

 

नहीं पता इन्हें कि क्या टूटे पुल की कहानी

घटिया सा सामान लगाया खूब करी मनमानी

 

पुल से ज़्यादा इनको चिंता कमीशन की सताई

सोच रहे थे ज़्यादा से ज़्यादा इससे करो कमाई

 

बना के तैयार कर दी इन्होंने जिंदा लास

पैसे देकर आकाओ से पुल कराया पास

 

सजी खूब महफ़िल थी उस दिन हाउस हुआ था फुल

नेता जी फीता काटे उससे पहले टूटा पुल

 

सभी के सपने ऐसे टूटे जैसे टूटे कॉच

नेता जी कह के चल दिए की कराव जाँच

 

जनता को दे जाँच का लोलीपाप मामला किया था गुल

देशद्रोही फिर मिल बैठे बनाने को नया पुल

 

सोच रहा राजीव की उपर वाले ने किया अहसान

जो पुल टूटता बाद मैं तो जाती कितनी जान

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डॉक्टर राजीव श्रीवास्तव

मेडिकल कॉलेज हल्दवानी

© copyright reserved by author

लघुकथाएं

टुकड़े

संजय जनागल

‘‘साब, ये क्‍या सुनने में आ रहा है कि जाति आधारित जनगणना होने वाली है?'' चंपक मालिक के पाँव दबाते हुए बोला।

‘‘हाँ, तुमने सही सुना है।'' मालिक ने कहा।

‘‘लेकिन आप तो हमेशा जातिवाद मिटाने के पक्षधर रहे हैं? फिर ये?'' चंपक फिर बोला।

चंपक की ओर मुँह करके मालिक ने कहा, ‘‘पार्टी को बचाने के लिए उनकी बात माननी पड़ी। पार्टी के दो टुकड़े होने की नौबत आ गई थी?''

‘‘पार्टी के दो टुकड़े ?? मैं समझा नहीं।'' चंपक आँखें नीची करके बोला।

‘‘चंपकिया तू तो बहुत भोला है। अगर जाति आधारित जनगणना की मांग को ठुकरा देते तो अपनी पार्टी के कुछ कार्यकर्ता और शीर्ष अधिकारी मिलकर नई स्‍वतंत्र पार्टी बना लेते?''

‘‘पार्टी को दो टुकड़ों में बंटने से तो आपने बचा लिया लेकिन क्‍या इस जाति आधारित जनगणना से देश कई टुकड़ों में नहीं बंट जायेगा।'' इस बार चंपक की आवाज़ में एक अजीब सा द्वेष था। परन्‍तु तब तक मालिक गहरी निद्रा में सो चुके थे।

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ऐसे ही....

खरगोश को अपने जाल में फंसाने के लिए गीदड़ ने उसे कहा, ‘यदि तुम मेरे मित्र बन जाओ तो तुम्‍हारा कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता।'

खरगोश चुपचाप खड़ा गीदड़ की बातें सुनते हुए भागने का अवसर ढूंढने लगा।

गीदड़ फिर बोला, ‘एक बार मैं गलती से शेर की मांद में घुस गया, फिर क्‍या था सामने शेर खड़ा मुझे घूरता रहा, परन्‍तु उसकी मुझ पर हमला करने की हिम्‍मत नहीं हुई। मैंने शेर को एक ही बार में चारों खाने चित कर दिये और उसके बाद वो शेर कभी भी अपनी मांद में नहीं आया और आज तक मैं उसकी मांद में रह रहा हूँ। मेरी वीरता के तो बहुत उदाहरण है।'

खरगोश चुपचाप सुनता रहा।

‘इसी तरह एक बार बब्‍बर शेर का सामना हो गया। लेकिन मैं डरा नहीं और पूरा एक दिन बब्‍बर शेर मेरे सामने खड़ा रहा। ना मैं हिला और ना बब्‍बर शेर।' जैसे ही बोलते-बोलते गीदड़ ने आसमान से धरती की तरफ देखा कि खरगोश तो गायब है। अपनी किस्‍मत को बुरा भला कहते हुए जैसे ही पीछे मुड़ा तो हक्‍का-बक्‍का रह गया और कुछ ही देर में गिड़गिड़ाता नजर आया, ‘मैं तो ऐसे ही कह रहा था....आप तो महाबली हैं.....आप तो जंगल के राजा हैं।'

द संजय जनागल

अनु कम्‍प्‍यूटर्स, बड़ी जसोलाई,

रामदेवजी मन्‍दिर के पास, चौखूंटी,

बीकानेर-01 मो. 9252969180

yashwant kothari

व्‍यंग्‍य

साहब का कुत्‍ता

-यशवन्‍त कोठारी

मेरे एक साहब हैं। आपके भी होंगे! नहीं हैं तो बना लीजिए। साहब के बिना आपका जीवन सूना है। हमारे साहब के पास एक कुत्‍ता है। आपके साहब के पास भी होगा। नहीं है तो आप भेंट में दीजिए, और फिर देखिये खानदान का कमाल! आप जिस तेजी के साथ दफ्‌तर में प्रगति की सीढ़ियां चढ़ने लगेंगे, क्‍या खाकर बेचारा कुत्‍ता चढ़ेगा!

खैर तो साहब, हमारे साहब के कुत्‍ते की बात चल रही थी। मेरे साहब का यह कुत्‍ता अलसेसियन है या बुलडॉग या देसी, इस झगड़े में न पड़कर मैं आपको इस कुत्‍ते का नाम बताता हूं। साहब इसे प्‍यार से ‘मिकी' कहकर पुकारते हैं, मेमसाहब उसे ‘टिंकू' कहती हैं और साहब के साहबजादे इसे ‘रिंकू' समझते हैं। अलबत्‍ता ऐसा वफादार कुत्‍ता मैंने अपनी जिन्‍दगी में नहीं देखा! यह साहब, मेमसाहब और साहबजादे, सभी की सेवा में तत्‍पर रहता है।

साहब के कुत्‍ते में कुछ बहुत ही महत्‍वपूर्ण गुण हैं, जो आम कुत्‍ते या आम आदमी में नहीं पाये जाते। इनमें से एक गुण है, आदमी की पहचान। साहब की कोठी के दरवाजे पर जो भी व्‍यक्‍ति आता है, उसका स्‍वागत यही करता है, और इसी पहली मुलाकात में पहचान जाता है कि यह आदमी कैसा हैं! वह ठेकेदारों, मातहत अफसरों और चमचों को विशेष रूप से पहचानता है। इनको देखकर वह इनके स्‍वागत में बिगुल बजाता है, और साहब समझ जाते हैं कि कोई मोटी ‘मुर्गी' या ‘मुर्गा' आज फंसा है। ठेकेदार के आने पर यह कुत्‍ता कुछ इस तरह से बिगुल बजाता हैं कि बस, मत पूछिये! मुझे भी एक-दो बार यह बिगुल सुनने का सौभाग्‍य मिला है। बिगुल के बाद साहब ‘मिकी' को चुप कराते हैं, ठेकेदार को ड्राइंग-रूम में बैठाते हैं, उसे कॉफी पिलाते हैं, कल उसका बिल पास कराने का वादा करते हैं और मुस्‍करा देते हैं। ठेकेदार समझदार है, वह बाहर आ जाता हैं, कुत्‍ता उसे दरवाजे तक छोड़ आता है। दूसरे दिन कुत्‍ते के लिए ठेकेदार बिस्‍कुट लाता है, और साहब के लिए डाली।

साहब का कुत्‍ता बड़ा समझदार है, मुफ्तियों को वह अपने पास भी नहीं फटकने देता। दफ्‌तर के बड़े बाबू की तरह, उन पर हर वक्‍त हमला करने को तैयार रहता है। एक बार तो मैं स्‍वयं इसके चुंगल में फंस गया, और मैंने कान पकड़कर तोबा कर ली। अब जब भी जाता हूं, पहले ‘मिकी' का सत्‍कार करता हूं और बाद में साहब के दर्शन।

मेमसाहब का ‘टिंकू' से विशेष प्रेम है। वे इसे अपने साथ क्‍लब, सभा, तथा सिनेमा ले जाती हैं। कभी-कभी जब यह भैरव-वाहन गुस्‍सा होकर सिनेमा में श्वान-संगीत छेड़ देता है, तब दर्शकों को दोहरा तमाशा देखने का अवसर मिलता है, साथ ही पास की सीटें हर वक्‍त खाली रहती हैं, जिसके कारण मेमसाहब आराम से, बेखौफ सिनेमा का आनन्‍द उठाती है। क्‍लब में जब कभी मेमसाहब को ज्‍यादा ‘चढ़' जाती है, तब उनका वफादार ‘टिमकू' इन्‍हें घर तक लाने में मदद करता है। जब से टिमकू को ‘टाइफाइड' हुआ है, मेमसाहब इसका विशेष ध्‍यान रखती है। और साहब के कमिश्नर बनने के बाद तो मेमसाहब इसे अपने ही कमरे में सुलाती हैं। कहते हैं, इससे उन्‍हें नींद की गोलियां नहीं खानी पड़तीं और वे आराम से सोती हैं।

साहबजादे के लिए रिंकू का बड़ा महत्‍व है। ये इनके एकमात्र दोस्‍त, दुश्मन, चाहने वाले और न जाने क्‍या-क्‍या हैं! साहबजादे क्रिकेट के मैदान से लगाकर अपनी ‘गर्ल-फ्रेण्‍ड' तक इसे घुमाते हैं और साहब, मजा यह कि इनकी ‘गर्ल-फ्रेण्‍ड' को भी ‘रिंकू' से बड़ा लगाव है। कल ही वह कह रही थी-‘‘आह, क्‍या मुलायम बाल हैं, आंखें कितनी खूबसूरत हैं, कितना प्‍यारा चेहरा है, नन्‍हीं-नन्‍हीं टांगें बस रिंकू, मजा आ गया!'' ; आप कहीं यह न समझें कि यह सब ‘रिंकू-दी डाग' याने हमारे किस्‍से के हीरो श्वान की शान में कसीदा पढ़ा जा रहा है।

हमारे साहब के कुत्‍ते का किस्‍सा अधूरा ही रह जाएगा, अगर साहब के पड़ौसी डॉ ‘क' की कुतिया, याने मिस लुई के साथ चले प्रेम-प्रसंग का हवाला न दिया जाए। आप तो जानते ही हैं, बड़े लोगों की बड़ी बातें होती है। डॉ ‘क' का लगाव मिसेज शर्मा से है, मिस्‍टर शर्मा मिसेज वर्मा से लगे हैं, और मिस्‍टर वर्मा किसी और से ; और यह कभी न खत्‍म होने वाली श्रृंखला है। खैर तो साहब, उसी क्रम में मिस लुई ने पहले तो दोस्‍ती का हाथ बढ़ाया जिसे मेमसाहब के ‘टिंकू' ने स्‍वीकार नहीं किया। लुई ने थक हारकर एकतरफा प्‍यार शुरू कर दिया। गाहे-बगाहे वह हमारे साहब की कोठी में चली आती और जाने क्‍या सूंघती फिरती। साहब को अपनी जवानी, साहबजादे को अपनी दीवानगी और मेमसाहब को अपना रोमांस, लुई की इस हरकत को देखकर याद आ जाता है।

धीरे-धीरे टिंकू ने लुई से दोस्‍ती कर ली। बात बढ़ी, पड़ोस में चर्चे हुए; इसी खातिर डॉ ‘क' ने साहब से दोस्‍ती की। ‘लुई-टिंकू' के प्‍यार ने इन्‍सानों के दिलों में प्‍यार पैदा किया। और प्‍यार की कहानी रंग लायी, याने मिस ‘क' साहबजादे के साथ शतरंज खेलने लगीं। हमारे श्वान-परिवार में भी वृद्धि हुई।

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-यशवन्‍त कोठारी, 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर - 2, फोन - 2670596

ykkothari3@yahoo.com

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राजेश विद्रोही की ग़ज़लें

बेशक हम भी चाहेंगे कि वाज़िब मांगें पूरी हो।

लेकिन ये क्‍या बात हुई कि चाहे जो मज़बूरी हो'

 

असली है रुहानी रिश्‍ते अष्‍टावक्र बताते है।

चमड़ी में क्‍या तो रक्‍खा है काली हो या भूरी हो॥

 

मिलना तो मन का होता है, तन तो सिर्फ बहाना है।

ऐसा मिलना भी क्‍या मिलना, जो मिलना दस्‍तूरी हो॥

 

बहनों की रक्षा करना तो भाई पर है फर्ज सदा।

वो फिर सीता-सावित्री हो, नज़मा हो या नूरी हो॥

 

ये मेरी अनमोल विरासत इसे ना कायरता समझो।

तब तक नहीं आक्रमण करते जब तक नहीं जरुरी हो॥

 

और नहीं अभिलाषा कोई मालिक बस इतना कर दे।

हर सुबहा चम्‍पा सी उजली हर सन्‍ध्‍या सिन्‍दूरी हो॥

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जीवन की अलबेली यादें।

हैं विश्‍वस्‍त सहेली यादें॥

 

खट्टी-मीठी और चरपरी।

कड़वी और कसैली यादें॥

 

नहीं पुरानी पड़ती हर्गिज़।

लगती नित्‍य नवेली यादें॥

 

लाख सहेजो, लाख समेटो।

रहती बिखरी फैली यादें॥

 

सुधियों की सुनी गलियों में।

धूल भरी मटमैली यादें॥

 

जाने क्‍या कुछ सँग ले आती।

आती नहीं अकेली यादें॥

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आपने अब तक पढ़ी तो होंगी बहुतेरी ग़ज़ल।

किन्‍तु सबसे अलहदा है मोहतरिम मेरी ग़ज़ल॥

 

मातहत बनकर गुजर करने से मर जाना भला।

हो नहीं सकती किसी की भी कभी चेरी ग़ज़ल॥

 

आशिको-माशूक की दर्जे बयानी ही नहीं।

वक्‍त पर साबित हुई है राज' रणभेरी ग़ज़ल॥

 

सर ज़मीने हिन्‍द के ज़र्रे जवानी पा गये।

मीर या गालिब ने जब जब चाव से टेरी ग़ज़ल॥

 

चाहने वालों ने बख्‍़शी है हयाते-जांविदा।

हो ना पायेगी कभी भी राख की ढे़री ग़ज़ल॥

 

ना तो खारिज़ कर सका ना दे सका इस्‍लाह भी।

उसने मुझको ही सुना दी हू ब हू मेरी ग़ज़ल॥

 

मां अग़र हिन्‍दी है तो उर्दू सगी मौसी मेरी।

इस तआल्‍लुक से हुई राजेश' मौसेरी ग़ज़ल॥

 

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सबकी सुनकर भी अपनी पे अड़े हुए हैं, बड़े मियाँ।

लोग शहर के कैसे चिकने घड़े हुए हैं बड़े मियाँ॥

 

पहले यूं खुदगर्ज नहीं था, कुछ अपनापा बाकी था।

आख़िर हम भी इसी शहर में बड़े हुए हैं बड़े मियाँ॥

 

ये मत सोचो इस मरभुक्के गाँव में क्‍या तो रक्‍खा है?

जाने कितने बड़े ख़ज़ाने गड़े हुए हैं बड़े मियाँ॥

 

चाँद सितारों पर जा पहुँचे दुनियाँ के सब लोग मग़र।

आप और हम तो उसी सतह पर खड़े हुए हैं बड़े मियाँ॥

 

कहने को तो बाज़ारों में आम हो गयेआम' मगर।

ये तो सब के सब आँधी के झड़े हुए हैं बड़े मियाँ॥

 

जब जब झोपड़ियाँ सुलगी हैं जब जब भी खलिहान जले।

राजमहल पर पहरे क्‍योंकर कड़े हुए हैं बड़े मियाँ??

 

भाई भाई की रंजिश में पंच कहाँ से आ टपके।

हर कुनबे में अक्‍सर दो दो धड़े हुए हैं बड़े मियाँ॥

--

 

मैं किसी की हाजिरी हर्गिज बजा लाता नहीं।

इसलिए कटु सत्‍य कहने से भी घबराता नहीं॥

 

ज़ात से हूँ आदमी इन्‍सानियत मेरा धरम।

इसलिए मैं मज़हबी उन्‍माद फैलाता नहीं॥

 

ना किसी मठ का मुगन्नी ना किसी दर का मुरीद।

कोई मस्‍जिद या कि मंदिर मेरा अन्न‍दाता नहीं॥

 

मेरी खातिर उसका दर्जा देवता से कम नहीं।

जो किसी की भावना को ठेस पहुंचाता नहीं॥

 

बख्‍श दे मौला मेरे तुझसे निहां कुछ भी नहीं।

हर किसी दर पे तो मैं दामन भी फैलाता नहीं॥

 

ना तो सज़्‍दों का सलीका ना इबादत का शऊर।

वो सवाली हूँ कि जिसको मांगना आता नहीं॥

---

 

यतीमी थी मुक़द्दर में निगहबानों से क्‍या शिकवा ?

गिला गुलजार से कैसा बियाबानों से क्‍या शिकवा ??

 

मिले हैं ग़म के नज़राने हमें अपनों से दुनियाँ में।

शिकायत ग़ैर से क्‍या और बेगानों से क्‍या शिकवा ??

 

शिकायत ग़र्दिशे-तक़दीर की आखिर करे किस से ?

फरिश्‍तों से मिले फतवे तो इन्‍सानों से क्‍या शिकवा ??

 

परिन्‍दों के मुकद्दर में क़फ़स भी कैद लिक्‍खी थी।

गिला सैयाद से क्‍या और गुलिस्‍तानों से क्‍या शिकवा ??

 

न था साहिल से मिल पाना सफ़ीने के मुकद्दर में।

गिला क्‍या नाखुदा से और तूफानों से क्‍या शिकवा ??

 

न हो मायूस अहले अंजुमन की बेवफाई से।

निगाहें फेर ले साकी तो पैमानों से क्‍या शिकवा ??

 

मेरे अशआर की किस्‍मत में गुमनामी बदी होगी।

गिला नक़्‍क़ाद से क्‍या कदरदानों से क्‍या शिकवा ??

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जिधर देखते हैं क़हर देखते हैं।

सितम है कि आठों पहर देखते हैं॥

 

संभाला है जब से ज़रा होश हमने।

फ़िजाओं में घुलता ज़हर देखते है॥

 

ये मेहनत ही मज़हब है मेहनतकशों का।

ना दिन-रात ना दोपहर देखते हैं॥

 

अज़ब फ़लसफा है नये शायरों का।

ना अर्कान ना ही बहर देखते है॥

 

ये दहशत के मारे मछेरे अभी भी।

सुनामी सी कोई लहर देखते हैं॥

 

ना दंगा न कर्फ्यू ना नफ़रत जहां हो।

कोई एक ऐसा शहर देखते हैं॥

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ग़ज़ल 43

ये कंगन बज परस्‍पर कर रहे हैं बात यूं आली।

अधूरी रह गयी लगती कोई चाह ज्‍यूं आली॥

 

चिहुक हैं हर्ष की या दर्द की सिसकी हैं क्‍या जानू ,

अभी निर्णय न कर पायी इसे क्‍या नाम दूं आली।

 

छुपा बैठा हो भीतर तो भला हो क्‍या खबर हमको ,

वगरना दूर तक दिखता न कोई चारसू आली।

 

लिपट कर ये तरुवर वल्‍लरी कहते चुहल करके,

अगर परवान चढ़ ना हो तो किसी को थाम लूं आली।

 

अरी ये ढ़ोर वय का क्‍या क्‍या करने को उतारु हैं,

खड़ी हैं लाज बैरन बन के चरवाहा क्‍यों आली।

 

 

ग़ज़ल 45

छोड़ कर जाना नहीं तू गाँव की दहलीज को

शहर में तहजीब के पहरे कड़़े हो जायेंगे॥

 

इन खरोंचों को हिफाजत से रखोगे तो यही,

जख्‍म आखिर एक दिन काफी बड़े हो जायेंगे।

 

कब्र गहरी खोद कर के इस तरह पत्‍थर चुने,

जैसे हो शुब्‍हा कि ये उठ कर खड़े हो जायेंगे।

 

मर गये बेमौत इतने आज तो आँसू बहा

कल सुबह अखबार के ये आँकड़े हो जायेंगे।

 

चाँद ने मायूस हो कर चाँदनी से यूं कहा,

अपना क्‍या होगा अगर तारे बड़े हो जायेंगे।

 

इस कदर जज्‍बात को छेड़ा करो न रात दिन,

हैं बड़े मासूम ये फिर चिड़च़िड़े हो जायेंगे।

 

ग़ज़ल 60

खरे मोती बनी जब जब बही बूंदी पसीने की।

ह़कों से रह गयी वंचित वही, बूंदी पसीने की॥

 

उचित हक़ दो इन्‍हें इनका नहीं सैलाब बन कर के,

डुबो देगी तेरी दूनिया यही बूंदें पसीने की।

 

इसे पूँजी व साम्‍यवाद ने मिल कर के लूटा है,

दिलासे ले के बस बहती रही बूंदे पसीने की।

 

हिमायत करने वाले सरनगूं होंगे नदामत से,

दिखादे खोल कर अपनी बही बूदें पसाने की।

 

ये संगो खिस्‍त से मिलके बने खालिक फसीलों की,

कभी फूलों की नकअत में छुपी बूंदें पसीने की।

 

 

ग़ज़ल 35

खोल रखे या बंद पड़ें हो इक मुद्दत से दरवाजे।

सदा गुजरगाहों को तकते हैं हसरत से दरवाजे॥

 

दरवाजे पर बैठे रहते मदद मिले ही उठते थे,

आज उन्‍होने बंद कर लिए झट से अपने दरवाजे।

 

केवल बौनों को ही देखा इस घर से आते जाते,

किसकी खातिर बना रखे फिर इतने ऊँचे दरवाजे।

 

सिंहद्वार पर बिठा रखे हैं जिसने चौकीदार कई,

नहीं जानता खुले पड़े हैं उसके पिछले दरवाजे।

 

चाहे कितना ही धीरे से खोलो अथवा बंद करो,

चुगलखौर हैं बज के सारा जाहिर करते दरवाजे।

 

दरवाजे पे दस्‍तक देने फिर दुखः ही आया होगा,

इसी वहम से खुले नहीं हैं किसी भी घर के दरवाजे।

 

बंद किवाड़ों पर मकड़ी ने भी तहरीर लिखी ‘जांगिड'

ऐसे होते लावारिस या यायावर के दरवाजे।

 

ग़ज़ल 34

नहीं ध्‍यान कुछ भी रख पाते अक्‍सर लोग दलाली में।

कितने कितने छेद हो गये किसकी किसकी थाली में।

 

कीड़े जब आपस में मिलते बड़े फख्र से बतियाते,

किसने क्‍या क्‍या लुत्फ उठाये अपनी अपनी नाली में।

 

नहीं मिला माकूल लफ्‍ज तो काम चलाया गाली से ,

बचा खुचा परिचय दे डाला उसने गाली गाली में।

 

कीमत लुढ़की कौड़ी के भी मौल से नीचे उतर गयी,

नहीं लिवाली अच्‍छी आवक हाजिर हैं बिकवाली में।

 

ले ने दे ने और पकड़ने वाले रिश्वतखोर हुए ,

इसी लिऐ तूफान न आता हैं अब चाय की प्याला में।

 

खुद की तुलना में वो सबको आछा हल्‍का मान रहा,

क्‍या कर रखा उसने अपनी माप तौल प्रणाली में।

 

अपनी कोई सोच नहीं हैं नहीं किसी की सनते हैं,

इसी को कहते आटा गीला हो जाना कंगाली में।

 

चोर, उचक्‍के, गुण्‍डे, डाकू हर षोबे में काबिज हैं,

जिनसे रखवाली करनी थी वो बैठे रखवाली में।

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surender agnihotri 251 (Mobile)

भूख से जब अंतड़ियां

पेट में दर्द देती है

जब रिरियाती नई पीढ़ी

मौत की चादर ओढ़ लेती है

तब तनी हुई मुट्‌ठी

हाथ में बन्‍दूक थाम लेती है

तब बुन्‍देलखण्‍ड के बीहड़ में

बगावत की जंग शुरू होती है

तब सिसकती ममता है

कंलकित मानवता होती है

स्‍तब्‍ध कर देने वाली शांति

चीत्‍कार की ध्‍वनि सन्‍नाटा तोड़ती है।

सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री

राजसदन-120/132, बेलदारी लेन,लालबाग, लखनऊ

आशनाई
यूं तो खारों से ही अपनी आशनाई है |
आंधियां भी तो मगर हमको रास आईं हैं |


मुश्किलों का है सफ़र जीना यहाँ पर ऐ दिल,
हर एक मुश्किल नई राह लेके आई है  ||


तू न घबराना गर राह में पत्थर भी मिलें ,
पत्थरों में भी उसी रब की लौ समाई है |


डूब कर जान लो इसमें है अभी दरिया गहरा ,
कौन जाने न रहे कल को ये गहराई है |

आशिकी उससे करो श्याम' हो दुश्मन कोई,
दोस्त , दुश्मन को बनाए वो आशनाई है ||


डा श्याम गुप्त

 

एक-

मेघ राज आये हैं

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गगन की गोद से

पहाड़ों की ओट से

मेघराज आये हैं,

गरमी दूर करने

धरा में नमी भरने

बादल जी भाये हैं,

किसान राह देखें

मोर भी बाट जोहें

बच्‍चों ने गीता गाये हैं,

मेंढक जी बोले

मछली जी तोले

जुगनू जगमगाये हैं,

झींगुर की झिक-झिक

कोई बोला टिक-टिक

मनभावन आये हैं,

बुँद जो गिरती हैं

टप टप करती है

चुनरी धरा की ले

हरिचंदन करने को

मेघराज आये हैं॥

(प्रकाशनः-देवसुधाः-2009 पृष्‍ठ-54 से साभार)

 

दो-

अधखिली कली

--------- शशांक मिश्र ‘‘भारती''

तू-

सो रही है अपने को

चिरनिद्रा में विलीन किये

न किसी के आने की चाह

और-

न ही जाने की आस

सिर्फ-

अपने में ही लीन विचरण कर रही है

स्‍वप्‍न लोक में।

कली-

तू अभी खिली नहीं है

लेकिन-

तेरी चिर निद्रा का अवसान होते ही

तेरी पंखुड़ियां खिल जाएंगी,

और-

बन जाएगी तू-

स्‍वप्‍न लोक से बाहर आकर

अपनी गहन निद्रा का त्‍याग कर

कली से पुष्‍प!

तेरे खिल जाने से

समीप आकर गुन-गुनाएंगे भौंरे

तेरा मकरन्‍द लेकर

अपनी क्षुधा मिटायेंगे,

और-

अपनी व्‍यथाओं की गाथा

तुझको-

मधुर स्‍वरों में सुनाएंगे।

तेरी सुगन्‍ध जब फैलेगी

अथक वायु के द्वारा

तब-

हर्षित हो उठेंगे

सभी जीव-जन्‍तु

तेरी निरुपम सुगन्‍ध से,

किन्‍तु-

हाय! नष्‍ट कर देगा तुझे

हवा का एक तीव्र झोंका

सभी विखर जाएंगे स्‍वप्‍न, आकांक्षाएं

और-

जीवन के मोहक उद्‌देश्‍य।

तू बिखर जायेगी

अपने को मारुत के तीव्र झोंकों को समर्पित कर

और-

अपनी कथा समाज व देश में अंकित कर,

तू-

छिन्‍न-भिन्‍न हो जायेगी

उसी की क्रूरता से

जिसके द्वारा फैलनी थी

तेरी सुगन्‍ध

चहुं ओर।

कवि की पुस्‍तकः- पर्यावरण की कविताएं माण्‍डवी प्रकाशन गाजियाबाद 2004 पृष्‍ठ 20-21 से,

yashwant kothari

अमावस्‍या की काली अंधेरी रात को प्रकाशित करता है - प्रकाश। अंधकार से प्रकाश की ओर यह यात्रा हमें बताती है कि प्रकाश कितना महत्‍वपूर्ण है, जीवन तथा प्रकाश पर्व दोनों के लिए। प्रकाश की एक वैज्ञानिक विवेचना प्रस्‍तुत है।

वास्‍तव में प्रकाश वह साधन या माध्‍यम है जिसकी सहायता से हम वस्‍तुओं को देख सकते हैं, मगर आश्‍चर्य की बात है कि प्रकाश स्‍वयं अदृश्‍य है। न्‍यूटन ने सर्वप्रथम प्रकाश के गुणों का विधिवत अध्‍ययन किया। उनके अनुसार प्रकाश का कणों के रूप में संचरण होता है, प्रकाश परिवर्तित होता है, वर्तित होता है तथा सूर्य के सफेद प्रकाश में सात रंगों का मिश्रण है। वास्‍तव में प्रकाश एक प्रकार की ऊर्जा है तथा ऊर्जा के अन्‍य रूपों यथा ध्‍वनि, विद्युत, ऊष्‍मा आदि की तरह एक से गुणों से युक्‍त है। प्रकाश को ऊर्जा के अन्‍य रूपों में बदला जा सकता है। न्‍यूटन ने यह भी बताया कि प्रकाश के कण गेंद की तरह टकराते हैं और रंग पैदा करते है। बाद में जाकर ह्यूजेंस नामक वैज्ञानिक ने प्रकाश की तरंग के सिद्धान्‍त का प्रतिपादन किया। उनके अनुसार प्रकाश कणों से नहीं तरंगों से बनता है। थामस यंग ने आगे जाकर बताया कि प्रकाश तरगें तथा कण दोनों के गुण विद्यमान है। 1865 मे मैक्‍सवेल ने प्रकाश को विद्युत-चुम्‍बकीय तरंग माना। मैक्‍सप्‍लांक ने प्रकाश के क्‍वान्‍टम (बन्‍डल, गुटका) सिद्धान्‍त का प्रतिपादन किया। अल्‍बर्ट आइन्‍सटाइन ने बताया कि प्रकाश में ऊर्जा के कण हैं उन्‍हें फोटोन नाम दिया गया। नील्‍स बोर ने बताया कि जब इलेक्‍ट्रान एक कक्षा से दूसरी कक्षा में जाता है तो ऊर्जा के रूप में फोटोन को छोड़ता है और यही प्रकाश है। सच तो ये है कि आज भी प्रकाश की प्रकृति, स्‍वभाव, गुणों आदि पर वैज्ञानिक अनुसंधान कर रहे हैं और प्रकाश की प्रकृति को पूर्ण रूपेण अभी भी समझा नहीं जा सका है। प्रकाश हमेशा एक सीधी रेखा में चलता है। प्रकाश के इसी सिद्धान्‍त पर कैमरा, आँख आदि काम करते है। पृथ्‍वी पर प्रकाश का एक मात्र प्राकृतिक स्‍त्रोत सूर्य है जो आकाश गंगा का एक भाग है। सूर्य का प्रकाश सात रंगों का होता है और यह जानकारी न्‍यूटन से पहले भी थी।

सभी रंग सूर्य के प्रकाश से ही पैदा होते है। प्रत्‍येक वस्‍तु पर जब प्रकाश पड़ता है तो वस्‍तु कई रंगों को अपने में रख लेती है तथा किसी एक रंग को परावर्तित कर देती है, यही रंग वस्‍तु के रंग के रूप में हमें दिखाई देता है। इस संबंध में प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक सर सी․ वी․ रमन ने प्रकाश पर रमन प्रभाव की खोज की जिस पर उन्‍हें नोबल पुरस्‍कार दिया गया था। प्रकाश की प्रकृति पर रमन आजीवन काम करते रहे। मृत्‍यु के समय वे फूलों के रंगों पर काम कर रहे थे। प्रकाश की गति सबसे तेज होती है। एक सैकंड में प्रकाश 2,99,889 कि․ मी․ (3ग्‍1010 से․मी․ प्रति सैकंड) यात्रा कर लेता है। दूरी नापने की ईकाई का आधार प्रकाश वर्ष कहलाती है। सूर्य से पृथ्‍वी तक प्रकाश आठ मिनट में पहुंचता है। इसी प्रकार हमारे से निकटतम तारे की दूरी 4․22 प्रकाश वर्ष है। मन्‍दाकिनी देवयानि पृथ्‍वी से 20 लाख प्रकाश वर्ष दूर है, अर्थात्‌ वहां से प्रकाश को पृथ्‍वी पर पहुंचने में 20 लाख वर्ष लगते है। ध्रुवतारा पृथ्‍वी से 8,000 प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्‍थित है। सम्‍पूर्ण ब्रह्मांड, आकाश गंगाओं, तारों, आदि की दूरियां हजारों-लाखों प्रकाश वर्ष की है।

सूर्य के प्रकाश का उपयोग मानव हजारों वर्षों से कर रहा है, सच पूछा जाये तो सम्‍पूर्ण जीवन सूर्य के प्रकाश पर आधारित है। वर्षा का होना, पेड़-पौधों द्वारा भोजन बनाना आदि कार्य सूर्य-प्रकाश के बिना संभव नहीं है। जब मनुष्‍य को सूर्य के प्रकाश के महत्‍व का पता चला तो उसने स्‍वयं भी आग के रूप में प्रकाश को देखा, धीरे-धीरे पत्‍थरों को रगड़कर वह नियमित आग जलाने लग गया। सूखे पेड़-पौधों को जलाकर आग की मदद से वह स्‍वयं को जंगली जानवरों से सुरक्षित रखने लगा। अब मनुष्‍य ने अंधेरे से लड़ने के लिए प्रकाश या आग को हथियार के रूप में काम में लेना शुरू किया। जलती लकड़ी एक मशाल के रूप में उसके मार्ग को आलोकित करने लगी। वहीं से शायद 'तमसा मां ज्‍योर्तिगमय' की गूंज उठी। तरह-तरह की मशालें बनायी गयी।

माटी के नन्‍हें दिये का आविष्‍कार हुआ। पत्‍थर की चिमनियां बनायी गयी। उनमें तेल जलने लगा। ईसा पूर्व 1000 वर्ष से ही तेल जलाकर प्रकाश पैदा किया जाने लगा। कांसे और पीतल के दीपक बने। दीपक केवल एक वैज्ञानिक उपकरण नहीं रहा। वह हमारी सम्‍पूर्ण संस्‍कृति का प्रतीक बन गया। उसकी पूजा अर्चना होने लगी। अज्ञान, अंधकार, असत, अन्‍याय के विरूद्ध लड़ने का सबल प्रतीक बन गया दीपक। दीपक जलाना तथा दीपदान करना एक त्‍यौहार बन गया। दीपक कई आकारों में बनने लगे। पशु, पक्षी, पेड़ आदि के रूप में दीपक बनने लगे। वृक्ष दीप में 108 दीपक होते हैं। चर्बी और तेल दीपों के बाद खाने के तेल के लैम्‍प का आविष्‍कार हुआ। लालटेन, चिमनी और लैम्‍प बने। गैस से भी प्रकाश किया जाने लगा।

लेकिन अन्‍धकार से लड़ने का असली हथियार आया जब विद्युत का आविष्‍कार हुआ। बिजली के आविष्‍कार का श्रेय थामस अल्‍वा एडीसन को है। फिर ट्‌यूब लाइटें, फिर रंगीन लाइटें और धीरे-धीरे प्रकाश ने अंधकार को भगा दिया। प्रकाश के अनेक रूप बने, सबका एक ही काम अंधकार को दूर करो। सोडियम, लैम्‍प, गैसों वाली ट्‌यूबें, नियोनसाइन लैम्‍प और हजारों तरह की रोशनियां। प्रकाश पर्व पर हमें प्रकाश के प्रमुख देवता सूर्य और उसके सात घोड़ों को भी याद रखना चाहिए। पृथ्‍वी पर जब-जब भी अंधकार की काली रात्रि छायेगी, सूर्य के प्रकाश का इंतजार रहेगा। प्रकाश हमारे जीवन को प्रकाशित करता है, आलोकित करता है। दीपक चाहे मिट्‌टी का हो या बिजली का हमें अंधकार से लड़ने की, आगे बढ़ने की और संघर्ष करने की प्रेरणा देता है।

प्रकाश की प्रक्रिया, प्रकाश की प्रकृति और प्रकाश का अध्‍ययन भौतिक विज्ञानी आज भी कर रहे है और शायद अभी सैकड़ों वर्षों तक करेंगे क्‍योंकि प्रकाश ही जीवन है।

गता है जैसे चाचा दिल्‍लगी दास अब इस भ्रष्‍टाचार से काफी आजिज आ चुके थे, नाम सुना नहीं कि भड़क उठते थे। मगर आज जब से भ्रष्‍टाचार मुक्त समाज का नाम सुना है पुलक उठे हैं। सो चाचा बोले कि भतीजे इस भ्रष्‍टाचार के हटते ही मुल्‍क के मौजूदा तमाम मसअलात का खुद-ब-खुद तसफिया निकल जाएगा जैसे कि बेरोजगारी तो इस भ्रष्‍टाचार के खात्‍में के साथ ही इस मसअले का खात्‍मा समझो। क्‍योंकि फिर सरकारी नौकरियों में रिश्‍वत तो रहेगी नहीं,ऐसे में कौन जाना चाहेगा इनमें,और फिर कोई भी रोजगार कार्यालय में अपना नाम दर्ज नहीं करवाएगा सबको पता होगा कि जब रिश्‍वत ही नहीं रही और उपर से काम भी करना पड़ेगा तो फिर प्राइवेट सेक्‍टर क्‍या बुरा है। आगे चलकर सरकार को नियम भी बनाना पड़ सकता है कि प्रत्‍येक व्‍यक्ति को कम से कम इतने वर्ष तो अनिवार्य रूप से अपनी सेवाएं किसी सरकारी महकमें में देनी पड़ेगी।

एक मसअला है महंगाई सो इसकी भी भ्रष्‍टाचार के साथ ही खात्‍मा हो जाएगा। जानते हो मुल्‍क में मूल्‍य वृद्धि का कारण क्‍या है ? वो है सरकारी खरीद,जिसमें तीन रुपए के क्रीत सामान का तेरह रुपए का बिल बनवाया जाता है और बिल बनाते-बनाते दुकानदार के भेजे में उन चीजों का वो सरकारी भाव वसूलने लग जाता है। जब भ्रष्‍टाचार मिट जाएगा तो सरकारी महकमात में अनावश्‍यक सामान कई गुना कीमत में नहीं खरीदा जाएगा,सरकारी खर्चों में भारी कमी आएगी जिसका सीधा असर महंगाई पर पचास रुपए में घी मिलने लग जाए तो अधिक ताअज्‍जुब नहीं होगा।

रही बात शिक्षा की तो फिर डिग्रियां पैसों से खरीदी नहीं जाएगी और कोई डिग्री खरीद कर करेगा भी क्‍या फिर तो सभी जगह काम काबीलियत देख कर दिया जाएगा। भ्रष्‍टाचार नहीं रहा तो शिक्षा के लिए चलाए जा रहे अभियान सफल होंगे, फिर साक्षरों-शिक्षितों के आकड़े झूंठे नहीं भेजे जांएगे, जहां शिक्षा नहीं पहुंच पाएगी उसके कारणों का पता लगा कर सार्थक उपाय किए जाएंगे। महंगाई नहीं रहेगी तो आम आदमी अपने बच्‍चों को बाल मजदूरी के लिए मजबूर न करके उन्‍हें स्‍कूल भेजने में समर्थ होगा। यानि कि अब तक शिक्षा आम आदमी तक भ्रष्‍टाचार ही नहीं पहुंचने दे रहा था।

इस भ्रष्‍टाचार के खात्‍में के पश्‍चात राजनीति में भी आमूलचूल परिवर्तन देखने को मिलेंगे। तब कोई न तो चुनाव में खड़ा होना चाहेगा क्‍योंकि अगर भ्रष्‍टाचार नहीं रहा तो फिर राजनीति में रहेगा ही क्‍या, फिर मंत्री पद पाने के लिए न तो पार्टिया जुड़ेगी-तुड़ेगी, खरीद-फरोख्‍त होगी सो ऐसे में स्‍वेच्‍छा से कोई राजनीति में आना ही नहीं चाहेगा, खराब स्‍कूल रिकार्ड के मुताबिक किसी को जबरन ही राजनीति में उतारा जाएगा, अगर उसके सामने कोई खड़ा न हो तो ज्‍यादा अचम्‍भा नहीं होगा।

स्‍वास्‍थ्‍य सम्‍बन्‍धी समस्‍या भी भ्रष्टाचार के पीछे-पीछे ही रवाना हो जाएगी, क्‍योंकि फिर हॉस्‍पिटल सप्‍लाई की पूरी की पूरी दवाईयां मरीजों को मिलेगी तो मरीज को बाजार से दवाएं नहीं खरीदनी पड़ेगी, डॉक्‍टर तब चिकित्‍सा को व्‍यवसाय न मानकर सेवा समझ कर बिना फीस लिए रात दिन रोगियों की जांच और देखभाल करेंगे तो यकीनन मरीज स्‍वस्‍थ होकर अपने पांवों से चलकर घर जाएगा न कि अस्‍पताल से मुर्दाघर के रास्‍ते चार लोगों के कंधों पर सवार होकर कब्रिस्‍तान को। और आतंकवाद जैसे शब्‍दों की तो लोग वर्तनी तक भूल जाएंगे। मगर भतीजे यह सब मुमकिन कैसे होगा? मेरी राय में तो इसका तात्‍कालिक उपाय है इस मुद्रा के चलन को बंद कर दिया जाए तो ये रिश्‍वतखोरी और भ्रष्‍टाचार एक दम से रोका जा सकता है। अगर मुद्रा विनिमय नहीं रहा तो आम जीवन में वस्‍तु विनिमय चल पड़ेगा जो भ्रष्‍टाचार के रास्‍ते का रोड़ा बन जाएगा। फिर मंत्रीजी व ठेकेदार इंजीनियर कोलतार, रोड़ी, सिमेंट, कंकरीट खाकर कहां जमा करेंगे, एक पटवारी किसान से रिश्‍वत में ग्‍वार लेकर अपनी किसी भैंस को ले जाकर खिलाएगा, डॉक्‍टर एक कुम्‍हार से फीस में एक की जगह दो मटकियां लेकर सर पर धरे कहां फिरेगा, एक बिजली विभाग का कर्मचारी किसी बिजली चोर आरा मशीन वाले से कितनी लकड़ियां सर पर धर कर ले जाएगा। अगर मुफ्‍त में रगडा़ना चाहा तो नाई चीरा लगा देगा, धोबी कपड़े जला देगा, दर्जी कपड़ा खाकर तंग पतलून सिल देगा, गड़रिया रास्‍ते में बकरी का आधा दुध निकाल लेगा, ब्राह्मण गणेश पूजा के श्‍लोकों की जगह गरुण पुराण के पृष्‍ठ पढ़कर परिणय संस्‍कार सम्‍पन्न करवा देगा आदि-आदि।

चाचा ने भ्रष्‍टाचार पर अपना तफसरा जारी रखते हुए आगे कहा, इस वस्‍तु विनिमय से भ्रष्‍टाचार पर अंकुश तो जरुर लगेगा मगर भ्रष्‍टाचार के संवाहक विषाणु आदमी के खून में तो फिर भी बने रहेंगे। और यह ‘बाबू' नाम का जीव वस्‍तु व सेवा विनिमय की स्‍थिती में भी रिश्‍वत खाने का नया नायाब नुस्‍खा निकाल ही लेगा। भ्रष्‍टाचार का नेस्‍तनाबूद न तो कोई नया कानून बनाने से होगा और न ही पुराने कानूनों को कड़ाई से अमल में लाने का कानून बनाने से । अगर हमें वाकई भ्रष्‍टाचार मुक्त समाज की रचना करनी है तो इसका एकमात्र उपाय है ‘भ्रष्‍टाचार उन्‍मूलक टीके' की ईजाद। जो टीका हर आम और हर खास आदमी के लगा दिया जाए। नए पैदा होने वाले बच्‍चों को टीका कैम्‍प लगा-लगाकर पिलाया जाए, अनुज्ञापत्र पासपोर्ट, राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, स्‍कूल के दाखिले, पैन टेन नम्‍बर आदि प्राप्‍त करने से पूर्व यह टीका लगाने की अनिवार्यता कर दी जाएगी तब ही भ्रष्‍टाचार का सफाया सम्‍भव हो पाएगा। वरना यह ‘खबर' एक ‘कहानी' भर बन कर रह जाएगी।

पुरुषोत्तम विश्‍वकर्मा

   हाइकु 
जीवन-मृत्यु 
-- 

प्रत्येक क्षण 

जीवन का,है बोध 

का अवसर.

 

अनावृत हो

रहस्य नया,पढो 

मंत्र सस्वर .

 

रहो ना सिर्फ 

जी लेने में जीवन

छोड़ो असर.

 

कब चेतोगे?

आयी अब तो बस 

अंत-पहर

 

आपाधापी में 

बीता जीवन ,अब 

जरा ठहर.

 

मृत्यु को जानो

नहीं तो भटकोगे 

जीवन-भर. 

 

---

नोट;हाइकु ५-७-५ अक्षरों की त्रिपदी है


v k verma
vijayvermavijay560@gmail.com

मेरी पृष्‍ठभूमि गांव की है, जहां मैंने अपने बचपन के 16 साल व्‍यतीत किये थे, मुझे अक्‍सर घर में पानी भरने का काम सौंपा जाता था, गाय, बैल,भैंस के लिये तो पानी बराबर चाहता था, मुझे उस समय बहुत गुस्‍सा आया करता था। मैं अपनी दो छोटी छोटी बाल्‍टियां लेकर कुएं पर जाता था। मुझे उस समय कुएं से पानी निकालने की मनाही थी। अक्‍सर तो कुए के जगत पर औरतें ही रहती थी शायद वह ही ऐसा स्‍थान था जहॉ वो अपने दिल की बात अपने साथियों से कर सकती थी किसकी सास ने क्‍या कहा......... किसका देवर कैसा है.......... किसकी बहु ने अपनी सास को खरी खोटी सुना दी,......... किसकी बहु कितना दहेज लाई है,आदि आदि.............जिस चीज को घर पर नहीं कह पाती थी और जिसका उन्‍हें अजीर्ण हो जाया करता था वह अजीर्ण पनघट चूर्ण खाकर ठीक हो जाता था। अक्‍सर जब महिलायें पनघट पर रहती थी तो मेरी बाल्‍टियां जल्‍द भर जाती थी.............. पुरूषों के मामले में मुझे काफी देर तक इन्‍तजार करना पड़ता था........... अक्‍सर लोग मुझसे अपनी बीड़ी सिगरेट, पान तम्‍बाकू मंगाया करते थे तब कहीं जाकर वो मेरी बाल्‍टियों में पानी दिया करते थे। मेरे खेलने का सारा समय पानी भरने में लग जाता था। उस समय मैं सोचा करता था कि जब मुझे कुए से पानी निकालना आ जायेगा तो मैं किसी को मना नहीं करूंगा, सबके घडे मटके बाल्‍टी भर दिया करूंगा ...यदि उस समय मेरी नजरों में सबसे बड़ा कोंई दान था तो पानी देने का........

समय गुजरता गया मैं पढ लिखकर नौकरी पर लग गया मैंने शहर में ही एक बड़ा सा मकान बनवा लिया लेकिन मेरा वह पूर्वग्रह अब तक खत्‍म नहीं हुआ था मैंने अपने लॉन में पानी का एक बडा सा भूमिगत टैंक बनवा लिया जिसे पानी की मोटर से जोड़कर छत पर बने 1500-1500 लीटर के तीन टैंकों से पानी भर लिया जाता था। मेरा बड़ा लड़का दिल्‍ली शहर में नौकरी करने लगा अब घर में हम तीन प्राणी थे मैं, धर्मपत्‍नी, और पुत्री और हमारे लिये पानी की कोई कमी न थी। रोज सुबह बाहर पाइप से धुलवाया जाता कभी काम वाली से, कभी मैं खुद धोता था, गमलो में रोज पानी दिया जाता, जरा सा गन्‍दा होने पर तुरन्‍त पाइप लगाकर साफ कर दिया जाता था। शायद पानी के प्रति जो कमी मुझे बचपन में मिली थी उसका बदला अब मैं पानी को बहाकर पूरा करना चाहता था।

...............एक दिन शहर में बडी जोर से आंधी आयी, बिजली के पोल पर पेड गिरे कई मकानों की छत गिरी, कितनों के झोपडे उड गये........... बिजली विभाग ने सप्‍लाई बन्‍द कर दी, पानी आने को प्रश्‍न ही नहीं था। लेकिन मुझे कोई्र चिन्‍ता नहीं थी क्‍योंकि मेरा पानी का भण्‍डार भरा था। रात से ही जलकल विभाग वाले पानी की आपूर्ति के लिये प्रयास कर रहे थे सारे शहर में पानी के लिये त्राहि त्राहि मची थी लेकिन बिजली न आने के कारण पम्‍प हाउस से पानी नहीं भेजा जा सकता था।

सुबह करीब सात बजे लाइट आ गयी, लेकिन पानी की आपूर्ति अभी तक नहीं हो पाई थी लोग अपने डब्‍बे, बाल्‍टी, बोतल लेकर एक जगह से दूसरी जगह पानी की तलाश में घूम रहे थे, सभी कोठियों वालों से पूछा जाता ................क्‍या आपके यहां से एक बाल्‍टी पानी मिल जायेगा? अक्‍सर उन लोगों को मना कर दिया जाता। फिर दूसरे से तीसरे, तीसरे से चौथे घर में पूछा जाता ......लेकिन सब जगह से मना ही मिलता।...............

मै अपने टैंक से पानी का पाइप लगाकर अपना ऑगन धोने लगा कल के ऑधी बारिश ने जगह जगह मिट्‌टी कर दी थी, वही लोग मेरे घर भी आये ............... पानी मांगा, मैने कहा यहां तो नहाने का पानी नहीं हैं और पता नहीं कब पानी आयेगा............................ पानी वानी नहीं है। ... वो निराश होकर जाने लगे .......तभी मेरी लड़की ने कहा........ आंगन शाम को भी घुल जायेगा, आप अपना समय क्‍यों भूल गये पापा......आप की नजरों में तो पानी का दान सबसे बड़ा दान हुआ करता था.......आज आपको इनकी मजबूरी नहीं दिखाई दे रही है.........वह मेरे हाथ से पाइप लेकर उनके बर्तनों में पानी देने लगी...........................

मैं उन सबके सामने अपराधी की तरह खडा था .......

---

RK Bhardwaj

151/1 Teachers’ Colony, Govind Garh,

Dehradun (Uttarakhand)

E mail: rkantbhardwaj@gmail.com

Phone: 0135-2531836(Residence)

yogendra vyom

ग़ज़ल

आज फिर अख़बार की ये सुर्खियाँ हैं ।

गाँव सहमे-से डरी-सी बस्‍तियाँ हैं ॥

 

कह रहा है ज्‍वार भाटा सिंधु से यह ।

अब सफ़र में और कितनी क़िश्‍तियाँ हैं ॥

 

रात भर रोयी सुबककर चाँदनी यूँ ।

अश्‍क़ हाथों में सहेजे पत्तियाँ हैं ॥

 

मृत्‍यु भी तो जन्‍म का इक रूप ही है ।

सोच अपनी और अपनी दृष्‍टियाँ हैं ॥

 

चिट्ठियाँ तो हो गईं हैं गुमशुदा अब ।

याद करने को बचीं बस हिचकियाँ हैं ॥

 

आज कुहरे का लगा दफ़्‍तर सुबह से ।

धूप की खारिज हुईं सब अर्जि़याँ हैं ॥

 

फूल बम बिस्‍फोट में जबसे जले कुछ ।

‘व्‍योम' दहशत में तभी से तितलियाँ हैं ॥

 

ग़ज़ल

अब किसी घर में न कोई तीरग़ी क़ायम रहे ।

हो यही कोशिश सभी की रोशनी क़ायम रहे ॥

 

हर तरफ छाया हुआ है खौफ का कुहरा घना ।

है ज़रूरी अम्‍न की अब धूप भी क़ायम रहे ॥

 

ज़िन्‍दगी में साथ हैं परछाइयों सी उलझनें ।

पर हमेशा हौंसलों में ज़िन्‍दगी क़ायम रहे ॥

 

हो बुज़ुर्गों की दुआओं का असर कुछ इस तरह ।

हम तरक़्‍की भी करें तहजीब भी क़ायम रहे ॥

 

गीत लिख या फिर ग़ज़ल लेकिन हमेशा ध्‍यान रख ।

‘व्‍योम' तेरी शायरी में ताज़गी क़ायम रहे ॥

 

ग़ज़ल

बताता है हुनर हर शख्‍़स को वह दस्‍तकारी का ।

ज़रूरतमंद की इस शक्‍ल में इमदाद करता है ॥

 

कमाता है हमेशा नेकियाँ कुछ इस तरह से वो ।

परिन्‍दों को कफ़स की क़ैद से आज़ाद करता है ॥

 

कहा उसने कभी वो मतलबी हो ही नहीं सकता ।

मगर तकलीफ़ में ही क्‍यों ख्‍़ाुदा को याद करता है ॥

 

कभी-भी कामयाबी ‘व्‍योम' उसको मिल नहीं सकती ।

हक़ीकत जानकर भी वक़्‍त जो बरबाद करता है ॥

 

ग़ज़ल

अर्श छूने की अगर तुझ में प्रबल है कामना ।

तो नये पावन सपन मन में सखे तू पालना ॥

 

राह जीवन की कँटीली और तम से हो भरी ।

हाथ तब तू हौंसले के जुगनुओं का थामना ॥

 

दी तुझे छाया सदा ही पंथ में जिस पेड़ ने ।

तू कभी भी स्‍वार्थवश उस पेड़ को मत काटना ॥

 

जातियों के धर्म के झगड़े मिटाकर आपसी ।

आज सब मिलकर करें हम राष्‍ट्र की आराधना ॥

 

ज़िन्‍दगी संघर्ष का ही नाम तो है दूसरा ।

जूझ इनसे ‘व्‍योम' डर मत कर हमेशा सामना ॥

--

नाम : योगेन्‍द्र कुमार वर्मा

साहित्‍यिक नाम : ‘व्‍योम'

पिता का नाम : स्‍व0 श्री देवराज वर्मा

जन्‍मतिथि : 09ण्‍09ण्‍1970

शिक्षा : बी.कॉम.

सृजन : गीत, ग़ज़ल, मुक्‍तक, दोहे, कहानी, संस्‍मरण आदि

कृति : इस कोलाहल में (काव्‍य-संग्रह)

प्रकाशन : प्रमुख राष्‍ट्रीय समाचार पत्रों, साहित्‍यिक पत्रिकाओं

तथा अनेक काव्‍य-संग्रहों में रचनाओं का प्रकाशन

प्रसारण : आकाशवाणी रामपुर से अनेक बार कविता कार्यक्रम

प्रसारित

सम्‍प्रति : लेखाकार (कृषि विभाग, उ0प्र0)

विश्‍ोष : संयोजक - साहित्‍यिक संस्‍था ‘अक्षरा' , मुरादाबाद

सम्‍मान : काव्‍य संग्रह ‘इस कोलाहल में' के लिए भाऊराव देवरस सेवा न्‍यास

लखनऊ द्वारा ‘पं0 प्रताप नारायण मिश्र स्‍मृति सम्‍मान-2009'

पत्राचार एवं स्‍थायी पताः ।स्‍.49, सचिन स्‍वीट्‌स के पीछे, दीनदयाल नगर फेज़-प्रथम्‌,

काँठ रोड, मुरादाबाद-244001 (उ0प्र0)

ई-मेल : vyom70@yahoo.in

- योगेन्‍द्र वर्मा ‘व्‍योम'

।स्‍.49, सचिन स्‍वीट्‌स के पीछे,

दीनदयाल नगर फेज़-प्रथम्‌

काँठ रोड, मुरादाबाद(उ0प्र0) चलभाष-941280598

मैं यहीं रहता हूँ

इसी पेड़ के नीचे

अकेला, उजाड़

या शायद कबाड़

कभी बैठा, कभी लेटा,

कभी अधलेटा

कभी ओढ़ता हूँ चीथड़े

और कभी नग्न

रहता हूँ

कुत्तों ने भोंकना

छोड़ दिया है

पर इंसानों को मेरी

परछाई छू जाने भर से

उबकाई आती है

कौन हूँ, क्या हूँ, कहाँ से आया

नहीं जानता

बस बुदबुदाता हूँ कुछ

मैले से बेमेल शब्द

मैं यहीं रहता हूँ

इसी पेड़ के नीचे

दिन-भर, इधर-उधर

कूड़े के ढेर में

घूमता हूँ

जो कुछ भी

अपना सा लगता है

भर लेता हूँ

एक बोरी में

जो कुछ भी फेंका जाता है

मेरी ओर

खा लेता हूँ

खाली दुत्कार और फटकार

से पेट नहीं भरता

तो कभी कभी

खा जाता हूँ अखबार भी

मैं यहीं रहता हूँ

इसी पेड़ के नीचे

एक ऐसी दुनिया में

जो अलग है

जैसे घसीट कर रख दी गई हो

एक कोने में

जहाँ केवल मैं हूँ

खुद से बतियाता हुआ

जब कभी इस दुनिया से

निकला तो पत्थर मार

कर फेंक दिया गया

वापस

इसी पेड़ के नीचे

जहाँ अब भी पड़ा हूँ

मैं यहीं रहता हूँ

इसी पेड़ के नीचे

आज भी लौटा हूँ

सिर पर पत्थर खा कर

शायद सफ़ेद होगा

तुम्हारी दुनिया में

पर मेरी दुनिया में ये लाल है

जो मेरे सिर से रिसता हुआ

मेरे चेहरे पर फ़ैल रहा है

रात गुजर रही है

बारिश हो रही है

पर मेरा शरीर जल रहा है

क्या कल मेरी दुनिया में सुबह होगी?

pramod bhargav

हमारे देश में सड़ता अनाज इंसान की प्राकृतिक भूख की जरूरत से नहीं लाभ-हानि के विश्‍वव्‍यापी अर्थशास्‍त्र से जुड़ा है। इसलिए चुनिंदा संपादकों के साथ बातचीत में अर्थशास्‍त्री प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को यह कहने में कोई आत्‍मग्रंथि परेशान नहीं करती कि यदि अनाज को यों ही भूखों को बांट दिया गया तो किसानों को पैदावार के लिए प्रोत्‍साहित नहीं किया जा सकता। क्‍या विडंबना है कि आर्थिक मंदी के दौर में जब औद्योगिक घरानों को बडे़ पैकेज दिए तब क्‍यों यह बात नहीं सोची गई कि प्रोत्‍साहन पैकेजों से उद्योगपति ज्‍यादा औद्योगिक उत्‍पाद बाध्‍य नहीं होंगे ? यही नही कंपनियों की दी जाने वाली अनेक प्रकार की छूटें (सब्‍सिडी) जन कल्‍याण योजनाओं के खर्च से चार गुना ज्‍यादा हैं। छूट के बावजूद देश के प्रमुख सौ उद्योगपतियों पर 1.41 लाख करोड़ रूपये कर के रूप में बकाया हैं। मौजूदा बजट में ही गरीबों की खाद्य सुरक्षा की दुहाई देने वाली सरकार ने कुटिल चतुराई से 450 करोड़ रूपये की छूट की कटौती की है। लेकिन ये सब तथ्‍य इसलिए नजरअंदाज कर दिए जाते हैं क्‍योंकि भूख और सड़ते अनाज का भी अपना एक अर्थशास्‍त्र है, जिसकी बहाली सरकार के लिए जरूरी है। अलबत्ता सड़ते अनाज को मुफ्‍त या सस्‍ते में बांटकर खाद्य सुरक्षा के दृष्‍टिगत नई खरीदी पर सरकार के ऊपर छूट का दोहरा बोझ बढ़ता ? मुफ्‍त में अनाज बांटा जाता तो व्‍यापारियों के हित प्रभावित होते। अनाज के दाम घटते और अनाज भण्‍डारों में व्‍यर्थ पड़ा रहता ? इसलिए प्रधानमंत्री के इस बयान को हम गरीबी और कुपोषण के सिलसिले में भले ही आर्थिक सरंचना की विफलता कहें, लेकिन बाजार और व्‍यापारी के हित-पोषण की अर्थशास्‍त्रीय दृष्‍टि से यह सफलता का सूक्‍ति वाक्‍य है।

सच्‍चाई तो यह है कि बाजारवाज के मद्‌देनजर हमारे देश में भूख को भी आर्थिक दोहन का मुकम्‍मल आधार बनाया जा रहा है। देश में 30 से 35 लाख टन अनाज भण्‍डारण की क्षमता है, लेकिन समर्थन मूल्‍य पर अनाज खरीदा जाता है 60 से 65 लाख टन। ऐसे में आधा अनाज खुले में भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है। तिस पर भर भी गौरतलब यह है कि समाचार माध्‍यमों से हैरानी में डालने वाली जानकारियां यहां तक आ रही हैं कि भारतीय खाद्य निगम ने अपने कुछ गोदाम बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों को सस्‍ती दरों पर किराये पर उठा दिये हैं। ऐसे विपरीत हालातों में कंपनियों का माल तो सुरक्षित है, लेकिन सरकारी खरीद का कुछ माल बरामदों में तो कुछ खुले में सड़ रहा है। इन गरीब विरोधी हालातों के चलते 168 लाख टन गेहूं बरबाद हो चुका है। इस अनाज से देश के 20 करोड़ भूखों को एक साल तक खाद्य सुरक्षा हासिल कराई जा सकती थी। देश में तकरीबन इतने ही ऐसे लोग हैं। अनाज को इसलिए भी जान बूझकर सड़ने को छोड़ दिया जाता है जिससे अनाज खरीद पर किए गोलमाल पर पर्दा डला रहे।

सरकार की तरफदारी करने वाले कुछ अर्थशास्‍त्रियों का तर्क है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्‍यम से बांटे जाने वाले इस अनाज में बहुत झोल हैं। भ्रष्‍ट व्‍यवस्‍था के चलते अनाज का एक बहुत बड़ा हिस्‍सा फिर से कारोबारी सस्‍ती दरों पर खरीद लेंगे और फिर सरकार को बेच देंगे। यह आशंका जायज है। राजनेता, अधिकारी और व्‍यापारियों के बीच कदाचरण का ताजा और उम्‍दा उदाहरण अरूणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्‍यमंत्री गोगांग अपांग का है। हाल ही में उन्‍हें पीडीएस से जुडे़ एक हजार करोड़ रूपये के घोटाले में हिरासत में लिया गया है। लेकिन वितरण प्रणाली में दोष के चलते गरीबी रेखा के नीचे रह रही एक तिहाई आबादी को भूखे पेट नहीं छोड़ा जा सकता ? न्‍यायाधीश डीपी वाधवा भी कह चुके हैं कि पीडीएस में उपभोक्‍ता तक राशन पहुंचते-पहुंचते अस्‍सी प्रतिशत तक काला बाजारी की गिरफ्‍त में आ जाता है।

सर्वोच्‍च न्‍यायालय को नीति-निर्धारण में दखल न देने की हिदायत देकर प्रधानमंत्री ने साफ कर दिया है कि सरकार गरीबों की हितकारी है या विरोधी ? जनता के ‘आहार के अधिकार' को अनीति में बदलकर जब उनकी खाद्य सामग्री सड़ने को खुले में छोड़ दी जाएगी तो नागरिकों का संवैधानिक दायित्‍व बनता है कि वे न्‍यायालय का दरवाजा खट खटाएं। अदालत के आदेश की अवहेलना करते हुए प्रधानमंत्री ने जब अपना रूख साफ कर दिया तो अब जनता और जन संगठनों का हक बनता है कि वे वास्‍तविक खाद्य सुरक्षा के लिए देश की राजनैतिक अर्थव्‍यवस्‍था बदलने में मजबूती से जुटे जाएं। जिससे नए रूप में जब यह कानून सामने आए तो इतना सशक्‍त, असरकारी और जवाबदेह हो कि मौजदा प्राणलियों से भूखे के पेट में पहुंचने वाला अनाज ‘ऊंट के मुंह में जीरा' भर न रह जाए। इसके साथ ही खाद्य सुरक्षा के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता संपूर्ण राष्‍ट्र के प्रति हो न होकर देश के केवल 150 जिलो के प्रति है।

इस समय अमेरिका के दबाव में पूरी दुनिया में ऐसे उपाय और नीतियां अमल में लाई जा रही हैं जिससे खाद्यान्‍न का व्‍यापार बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के कब्‍जे में पहुंच जाए। दुनिया के अनाज व्‍यापार पर फिलहाल तीन कंपनियां कारगिल, एडीएम और बंग कुण्‍डली मारकर बैठी हैं। विश्‍व का 90 फीसदी अनाज बाजार पर इनका सीध्‍ ाा नियंत्रण है। अंतरराष्‍ट्रीय मुद्रा कोष, विश्‍व व्‍यापार संगठन और विश्‍व बैंक के हमेशा ऐसे प्रयास रहते हैं कि इन खाद्यान्‍न कंपनियों और इनके कृपापात्र बड़े कृषकों को अनाज आयात-निर्यात के अवसर मिलें। तिसरी दुनिया के जो देश इन कंपनियों की जकड़न में आ गए हैं उन्‍हें ये ऐसी फसलों की पैदावार के लिए विवश करते हैं जिससे यूरोप और अमेरिका के हित साध्‍य हों। ऐसी ही लाचारी के चलते केन्‍या को फूल उत्‍पादन और ब्राजील को अमेरिका के लिए सोयाबीन पैदा करने के लिए मजबूर किया गया। नतीजतन स्‍थानीय लोगों की खाद्य सुरक्षा संकट में आ गई। इन्‍हीं विवशताओं के चलते मेक्‍सिको में पचास लाख छोटे किसान और कृषि मजदूर नगरों की ओर पलायन कर गए। कृषि विरोधी ऐसी ही वजहों से विश्‍व की कृषि पैदावार में 3.5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

हमारे देश में अनाज का संकट वास्‍तविक नहीं है सरकारी योजनाओं में भ्रष्‍टाचार फलने-फूलने और व्‍यापारियों को लाभ पहुंचाने के दृष्‍टिगत खाद्य संकट कृत्रिम रूप से भी खड़ा किया जाता है। सामान्‍य स्‍थिति में भी एफसीआई के भण्‍डारों में पचास हजार करोड़ रूपये से ज्‍यादा का खाद्यान्‍न बर्बाद हो जाता है। फसल काटने, दांय (थ्रेसिंग) करने से लेकर किसान के घर और फिर अनाज मंडियों से सरकारी व निजी भण्‍डार गृहों तक पहुंचाते-पहुंचाते इतना अनाज बर्बादी की भेंट चढ़ जाता है, जितनी आस्‍ट्रेलिया जैसे देशों की कुल पैदावार है। व्‍यर्थ जाने वाले इस अनाज का संचय और उचित भण्‍डारण व वितरण कर लिया जाए तो भारत विश्‍व भूख सूचकांक से बाहर आ जाएगा।

भारतीय खाद्य निगम यदि विकेंद्रीकृत भण्‍डारण नीति अपनाए तो ग्राम स्‍तर पर भी भण्‍डारण के श्रेष्‍ठ प्रबंध किए जा सकते हैं, जिनमें अनाज बारिश, बाढ़, चूहों व अन्‍य कीटों से बचाकर पूरे साल सुरक्षित रख लिया जाता है। गांव में ही समर्थन मूल्‍य पर अनाज खरीदकर एफसीआई उसके भण्‍डारण की जवाबदेही किसान पर डाल दे। भण्‍डारण सुविधा व सुरक्षा के दृष्‍टिगत किसान को प्रति िक्‍ंवटल एक तय राशि अलग से दे। यदि ऐसे उपाय सुनिश्‍चित होते हैं तो देश यातायात लदाई-उतराई में होने वाले खर्च से भी बचेगा। इस अनाज को किसान के भण्‍डार से निकालकर सीधे गांव में मध्‍यान्‍ह भोजन और बीपीएल व एपीएल कार्ड धारियों को भी पीडीएस के जरिये आसानी से उपलब्‍ध कराया जा सकता। इस विधि को यदि नीतिगत मूर्त रूप दे दिया जाता है तो व्‍यापारिक कालाबाजारी की आशंकाएं भी नगण्‍य रह जाएंगी।

लेकिन देश में जब जान-बूझकर केंद्रीयकरण की (कु) नीति अपनाकर चंद बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों को खेती और फसल के उत्‍पादन के साथ बीज, जीएम बीज, खाद, कीटनाशक और खरपतवार नाशक उत्‍पादों के निर्माण की जिम्‍मेबारी सप्रयास सौंपी जा रही हो तो भला ग्राम स्‍तर पर अनाज भण्‍डारण की बात कैसे सोची जा सकती है। कुछ ऐसे ही कुत्‍सित उपायों से कृषि और किसान को संकट में डाला जा रहा है। जबकि देश की 66 फीसदी आबादी सीधे कृषि से जुड़ी है। इसके बावजूद देश की आमदनी से जुड़े स्रोत पर कृषि का दावा केवल 17 प्रतिशत माना जाता है। वहीं निजी कंपनियों का हिस्‍सा एक प्रतिशत से भी कम है, लेकिन वे 33 फीसदी कमाई पर अपना दावा जताती हैं। और शेष कमाई मसलन 55 प्रतिशत सरकारी अधिकारी कर्मचारी हथिया लेते हैं।

आय पर दावों की इतनी विषमता के बावजूद केंद्र सरकार की मंशा है कि बीपीएल और एपीएल कार्ड धारियों की संख्‍या में इजाफा न हो, ताकि खाद्यान्‍न छूट से लेकर गरीबी उन्‍मूलन से जुड़ी योजनाओं पर दी जाने वाली छूटें कम बनी रहें। इसलिए प्रधानमंत्री की यह बात भी गरीबों के प्रति छद्‌म संवेदना प्रतीत होती है, जिसमें वे राहुल गांधी के विचार से सहमति जताते हुए कहते हैं कि देश में दो तरह के भारतीय मौजूद हैं। ऐसा इसलिए है क्‍योंकि कृषि और गैर कृषि व्‍यवसायों में लगे लोगों की आय के बीच बहुत बड़ा अंतर है, जो अस्‍थिरता पैदा करने वाला है। इन हालातों को समझने की कोशिश करने के बावजूद आम आदमी के भले की दुहाई देने वाली सरकार बजट घाटा कम करने के बहाने 450 करोड़ रूपये की छूटों में बेहिचक कटौती कर लेती है। इससे जाहिर होता है कि सरकार इंसान की प्राकृतिक भूख अर्थात भोजन के अधिकार के प्रति ईमानदार नहीं है। इस भूख के प्रति सरकार अतनी हृदयहीन व निंरकुश हो गई है कि वह सड़ते अनाज को भी गरीबों में बांटने को तैयार नहीं है। सरकार के लिए सड़ता अनाज भी अर्थशास्‍त्रीय लेखा-जोखा भर रह गया है।

 

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प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी म.प्र.

लेखक प्रिंट और इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार है।

pramod bhargav

भारत में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, लेकिन शालेय शिक्षा व कुशल-अकुशल की परिभाषाओं से ज्ञान को रेखांकित किए जाने की विवशता के चलते केवल कागजी काम से जुड़े डिग्रीधारी को ज्ञानी और परंपरागत ज्ञान आधारित कार्य प्रणाली में कौशल-दक्षता रखने वाले शिल्‍पकार और किसान को अज्ञानी व अकुशल ही माना जाता है। यही कारण है कि हम देशज तकनीक व स्‍थानीय संसाधनों से तैयार उन आविष्‍कारों और आविष्‍कारकों को सर्वथा नकार देते हैं जो ऊर्जा, सिंचाई, मनोरंजन और खेती की वैकल्‍पिक प्रणालियों से जुड़े होते हैं। जबकि जलवायु संकट से निपटने और धरती को प्रदूषण से छुटकारा दिलाने के उपाय इन्‍हीं देशज तकनीकों में अंतर्निहित हैं। औद्योगिक क्रांति ने प्राकृतिक संपदा का अटाटूट दोहन कर वायुमण्‍डल में कार्बन उत्‍सर्जन की मात्रा बढ़ाकर दुनिया के पर्यावरण को जिस भयावह संकट में डाला है उससे मुक्‍ति के स्‍थायी समाधान अंततः देशज तकनीकों से वजूद में आ रहे उपकरणों व प्रणालियों में ही तलाशने होंगे। भारतीय वैज्ञानिक संस्‍थाएं और उत्‍साही वैज्ञानिकों को नौकरशाही के चंगुल से मुक्‍ति भी इन्‍हीं देशज मान्‍यताओं को प्रचलन का बढ़ावा देने से ही मिलेगी।

हमारे समाज में ‘घर का जोगी जोगना, आन गांव का सिद्ध' कहावत बेहद प्रचलित है। यह कहावत कही तो गुणी-ज्ञानी महात्‍माओं के संदर्भ में है किंतु विज्ञान संबंधी नवाचार प्रयासों के प्रसंग में भी खरी उतरती है। उपेक्षा की ऐसी ही हठवादिताओं के चलते हम उन वैज्ञानिक उपायों को स्‍वतंत्रता के बाद लगातार नकराते चले आ रहे हैं जो समाज को सक्षम और समृद्ध करने वाले हैं। नकार की इसी परंपरा के चलते हमने आजादी के पहले तो गुलामी जैसी प्रतिकूल परिस्‍थितियां होने के बावजूद रामानुजम, जगदीशचंद्र बोस, चंद्रशेखर वेंकट रमन, मेघनाद साहा और सत्‍येंद्रनाथ बोस जैसे वैज्ञानिक दिए लेकिन आजादी के बाद मौलिक आविष्‍कार करने वाला अंतराष्‍ट्रीय ख्‍याति का एक भी वैज्ञानिक नहीं दे पाए। जबकि इस बीच हमारे संस्‍थान नई खोजों के लिए संसाधन व तकनीक के स्‍तर पर समृद्धशाली हुए हैं। इससे जाहिर होता है कि हमारी ज्ञान-पद्धति में कहीं खोट है।

दुनिया में वैज्ञानिक और अभियंता पैदा करने की दृष्‍टि से भारत का तीसरा स्‍थान है। लेकिन विज्ञान संबंधी साहित्‍य सृजन में केवल पाश्‍चात्‍य लेखकों को जाना जाता है। पश्‍चिमी देशों के वैज्ञानिक आविष्‍कारों से ही यह साहित्‍य भरा पड़ा है। इस साहित्‍य में न तो हमारे वैज्ञानिकों की चर्चा है और न ही आविष्‍कारों की। ऐसा इसलिए हुआ क्‍योंकि हम खुद न अपने आविष्‍कारकों को प्रोत्‍साहित करते हैं और न ही उन्‍हें मान्‍यता देते हैं। इन प्रतिभाओं के साथ हमारा व्‍यवहार भी कमोबेश अभद्र ही होता है। समाचार-पत्रों के पिछले पन्‍नों पर यदा-कदा ऐसे आविष्‍कारकों के समाचार आते हैं जिनके प्रयासों को यदि प्रोत्‍साहित किया जाए तो हमें राष्‍ट्र-निर्माण में बड़ा सहयोग मिल सकता है।

उत्तरप्रदेश के हापुड़ में रहने वाले रामपाल नाम के एक मिस्‍त्री ने गंदे नाले के पानी से बिजली बनाने का दावा किया है। उसने यह जानकारी आला-अधिकारियों को भी दी। सराहना की बजाय उसे हर जगह मिली फटकार। लेकिन जिद्‌ के आगे किसकी चलती है। आखिरकार रामपाल ने अपना घर साठ हजार रूपये में गिरवी रख दिया और गंदे पानी से ही दो सौ किलो वॉट बिजली पैदा करके दिखा दी। रामपाल का यह कारनामा किसी चमत्‍कार से कम नहीं है। जब पूरा देश बिजली की कमी से बेमियादी कटौती की हद तक जूझ रहा है, तब इस वैज्ञानिक उपलब्‍धि को उपयोगी क्‍यों नहीं माना जाता ? जबकि इस आविष्‍कार के मंत्र में गंदे पानी के निस्‍तार के साथ बिजली की आसान उपलब्‍धता जुड़ी है।

इसके बाद रामपाल ने एक हेलिकॉप्‍टर भी बनाया। लेकिन उसकी चेतना को विकसित करने की बजाय उसे कानूनी पचड़ों में उलझा दिया गया। अपने सपनों को साकार करने के फेर में घर गिरवी रखने वाला रामपाल अब गुमनामी के अंधेर में है। जबकि समाजोपयोगी ऐसे उत्‍साही का मनोबल नगर पालिका और समाज सेवी संस्‍थाएं भी बड़ा सकती थीं ?

बिहार के मोतिहारी के मठियाडीड में रहने वाले सइदुल्‍लाह का आविष्‍कार भी किसी करिश्‍मे से कम नहीं है। उन्‍होंने जल के तल पर चलने वाली साइकिल बनाने का कारनामा कर दिखाया। उनके इस मौलिक सोच की उपज यह थी कि उनका गांव हर साल बाढ़ की चपेट में आ जाता है। नतीजतन लोग जहां की तहां लाचार अवस्‍था में फंसे रह जाते हैं। सइदुल्‍लाह इस साइकिल का सफल प्रदर्शन 1994 में मोतिहारी की मोतीझील में, 1995 में पटना की गंगा नदी में और 2005 में अमदाबाद में कर चुके हैं। इसके लिए उन्‍हें तत्‍कालिन राष्‍ट्रपति एपीजे अब्‍दुल कलाम ने सम्‍मानित और पुरष्‍कृत भी किया था।

इस पुरस्‍कार से उत्‍साहित होकर सइदुल्‍लाह ने पानी पर चलने वाले अद्‌भुत रिक्‍शे का भी निर्माण कर डाला। यह रिक्‍शा पानी पर बड़े आराम से चलता है। पुरस्‍कार की सारी राशि नए अनुसंधान के दीवाने इस वैज्ञानिक ने रिक्‍शा निर्माण में लगा दी। बाद में नए अनुसंधानों के लिए सइदुल्‍लाह ने अपने पुरखों की जमीन भी बेच दी और चाबी वाले पंखे, पंप, बैटरी-चार्जर और कम ईंधन खर्च वाले छोटे ट्रेक्‍टर का निर्माण करने में सारी जमा पूंजी खर्च दी। पर सरकारी सहायता और सइदुल्‍लाह द्वारा निर्मित उपकरणों को वैज्ञानिक मान्‍यता नहीं मिली। बेचारा कंगाल हो गया। नवाचार के नए उपक्रम भी बाधित हो गए। लिहाजा उसका हौसला पस्‍त हो गया। जबकि ऐसे जिज्ञासु अनुसंधित्‍सुओं को आर्थिक मद्‌द के विशेष प्रावधान होने चाहिए।

यहां गौरतलब यह भी है कि जब एक नवाचारी वैज्ञानिक के अविष्‍कारों को डॉ. कलाम जैसे वैज्ञानिक और राष्‍ट्रपति भी मान्‍यता दे चुके हों, वह वैज्ञानिक भी अफसरशाही के चलते बौना तो साबित हुआ ही कालांतर में उसने घर की पूंजी लगाकर नई खोजों से भी तौवा कर ली।

बिहार के वैशाली जिले में मंसूरपुर गांव के एक मामूली विद्युत उपकरण सुधारने वाले कारीगर राघव महतो ने मामूली धन राशि की लागत से अपने कम्‍युनिटी रेडियो स्‍टेशन का निर्माण कर डाला। और फिर उसका सफल प्रसारण भी शुरू कर दिया। 15 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में यह केन्‍द्र स्‍थानीय लोगों का मनोरंजन कर रहा है। एकाएक विश्‍वास नहीं होता कि इस प्रकार के प्रसारण के लिए जहां कंपनियां लाखों रूपये खर्च करती हैं, इंजीनियर-तकनीशियनों को रखती हैं, वही काम एक मामूली पढ़ा-लिखा विद्युत-मिस्‍त्री अपनी खोज के बूते कर रहा है। लेकिन अंग्रेजों से उधार ली हमारी अकादमिक व्‍यवस्‍था ऐसी है कि विज्ञान के प्रायोगिक व व्‍यावहारिक रूप को बढ़ावा नहीं मिलता। लिहाजा प्रसारण कंपनियां तो लाखों-करोड़ों कमाकर बारे न्‍यारे करने में लगी हैं लेकिन मौलिक प्रतिभाएं विकसित होने की बजाय सरकारी प्रोत्‍साहन व वैज्ञानिक मान्‍यता न मिलने के कारण कुंठित व हतोत्‍साहित हो रही हैं।

उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले के भैलोनी लोध गांव में मंगल सिंह नाम का एक ऐसा ग्रामीण अन्‍वेषक है जिसने ‘मंगल टर्बाइन' नाम से एक ऐसा आविष्‍कार किया है जो सिंचाई में डीजल व बिजली की कम खपत का बड़ा व देशज उपाय है। मंगल सिंह ने अपने इस अनूठे उपकरण का पेटेंट भी करा लिया है। यह चक्र उपकरण जल-धारा के प्रवाह से गतिशील होता है और फिर इससे आटा चक्‍की, गन्‍ना पिराई व चारा कटाई मशीन आसानी से चला सकते हैं। इस चक्र की धुरी को जेनरेटर से जोड़ने पर बिजली का उत्‍पादन भी शुरू हो जाता है। अब इस तकनीक का विस्‍तार बुंदेलखण्‍ड क्षेत्र में तो हो ही रहा है, उत्तराखण्‍ड में भी इसका इस्‍तेमाल शुरू हुआ है। यहां की पहाड़ी महिलाओं को पानी भरने की समस्‍या से छूट दिलाने के लिए नलजल योजना के रूप में इस तकनीक का प्रयोग सुदूर गांव में भी शुरू हो गया है।

उत्तर-प्रदेश के गोण्‍डा के सेंट जेवियर्स स्‍कूल में पढ़ने वाले छात्र ऋृशीन्‍द्र विक्रम सिंह, अजान भारद्वाज, निखिल भट्‌ट और हिदायतुल्‍ला सिद्धीकी ने मिलकर दीमक से बचाव का स्‍थायी समाधान खोज निकालने का दावा किया है। इन बाल वैज्ञानिकों ने इस कीटनाशक का बाल विज्ञान कांग्रेस में प्रदर्शन भी किया।

इन छात्रों ने विज्ञान कांग्रेस के बैनर तले गोण्‍डा जिले में किसानों पर किए एक अध्‍ययन में पाया कि भारत-नेपाल तराई क्षेत्र में दीमकों के प्रकोप से हर साल पैदावार का बड़ा हिस्‍सा बर्बाद हो जाता है। दीमकों पर नियंत्रण के लिए प्रयोग में लाया जाने वाला रसायन क्‍लोरो पाईरीफास दीमकों पर प्रभावी नियंत्रण में नाकाम साबित हो रहा है। साथ ही इसका इस्‍तेमाल मिट्‌टी के परितंत्र को भी खत्‍म कर देता है जिससे जमीन की उत्‍पादकता पर प्रतिकूल असर पड़ता है। इसके इस्‍तेमाल से किसानों के मित्र कीट (केंचुआ आदि)भी नष्‍ट हो जाते हैं।

इन बाल वैज्ञानिकों ने कीटनाशी कवक बवेरिया वैसियाना के प्रयोग से दीमकों की समस्‍या से स्‍थायी समाधान की खोज की है। रसायन रहित कवक होने के कारण बवेरिया वैसियाना सभी तरह के दुष्‍प्रभावों से मुक्‍त है। इसका एक बार प्रयोग खेत में छह इंच नीचे बैठी अण्‍डे देने वाली रानी दीमक को कुनबा-समेत खत्‍म कर देता है। नतीजतन इनके भविष्‍य में फिर से पनपने की संभावना समाप्‍त हो जाती है। यह कवक दूसरे रसायनों से ज्‍यादा असरदार और सस्‍ता होने के कारण बेहद फायदेमंद है। इसकी उपयोगिता साबित हो जाने के बावजूद इस बाल अनुसंधान को प्रयोग को व्‍यावहारिक मान्‍यता कब मिलती है यह कहना मुश्‍किल है।

हालांकि कुछ सवेदशील वैज्ञानिक व इंजीनियर ग्रामीणों की मद्‌द के लिए आगे भी आ रहे है। बिहार के हजारीबाग जिले के 30 ग्रामों का विस्‍थापन कर बहुराष्‍ट्रीय कंपनियां अपना उद्योग लगाने की जोड़तोड़ में हैं। ग्रामीण इन उद्योगों का विरोध कर रहे हैं। इनकी मदद के लिए कुछ इंजीनियर व तकनिशियन भी तैयार हो गए हैं। इन कारीगरों ने इन्‍हें कोयले से बिजली बनाने की छोटी मशीनें मुहैया कराई और इनके समूह बनाकर संस्‍थाएं पंजीकृत कर दीं। नतीजतन केन्‍द्र सरकार से आर्थिक मदद भी मिलने लगी है। इस बिजली का उपयोग खेती में हो रहा है।

इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में गणित के प्राध्‍यापक रहे बनवारीलाल शर्मा भी उत्तराखण्‍ड में किसानों की व्‍यावहारिक मद्‌द के लिए आगे आए हैं। उन्‍होंने नदियों के पानी से छोटे पैमाने पर बिजली उत्‍पादन का सिलसिला शुरू किया है। लोग इससे स्‍थानीय स्‍तर पर लाभान्‍वित हो रहे हैं। इन तकनीकियों की खासियत यह है कि इनसे न तो लोगों को उजड़ना पड़ रहा है और न ही पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है।

समूचे मध्‍य-प्रदेश में एक ओर जहां बिजली को लेकर हाहाकार मचा है, वहीं गुना जिले में बरौदिया नाम का एक ऐसा अनूठा गांव भी है। जिसने ऊर्जा के क्षेत्र में इतनी आत्‍मनिर्भरता हासिल कर ली है कि अब इस गांव में कभी अंधेरा नहीं होता। यह करिश्‍मा बायोगैस तकनीक अपनाकर प्राप्‍त किया गया है। यहां के लोग बायो गैस से अपने घरों को तो रोशन कर ही रहे हैं, साथ ही महिलाएं चूल्‍हे चौके का सारा काम भी इसी गैस से कर रही हैं। तकरीबन सात सौ की आबादी वाले इस गांव के ग्रामीण गोबर गैस को रोशनी और रसोई में ईंधन के रूप में उपयोग करते हैं, साथ ही जैविक खाद बनाकर उपजाऊ फसल भी अन्‍य ग्रामों की तुलना में ज्‍यादा प्राप्‍त करते हैं। तकनीकी दृष्‍टिकोण से देखा जाए तो इस गांव में गोबर गैस संयंत्र स्‍थापित होने के कारण वन संपदा पर भी दबाव कम हुआ है।

ग्राम पंचायत सिंघाड़ी के इस बरौदिया गांव में करीब पचास गोबर गैस संयंत्र स्‍थापित कर ग्रामीण ऊर्जा के क्षेत्र में स्‍बावलंबी हुए हैं। इस सफल प्रयोग ने मवेशियों की महत्ता भी उजागर की है। गांव के सरपंच कल्‍याण सिंह का कहना है कि जब वे अन्‍य गांवों में जाते हैं तो उन्‍हें उस गांव को बिजली समस्‍या से जूझते देखकर अपने गांव पर गर्व होता है। इन संयंत्रों की स्‍थापना के लिए ग्रामीणों ने सरकार एवं कृषि विभाग से कोई मद्‌द भी नहीं ली की।

जरूरत है नवाचार के इन प्रयोगों को प्रोत्‍साहित करने की। इन्‍हीं देशज विज्ञानसम्‍मत टेक्‍नोलॉजी की मद्‌द से हम खाद्यान्‍न के क्षेत्र में आत्‍मनिर्भर तो हो ही सकते हैं, किसान और ग्रामीण को स्‍वावलंबी बनाने की दिशा में भी कदम उठा सकते हैं। लेकिन देश के होनहार वैज्ञानिकों पर शैक्षिक अकुशलता का ठप्‍पा चस्‍पाकर नौकरशाही इनके प्रयोगों को मान्‍यता मिलने की राह में प्रमुख बाधा है। इसके लिए शिक्षा प्रणाली में भी समुचित बदलाव की जरूरत है। क्‍योंकि हमारे यहां पढ़ाई की प्रकृति ऐसी है कि उसमें खोजने-परखने, सवाल-जवाब करने और व्‍यवहार के स्‍तर पर मैदानी प्रयोग व विश्‍लेषण की छूट की बजाय तथ्‍यों आंकड़ों और सूचनाओं की घुट्‌टी पिलाई जा रही है जो वैज्ञानिक चेतना व दृष्‍टि विकसित करने में सबसे बड़ा रोड़ा है। ऐसे में जब विद्यार्थी विज्ञान की उच्‍च शिक्षा हासिल करने लायक होता है तब तक रटने-रटाने का सिलसिला और अंग्रेजी में दक्षता ग्रहण कर लेने का दबाव, उसकी मौलिक कल्‍पना शक्‍ति का हरण कर लेते हैं। ऐसे में सवाल उठता है विज्ञान शिक्षण में ऐस कौन से परिवर्तन लाए जाएं जिससे विद्यार्थी कीसोचने-विचारने की मेधा तो प्रबल हो ही, वह रटने के कुचक्र से भी मुक्‍त हो ? साथ ही विज्ञान के प्रायोगिक स्‍तर पर खरे उतरने वाले व्‍यक्‍ति को मानद शैक्षिक उपाधि से नवाजने व सीधे वैज्ञानिक संस्‍थानों से जोड़ने के कानूनी प्रावधान हों।

हालांकि हम भारत की आधुनिक शिक्षा पद्धति की जडें लार्ड मैकाले द्वारा प्रचलन में लाई गई अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली में देखते हैं। जबकि मैकाले ने कुटिल चतुराई बरतते हुए 1835 में ही तत्‍कालीन गवर्नर जनरल विलियम बेंटिक को अंग्रेजी व विज्ञान की पढ़ाई को बढ़ावा देने के निर्देश के साथ यह भी सख्‍त हिदायत दी थी कि वे भारत की संस्‍कृत समेत अन्‍य स्‍थानीय भाषाओं तथा अरबी भाषा से अध्‍ययन-अध्‍यापन पर अंकुश लगाएं। इसकी पृष्‍ठभूमि में मैकाले का उद्‌देश्‍य था कि वह भारत की भावी पीढ़ियों में यह भाव जगा दें कि ज्ञानार्जन की पश्‍चिमी शैली उनकी प्राचीन शिक्षा पद्धतियों से उत्तम है। यहीं अंग्रेजी हुक्‍मरानों ने बड़ी चतुराई से सम्‍पूर्ण प्राचीन भारतीय साहित्‍य को धर्म और अध्‍यात्‍म का दर्जा देकर उसे ज्ञानार्जन के मार्ग से ही अलग कर दिया। जबकि हमारे उपनिषद्‌ प्रकृति और ब्रह्माण्‍ड के रहस्‍य, वेद विश्‍व ज्ञान के कोष, रामायण और महाभारत विशेष कालखण्‍ड़ों का आख्‍यान और पुराण राजाओं का इतिहास हैं। अब बाबा रामदेव ने आयुर्वेद और पातंजलि योग शास्‍त्र को आधुनिक एलोपैथी चिकित्‍सा पद्धति से जोड़कर यह साबित कर दिया है कि इन ग्रंथों में दर्ज मंत्र केवल आध्‍यात्‍मिक साधना के मंत्र नहीं हैं। कम पढ़े लिखे एवं अंग्रेजी नहीं जानने वाले बाबा रामदेव आज दुनिया के चिकित्‍साविज्ञानियों के लिए चुनौती बने हुए हैं ?

देश की आजादी के बाद शिक्षा में आमूल-चूल बदलाव के लिए कई आयोग बैठे, शिक्षा विशेषज्ञों ने नई सलाहें दीं लेकिन मैकाले द्वारा अवतरित जंग लगी शिक्षा प्रणाली को बदलने में हम नाकाम ही रहे हैं। जबकि आजादी के बासठ सालों में तय हो चुका है कि यह शिक्षा जीवन की हकीकतों से रूबरू नहीं कराती। तमाम उच्‍च डिग्रियां हासिल कर लेने के बावजूद विद्यार्थी स्‍वयं के बुद्धि-बल पर कुछ अनूठा नहीं दिखा पा रहे हैं। इस कागजी शिक्षा के दुष्‍परिणाम स्‍वरूप ही हम नए वैज्ञानिक, समाज शास्‍त्री, मनोवैज्ञानिक इतिहासज्ञ लेखक व पत्रकार देने में असफल ही रहे हैं।

शैक्षिक अवसर की समानता से दूर ऐसे माहौल में उन बालकों को सबसे ज्‍यादा परेशानी से जूझना होता है, जो शिक्षित और मजबूत आर्थिक हैसियत वाले परिवारों से नहीं आते। समान शिक्षा का दावा करने वाले एक लोकतांत्रिक देश में यह एक गंभीर समस्‍या है, जिसके समाधान तलाशने की तत्‍काल जरूरत है। अन्‍यथा हमारे देश में नौ सौ से अधिक वैज्ञानिक संस्‍थानों और देश के सभी विश्‍वविद्यालयों में विज्ञान व तकनीक के अनुसंधान का काम होता है, इसके बावजूद कोई भी संस्‍थान स्‍थानीय संसाधनों से ऊर्जा के सरल उपकरण बनाने का दावा करता दिखाई नहीं देता है। हां, तकनीक हस्‍तांतरण के लिए कुछ देशों और बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों से करीब बीस हजार ऐसे समझौते जरूर किए हैं जो अनुसंधान के मौलिक व बहूउपयोगी प्रयासों को ठेंगा दिखाने वाले हैं। इसलिए अब शिक्षा को संस्‍थागत ढांचे और किताबी ज्ञान से भी उबारने की जरूरत है, जिससे नवोन्‍मेषी प्रतिभाओं को प्रोत्‍साहन व सम्‍मान मिल सके।

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प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी म.प्र.

लेखक प्रिंट और इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार है।

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हिंदी में प्रेमगीत ज्यादा नहीं हैं, और जो माल उपलब्ध हैं, उसमें भी दिलचस्प और हृदयग्राही गीत तो बहुत ही कम हैं. प्रस्तुत है हिंदी के कुछ प्रसिद्ध कवियों के प्रेमगीत –

दामिनी बन प्यार की मुझको निहारा है

जानता हूँ, यह बुलाने का इशारा है.

- देवराज दिनेश

 

चाँद हँसता वहाँ, ज्वार उठता यहाँ

शून्य कितना वहाँ, तुम नहीं हो जहाँ

तुम जहाँ हो वहीं हँस रही नीलिमा

तुम जहाँ हो वहीं है शरद् पूर्णिमा

- पोद्दार रामावतार ‘अरूण’

 

मेरी भूली पहिचान न मुझसे मांगो

तुम हँस कर मेरा प्यार न मुझसे मांगो

- भगवतीचरण वर्मा

 

अपनी दुनिया में मैं मस्त हूँ, जवान हूँ

फागुन की गेहूँ हूँ, सावन का धान हूँ

बिरहा की जोगिनी बनाओ ना पिया

बार बार बाँसुरी बजाओ ना पिया

- रामदरश मिश्र

 

तुम जानती सब बात हो, दिन हो कि आधी रात हो

मैं जागता रहता कि कब, मंजीर की आहट मिले

मेरे कमल-मन में उदय, किस काल पुण्य प्रभात हो

किस लग्न में हो जाए कब, जाने कृपा भगवान की

- दिनकर

 

लौटे क्या मोहन मधुवनियाँ, बाजे राधा की पायलिया

मह मह महक रहीं मंजरियाँ, कुहु कुहु कुहुक रही कोयलिया;

दूर कहीं बाजे खंजरिया, छूम छनन गूंजे पैंजनियाँ

कहीं अहीरों की छोकरियाँ, नाचें भर-भर बाँह कन्हैया;

रो रो रतनारी आँखड़ियाँ, बनी तुम्हारी कमल डगरियाँ

कसक कसक उठती रे छातियाँ, किसे कहूँ मैं मन की बतियाँ;

चीर तुम्हारी नव चँदनियाँ, छिड़कूँ हिम की कुंकुम बुँदियाँ

आज मिलन की अमरित घड़ियाँ, दिशा दिशा छिटकी चाँदनियाँ

- वीरेन्द्र कुमार जैन

 

मेरी दो पर वे अनगिन हैं, किससे लोचन अभिसार करूं?

मेरे आँगन में भीड़ लगी, मैं किसको कितना प्यार करूँ?

- अज्ञात

 

अभी तो है बहुत री सांझ की दूरी

तुम्हें कैसे कहूँ, है बहुत मजबूरी

- अज्ञात

 

तू तो है ‘मनु’ सा बहुत दूर, मैं ‘कामायनी’ अकेली

कौन ‘इड़ा’ कोई बतला दे, जो तेरे मन भाई,

मेरी तेरी प्रीत चिरन्तन, सदा निभेगी यारी

मैं छन्दों के रथ पर तेरे द्वार आज फिर आई

- अज्ञात

 

दिल्लगी में आग दिल में वे लगा कर चल दिए

पर उन्हें भी आग दिल की अब बुझाना है कठिन

आग लगती जिन्दगी को झेलते मजबूर हो

है सरल नजरें मिलाना, दिल मिलाना है कठिन

- हरिकृष्ण प्रेमी

 

एक दिन बस यूँ ही उस नरम होंठ ने

भूल से छू लिया था सुधा का चषक,

होंठ घायल हुए और मैं जल उठा

शेष है आज भी उस जलन की कसक,

तारिका एक टूटी गगन डाल से

चाँद ने आँख भर यों कहा, “बावली

तू भटकती रहेगी बता किस गली?”

- रामानन्द दोषी

 

भर भर हारी किंतु रह गई रीती ही गगरी

कितनी बार तुम्हें देखा, पर आँखें नहीं भरीं

- शिवमंगलसिंह सुमन

 

ये बन कर मिट जाने के दिन

ये मिट कर मुस्काने के दिन

ये गीत नए गाने के दिन

ये तुमको अपनाने के दिन

ये हरदम मुस्काने के दिन

ये कुछ कह शरमाने के दिन

ये घायल कर जाने के दिन

ये खिल कर झर जाने के दिन

- सुरेन्द्र तिवारी

 

लौट आओ, माँग के सिंदूर की सौगंध तुमको

नयन का सावन निमंत्रण दे रहा है,

लौट आओ, आज पहिले प्यार की सौगन्ध तुमको

प्रीत का बचपन निमंत्रण दे रहा है,

लौट आओ मानिनी, है मान की सौगन्ध तुमको

बात का निर्धन निमंत्रण दे रहा है,

लौट आओ हारती मनुहार की सौगंध तुमको

भीगता आँगन निमंत्रण दे रहा है

- सोम ठाकुर

 

यह तो सच है इस वसन्त में तुमको नहीं जरूरत मेरी

लेकिन पतझर के आने पर, मैं न रहूंगा तो क्या होगा?

यह तो सच है तुमसे अपना दर्द कहा था, सुना न तुमने

लेकिन दर्द गर किसी और से कह दूंगा तो फिर क्या होगा?

- अज्ञात

 

मैं स्वयं विवश, दो पाँव कहाँ किस तक दौड़ें

सबमें तुम सा आकार दिखाई देता है,

मैं किस किस द्वारे मस्तक अपना धरूँ मुझे

हर द्वार तुम्हारा द्वार दिखाई देता है

- जलज

 

साँस की तो बहुत तेज रफ़्तार है

और छोटी बहुत है मिलन की घड़ी,

आँजते आँजते ही नयन बावरे

बुझ न जाए कहीं उम्र की फुलझड़ी

- नीरज

 

तुम्हारा ही क्या, मैं नहीं हूँ किसी का

रहेगा मुझे अंत तक दुःख इसी का;

चढ़ाया गया हूँ, उतारा नहीं हूँ

तुम्हारी कसम मैं तुम्हारा नहीं हूँ

- रंग

 

घनों में मधुर स्वर्ण-रेखा मिली

नयन ने नयन रूप देखा, मिली

पुतलियों में डुबा कर नजर की कलम

नेह के पृष्ठ को चित्रलेखा मिली,

भूलती सी जवानी नई हो उठी

भूलती सी कहानी नई हो उठी

जिस दिवस प्राण में प्रेम बंसी बजी

बालपन की रवानी नई हो उठी

- माखनलाल चतुर्वेदी

 

परदेश तुम्हारा पथिक दूर

लौटोगे कब यह कहे कौन,

भर बाँहों में फिर करो प्यार

निज प्रेम पुष्प को हे उदार,

पीछे फिर देखो एक बार

- रामविलास शर्मा

 

दिल चुरा कर न हमको बुलाया करो

गुनगुना कर न गम को सुलाया करो,

दो दिलों के मिलन का यहाँ है चलन

खुद न आया करो तो बुलाया करो,

रंग भी गुल शमा के बदलने लगे

तुम हमीं को न कस्में खिलाया करो,

सर झुकाया गगन ने धरा मिल गई

तुम न पलकें सुबह तक झुकाया करो,

सिंधु के पार को चाँद जाँचा करे

तुम न पायल अकेली बजाया करो,

मन्दिरों में तरसते उमर बिक गई

सर झुकाते झुकाते कमर झुक गई,

घूम तारे रहे रात की नाव में

आज है रतजगा प्यार के गाँव में

दो दिलों का मिलन है यहाँ का चलन

खुद न आया करो तो बुलाया करो,

नाचता प्यार है हुस्न की छाँव में

हाथ देकर न उँगली छुड़ाया करो

- गोपालसिंह नेपाली

 

पहुँच क्या तुम तक सकेंगे कांपते ये गीत मेरे

हाय, वो अभिमान के अब दिन गए हैं बीत मेरे

- अज्ञेय

 

जिन कलियों ने प्रेम छिपाया, वे झूठी कहलाईँ

जिन नदियों ने नेह छिपाया, वे सूखी अकुलाईँ

जिन आँखों ने राग छिपाया, वे रोईं पछताईँ

तब क्यों मैं ही प्रेम छिपाऊँ?

तब क्यों मैं ही भद्र कहलाऊँ?

- केदारनाथ अग्रवाल

 

हार बन कर गले के पास आना चाहता हूँ

गीत बन कर ही अधर के पास आना चाहता हूँ

- अज्ञात

 

यह चंदन सा चाँद महकता, यह चाँदी सी रात

क्या नयनों से रूप कह रहा – सुनो हमारी बात

- जगदीश गुप्त

 

अगर मैंने किसी के ओठ पाठल कभी चूमे

अगर मैंने किसी के नैन के बादल कभी चूमे

कली सा तन, किरन सा मन, शिथिल सतरंगिया आँचल

उसी में खिल पड़े यदि भूल से कुछ ओठ के पाटल;

न हो यह वासना तो जिंदगी की माप कैसे हो?

नसों का रेशमी तूफान मुझको पाप कैसे हो?

किसी की साँस में बुन दूँ अगर अंगूर की परतें

प्रणय में निभ नहीं पातीं कभी इस तौर की शर्तें,

यहाँ तो हर कदम पर स्वर्ग की पगडंडियाँ घूमीं

अगर मैंने किसी की मदभरी अंगड़ाइयाँ चूमीं,

महज इस से किसी का प्यार मुझ पर पाप कैसे हो?

मझ इस से किसी का स्वर्ग मुझ पर श्राप कैसे हो?

- धर्मवीर भारती

 

छोड़ो न यों बीच में हाथ मेरा

आया नहीं है अभी तक सवेरा

प्यासे नयन ज्यों नयन में समा जाएँ

सारे निराधार आधार पा जाएँ

जाओ तभी जब हृदय-कम्प खो जाएँ

मेरे अधर पर तुम्हारा खिले हाथ

मेरा उदय खींच के ज्योति घेरा

छोड़ो न यों बीच में हाथ मेरा

आया नहीं है अभी तक सवेरा

- श्रीलाल शुक्ल

 

तुम मुग्धा थीं अति भावप्रवण

उकसे थे अंबियों से उरोज,

चंचल, प्रगल्भ, हँसमुख, उदार,

मैं सलज तुम्हें था रहा खोज

- सुमित्रानंदन पंत

 

बह्मन का लड़का मैं

उसको प्यार करता हूँ

जात की कहारिन

उस पर मैं मरता हूँ

कोयल सी काली

चाल नहीं मतवाली,

ले जाती है मटका बड़का

मैं देख देख धीरज धरता

- निराला

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(साभार - रवीन्द्रनाथ त्यागी के व्यंग्य संग्रह देश-विदेश की कथा के एक लेख के संकलित अंश)

pyar ka rang

(प्रस्तुत कविता मुमताज एवं टी. एच. खान (पति-पत्नी) द्वारा संयुक्त रूप से लिखी गई है. )

 

आखिर में सिर्फ़ प्यार ऐसा रंग दिखाता है,

परिवार को अपने, सुखी परिवार बनाता है।

 

दूर हो जाती है हर मुसीबत हँसते - हँसते

छँटता है अँधेरा, उजाला जगमगाता है।

 

कभी तोड़ सकता नहीं कोई इस घरौंदे को,

भाग्य अपना वो, इस तरह मिलके बनाता है।

 

साथ हो ही जाता है जनम -जनम का इस तरह,

वियोग एक पल का भी, इस मन को तड़पाता है।

 

ज़िन्दगी में बिना प्यार के आती नहीं खुशबू

लहलहाता हुआ मन का गुलशन मुरझाता है।

 

मतभेद हों दूर सबके ये हमारी दुआ है,

त्याग दें हम वो ख़्याल, जो दूरियाँ बढ़ाता है।

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प्रस्तुति – रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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खासतौर से स्‍विट्‌जरलैंड के बैंकों में जमा भारत के कालेधन की वापसी अब और मुश्‍किल हो गई है। क्‍योंकि स्‍विस सरकार से दोहरे कराधान समाप्‍त करने के लिए संशोधित प्रोटोकॉल पर दस्तखत करते वक्‍त भारत सरकार वह वह सख्‍ती नहीं दिखा पाई जो कालाधन वापिसी के लिए जरूरी थी। अंतर्राष्ट्रीय स्‍तर पर होने वाले ऐसे किसी भी दोहरे समझौते में राष्‍ट्रीय हित सर्वोपरि होने चाहिए। ऐसे हालात में भारत सरकार शर्त रख सकती थी कि भारतीयों के जमा कालेधन की सूची भारत को सौंपी जाए। लेकिन वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी द्वारा लोकसभा में दिये बयान से साफ हो गया है कि स्‍विस बैंकों में इस समझौते से पूर्व जमा कराये धन पर इस संधि की कोई शर्त लागू नहीं होगी।

जबकि स्‍विस बैंकों से अमेरिका और जर्मनी जैसे देशों ने वहां की सरकार को हड़का कर अपने देशों का बड़ी मात्रा में जमा कालाधन वसूल लिया है। इससे जाहिर होता है कि देश की केन्‍द्र सरकार स्‍विट्‌जरलैण्‍ड सरकार पर वाजिब दबाव बनाना नहीं चाहती क्‍योंकि उसके लिए धन वापिसी की कार्रवाई हवन करते हाथ जलाने वाली कहावत की तरह है।

कुछ समय पहले संयोगवश विदेशी बैंकों में जमा काले धन की वापसी की उम्‍मीदें जगी थीं। जर्मनी के वित्तमंत्री ने तो फरवरी 2008 में भारत सरकार को आगाह कर दिया था कि जर्मनी के बैंकों में भारतीय-खाता धारकों की सूची देने के लिए वह तैयार है। लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चुप्‍पी साध गए। अलबत्ता वे जानते थे कि कांग्रेस के लिए यह मामला मधुमक्‍खी के छत्तों में हाथ डालने वाला साबित होगा। क्‍योंकि विदेशी बैंकों में काला धन जमा करने वाली जो जानकारियां आ रही हैं, वे यह साबित करने के लिए पर्याप्‍त हैं कि यह सिलसिला आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरु के कार्यकाल से ही शुरु हो गया था और इसके बाद केन्‍द्र में 50-55 साल कांग्रेस की ही सरकार रही। लिहाजा तय है विदेशों में जमा काले धन की सूची सार्वजनिक होती है तो उसमें सबसे ज्‍यादा नाम कांग्रेस सरकार में रहे मंत्रियों, उनसे जुड़े आला-अधिकारियों, उद्योगपतियों और हथियार व दवाओं के दलालों के होंगे।

इसके पूर्व भारत-स्‍विट्‌जरलैंड मैत्री संधि के अवसर पर भारत में स्‍विट्‌जरलैंड के राजदूत ने पत्रकारों के समक्ष मंजूर किया था कि बड़ी मात्रा में भारत का कालाधन उनके यहां के बैंकों में जमा होता है। लेकिन केन्‍द्र सरकार इतनी पुख्‍ता जानकारी मिलने के बावजूद नीम-बेहोशी में बनी रही। स्‍विस और जर्मनी ही नहीं दुनिया में ऐसे 37 ठिकाने हैं जहां काला धन जमा करने की आसान सुविधा हासिल है।

दुनिया में काले धन की वापसी का जो सिलसिला शुरु हुआ है, उसकी पृष्‍ठभूमि में भी दुनिया में आई आर्थिक मंदी है। मंदी के काले पक्ष में छिपे उज्‍जवल पक्ष ने ही पश्‍चिमी देशों को समझाइश दी कि काला धन ही उस आधुनिक पूंजीवाद की देन है जो विश्‍वव्‍यापी वित्तीय संकट का कारण बनी। 9/11 के आतंकवादी हमले के बाद अमेरिका की आंखें खुलीं कि दुनिया के नेता, नौकरशाह, कारोबारी और दलालों का गठजोड़ ही नहीं आतंकवाद का पर्याय बना ओसामा बिन लादेन भी अपना धन खातों को गोपनीय रखने वाले बैंकों में जमा कर दुनिया के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।

इस सुप्‍त पड़े मंत्र के जागने के बाद ही आधुनिक पूंजीवाद के स्‍वर्ग माने जाने वाले देश स्‍विट्‌जरलैंड के बुरे दिन शुरु हो गए है। नतीजतन पहले जर्मनी ने ‘वित्तीय गोपनीयता कानून‘ शिथिल कर काला धन जमा करने वाले खाताधारियों के नाम उजागर करने के लिए दबाव बनाया और फिर इसी मकसद पूर्ति के लिए इटली, फ्रांस, अमेरिका एवं ब्रिटेन आगे आ गए। अमेरिका की बराक ओबामा सरकार ने स्‍विट्‌जरलैंड पर इतना दबाव बनाया कि वहां के यूबीए बैंक ने काला धन जमा करने वाले 17 हजार अमेरिकियों की सूची तो दी ही 78 करोड़ डॉलर काले धन की वापिसी भी कर दी। अब तो मुद्रा के नकदीकरण से जूझ रही पूरी दुनिया में बैंकों की गोपनीयता समाप्‍त करने का वातावरण निर्मित हो चुका है। ऐसा लगने भी लगा है कि कालातंर में इस अंतर्राष्‍ट्रीय कानून को खत्‍म कर दिया जाएगा। लेकिन यह दुर्भाग्‍य है कि भारत ने अभी तक वित्तीय प्रणाली में गोपनीयता को नेस्‍तनाबूद करने वाली विश्‍व स्‍तरीय मुहिम में भागीदारी के सुनहरे अवसर को गंवा दिया ? इससे जाहिर होता है कि केन्‍द्र की मनमोहन सिंह सरकार की नीयत में खोट और मन में कोई न कोई खुटका जरुर है।

एक अनुमान के मुताबिक भारत का जो काला धन विदेशी बैंकों में जमा है, उसे जाने-माने अर्थशास्‍त्री ई वैद्यनाथन 75 लाख करोड़ रुपये बताते हैं। वहीं अर्थव्‍यवस्‍था के विशेषज्ञ प्रो. अरुण कुमार का कहना है कि काले धन की अर्थव्‍यवस्‍था भारत के सकल घरेलू उत्‍पाद की 50 प्रतिशत है। मसलन इस पूंजी का औसत अनुपात 25-26 लाख करोड़ वार्षिक है।

ग्‍लोबल फाइनेशिंयल इंटीग्रिटी ;जीएफआई संस्‍था ने विदेशी बैंकों में जमा काले धन का जो अनुमानित ब्‍यौरा पेश किया है, उसके अनुसार 2002 से 2006 की अवधि में भारत से प्रतिवर्ष 27.3 अरब डॉलर मूल्‍य की काली पूंजी विदेश भेजी गई। इस तरह से पांच साल के भीतर 137.5 अरब डॉलर पूंजी काले धन के रुप में विदेशी बैंकों में जमा की गई। यदि आजादी के 62 साल में काले धन का विदेश जाने का यही औसत रहा है तो यह पूंजी 25 से 70 लाख करोड़ रुपये बैठती है। वैसे भी खातों को गोपनीय रखने वाले विदेशी बैंकों का नियम है कि उनमें खाता खोलने के लिए न्‍यूनतम धन राशि 50 करोड़ डॉलर होना जरुरी है।

यदि यह राशि येने-केन-प्रकारेण वापिस आ जाती तो भारत का महाशक्‍ति बनने का रास्‍ता प्रशस्‍त हो जाता। इस काले धन के कुछ प्रतिशत से ही भारत पर जो 220 अरब रुपये का विदेशी कर्ज है वह चूकता हो जाता। डॉलर की कीमत 50 रुपये से घट कर 10-15 रुपये के बीच रह जाती। देश का आधारभूत ढांचा तो पूरा होता ही, ऊर्जा के क्षेत्र में भी भारत आत्‍मनिर्भर हो जाता। लेकिन अब इस धन के वापिसी के सभी उम्‍मीदों पर पानी फिर गया है। स्‍विस बैंक लेन-देन संबंधी न तो किसी नाम को उजागर करेंगे और न ही बैंकों में कितनी धनराशि जमा है इसका खुलासा करेंगे। जबकि भारत सरकार इस द्विपक्षीय मैत्री समझौते का दोहन करते हुए धनराशि वापिसी की शर्त रख सकती थी। आनाकानी करने पर सरकार अमेरिका और जर्मनी का उदाहरण ही देकर स्‍विस सरकार को विवश कर सकती थीं। अब तो लग रहा है कि सरकार की इच्‍छा में ही खोट था।

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प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी म.प्र.

लेखक प्रिंट और इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।

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ह शीर्षक नहीं कथन है जो हाल ही में सेवानिवृत्त हुए केंद्रीय सतर्कता आयुक्‍त (सीवीसी) प्रत्‍यूष सिन्‍हा ने कहा है। उनका दावा है कि देश के तीस फीसदी भारतीय पूरी तरह भ्रष्‍ट हो चुके हैं। मसलन प्रत्‍येक तीन में से एक व्‍यक्‍ति पूरी तरह भ्रष्‍ट है। उन्‍होंने यह भी कहा कि बमुश्‍किल बीस प्रतिशत लोग पूरी तरह ईमानदार माने जा सकते हैं। उनका यह कहना अतिरंजित नहीं है। जिस देश में भ्रष्‍टाचार को सामाजिक स्‍वीकृति मिल चुकी हो वहां इसका फैलना स्‍वभाविक जरूरत बन जाती है। वैसे भी भ्रष्‍टाचार पर नजर रखने वाली सर्वोच्‍च संस्‍था ट्रांपैरेंसी इंटरनेशनल भारत को भ्रष्‍टतम देश की सूची में चौरासीवें स्‍थान पर रखा है। संस्‍था ने भारत को 10 में से 3.4 अंक दिये हैं। दुनिया के सबसे कम भ्रष्‍ट देश में न्‍यूजीलैंड का स्‍थान सबसे ऊपर है और इसे 10 में से 9.4 अंक दिये हैं। जबकि सबसे भ्रष्‍ट देश सोमालिया को 1.1 अंक दिये गए है।

जो राष्‍ट्रीय संपत्ति गरीब की भूख, कुपोषण, अशिक्षा दूर करने और स्‍वावलंबन का पर्याय बनना चाहिए थी, वह भ्रष्‍ट तंत्र को विकसित कर राष्‍ट्रीय संपत्‍ति को निजी संपत्‍ति में बदलने का काम कर रही है। देश में आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्‍यूरो और आयकर विभाग के ताजा छापों में बरामद अरबों की संपत्‍ति ने कुछ ऐसी ही सच्‍चाई से साक्षात्‍कार कराया है। अब तक भ्रष्‍टाचार के तंत्र का विस्‍तार राजनीतिकों, नौकरशाहों और ठेकेदारों तक रेखांकित था, लेकिन ताजा खुलासों से साबित हुआ है कि निजी बैंक, बीमा और चार्टर्ड कंपनियां भी नाजायज संपत्‍ति को जायज संपत्‍ति में तब्‍दील करने के कारोबार का हिस्‍सा बन गई हैं। मुनाफे के इस प्रलोभन-तंत्र को तोड़ने के लिए अब जरुरी हो गया है कि भ्रष्‍टाचार निवारक कानून में संशोधन कर भ्रष्‍ट संपत्‍ति को जब्‍त करने का प्रावधान तो हो ही, देश के नौकरशाह और कर्मचारियों को हर साल संपत्‍ति का ब्‍यौरा देना ऐसी बाध्‍यकारी शर्त हो, जो सूचना-अधिकार के दायरे में आती हो।

लोकतांत्रिक मूल्‍यों में भ्रष्‍टाचार के तंत्र का यह सर्वव्‍यापी विस्‍तार व दखल राष्‍ट्रघाती है। यह सामाजिक सद्‌भाव को तो खंडित करता ही है, लोकतांत्रिक और आर्थिक प्रक्रिया में बहुसंख्‍यक लोगों की भागीदारी भी वंचित रह जाती है। संसाधनों के आबंटन में अनियमितता बरती जाती है, नतीजतन गरीब, वंचित, व सीमांत तबके के हित प्रभावित होते हैं। सामाजिक, आर्थिक व शैक्षिक विषमता का आधार भी भ्रष्‍टाचार बन रहा है। भ्रष्‍टाचार राष्‍ट्रीय सुरक्षा की दृष्‍टि से भी एक बड़ा खतरा है। 1993 के मुबंई विस्‍फोट में जो हथियार प्रयोग में लाए गए थे, वे उस तस्‍करी का परिणाम थे जो भ्रष्‍टतंत्र के बूते फलीभूत हुई थी। ऐसी भ्रष्‍ट व्‍यवस्‍था जिस देश में सम्‍मान व प्रतिष्‍ठा की सूचक बन गई हो उस देश की लोकतंत्रीय प्रणाली और संप्रभुता कब तक कायम बनी रह पाएगी, यह सवाल भी एक आम भारतीय को कचोटता रहता है। दरअसल लोकतंत्र की उम्र बढ़ने के साथ-साथ भ्रष्‍ट-तंत्र लगातार मजबूत होता रहा है। यही कारण है कि हमारे देश में जनकल्‍याणकारी योजनाएं आम-जन की हित पोषक साबित होने की बजाय अब तक सरकारी अमले के लिए रिश्‍वत का चमत्‍कारी तिलिस्‍म सिद्ध होती रही हैं।

‘टांसपरेंसी इंटरनेशनल इंडिया सेंटर फार मीडिया स्‍टडीज' ने जो अध्‍ययन किया है, वह बताता है कि एक साल के भीतर हमारे देश में गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाले परिवारों को मूलभूत, अनिवार्य व जनकल्‍याणकारी सेवाओं को हासिल करने के लिए तकरीबन नौ सौ करोड़ रुपए की रिश्‍वत देनी पड़ती है। यह सच्‍चाई सांस्‍कृतिक रुप से सभ्‍य, मानसिक रुप से धार्मिक और भावनात्‍मक रुप से कमोवेश संवेदनशील समाज के लिए सिर पीट लेने वाली है। इस अध्‍ययन ने प्रकारांतर रुप से यह तय कर दिया है कि हमारे यहां सार्वजनिक वितरण प्रणाली, ग्रामीण रोजगार गारंटी, मध्‍यान्‍ह भोजन, खाद्य सुरक्षा, पोलियो उन्‍मूलन के साथ स्‍वास्‍थ्‍य लाभ व भोजन के अधिकार संबंधी योजनाएं किस हद तक जमीनी स्‍तर पर लूट व भ्रष्‍टाचार का हिस्‍सा बनी हुईं हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में किस कदर भ्रष्‍टाचार है कि अरूणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्‍यमंत्री गोगांग पपांग एक हजार करोड़ रूपये के घोटाले में जेल में हैं। जब किसी प्रदेश के सर्वोच्‍च राजनयिक की यह स्‍थिति हो फिर सरकारी मशीनरी के बारे में क्‍या कहा जाए ?

यही कारण है कि प्रशासनिक पारदर्शिता के जितने भी उपाय एक कारगर औजार के रुप में उठाए गए वे सब के सब प्रशासन की देहरी पर जाकर ठिठक जाते हैं। ई-प्रशासन के बहाने कंप्‍यूटर का अंतर्जाल सरकारी दफ्तरों में इसलिए फैलाया गया था कि यह प्रणाली भ्रष्‍टाचार पर अंकुश तो लगाएगी ही ऑन लाइन के जरिये समस्‍याओं का समाधान भी तुरत-फुरत होगा। लेकिन इस नेटवर्किंग में करोड़ों रुपये खर्च कर दिए जाने के बावजूद कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आए। न्‍यायालयों, राजस्‍व न्‍यायालयों और पुलिस का वही परंपरागत ढर्रा जस की तस कायम है। फाइलों के निराकरण अथवा फैसलों में रंचमात्र भी गति नहीं आई। कंप्‍यूटर सरकारी क्षेत्र में टायपराइटर का एक उम्‍दा विकल्‍प भर बनकर रह गया है। में इसलिए फैलाया गया था कि यह प्रणाली भ्रष्‍टाचार पर अंकुश तो लगाएगी ही ऑन लाइन के जरिये समस्‍याओं का समाधान भी तुरत-फुरत होगा। लेकिन इस नेटवर्किंग में करोड़ों रुपये खर्च कर दिए जाने के बावजूद कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आए। न्‍यायालयों, राजस्‍व न्‍यायालयों और पुलिस का वही परंपरागत ढर्रा जस की तस कायम है। फाइलों के निराकरण अथवा फैसलों में रंचमात्र भी गति नहीं आई। कंप्‍यूटर सरकारी क्षेत्र में टायपराइटर का एक उम्‍दा विकल्‍प भर बनकर रह गया है।

सूचना के अधिकार को भ्रष्‍टाचार से मुक्‍ति का पर्याय माना जा रहा था। क्‍योंकि इसके जरिये आम नागरिक हरेक सरकारी विभाग के कामकाज व नोटशीट पर अधिकारी की दर्ज टिप्‍पणी का लेखा-जोखा तलब कर सकता है। लेकिन सरकारी अमले की अनियमितताएं घटने की बजाय और बढ़ गईं। भ्रष्‍टाचार पर किए अध्‍ययन इसका उदाहरण हैं। इससे जाहिर होता है कि सूचना का अधिकार भी भ्रष्‍टाचार से मुक्‍ति की कसौटी पर खरा नहीं उतरा ? ऐसा इसलिए संभव हुआ क्‍योंकि हमारे जो श्रम कानून हैं वे इस हद तक प्रशासनिक तंत्र के रक्षा कवच बने हुए हैं कि वे पारदर्शिता और जवाबदेही की कोई भी शर्त स्‍वीकारने को मजबूर नहीं होते ? यही कारण है कि केरल काडर के आईएएस अधिकारी औ मौजूदा संचार सचिव पीजी थॉमस की नियुक्‍ति केंद्रीय सतर्कता आयुक्‍त जैसे महत्‍वपूर्ण पद पर विधिवत रहने के बावजूद हो जाती है। जबकि लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्‍वराज ने थॉमस की नियुक्‍ति पर आपत्‍ति दर्ज की थी। दअसल 90 वें के दशक में केरल के पामोलीन आयात घोटाले में थॉमस का नाम आया था। वे तब केरल राज्‍य के खाद्य व आपूर्ति सचिव थे। आखिर बेदाग छवि के अधिकारी मौजूद हैं तो विवादास्‍पद अधिकारी का चयन सीवीसी आयुक्‍त जैसे महत्‍वपूर्ण पद पर क्‍यों ? विपक्ष सवाल उठा रहा है कि यह नियुक्‍ति कि इस नियुक्‍ति के जरिए केंद्र सरकार 2 जी स्‍पेक्‍ट्रम घोटाले की लीपापोती करना चाहती है। क्‍योंकि संचार सचिव के रूप में उनके मंत्रालय में घटा यह घोटाला अब सीवीसी आयुक्‍त के रूप में उन्‍हीं के सामने जांच के लिए आएगा। लिहाजा एक ओर तो सीवीसी जैसी संस्‍था राजनैतिक हठधर्मिता का औजार बनेगी, वहीं दूसरी ओर ईमानदार अधिकारियों के मनोबल को ठेस पहुंचेगी।

दरअसल हमने औपनिवेशिक जमाने की नौकरशाही को स्‍वतंत्र भारत में जस की तस मंजूर कर लेने की एक बड़ी भूल की थी। नतीजतन आज भी हमारे लोकसेवक उन्‍हीं दमनकारी परंपराओें से आचरण ग्रहण करने में लगे हैं, जो अंग्रेजी राज में विद्रोहियों के दमन की दृष्‍टि से जरुरी हुआ करते थे। इसी दंभ के चलते सूचना के अधिकार की मांग को नकारने के मामलों में लगातार इजाफा हो रहा हैं।

इस सिलसिले में कानून मंत्री वीरप्‍पा मोइली और सीबीआई नौकरशाहों के लिए ढाल बनी संविधान के अनुच्‍छेद 310 एवं 311 में बदलाव की वकालत कर रहे हैं। क्‍योंकि भ्रष्‍टाचार समाप्‍त करने में यही अनुच्‍छेद रोड़े अटका रहे है। लिहाजा लोकसेवक से जुड़ी सेवा शर्तों को नए सिरे से परिभाषित करने की नितांत जरुरत है। सर्वोच्‍च न्‍यायालय के पूर्व मुख्‍य न्‍यायाधीश के जी बालकृष्‍णन ने भी भ्रष्‍टाचार को विधि के शासन और लोकतंत्र के लिए खतरनाक माना था। संविधान के अनुच्‍छेद 310 और 311 ऐसे सुरक्षा कवच हैं जो देश के लोकसेवकों के कदाचरण से अर्जित संपत्‍ति को सुरक्षित करते हैं। अभी तक भ्रष्‍टाचार निवारक कानून में इस संपत्‍ति को जब्‍त करने का प्रावधान नहीं है। इन अनुच्‍छेदों में निर्धारित प्रावधानों के चलते ही ताकतवर नेता और प्रशासक जांच एजेंसियों को प्रभावित तो करते ही हैं तथ्‍यों व साक्ष्‍यों को भी कमजोर करते हैं।

कुछ ऐसे ही कारणों के चलते हमारी अदालतों में भ्रष्‍टाचार से जुड़े नौ हजार से भी ज्‍यादा मामले लंबित हैं। मायावती और मुलायम सिंह यादव के आय से अधिक संपत्‍ति के मामले में सीबीआई तेजी नहीं दिखा पा रही है। अनुसूचित आयोग के अध्‍यक्ष बूटा सिंह के बेटे पर लगे करोड़ों की रिश्‍वतखोरी के आरोप में सीबीआई को पूछताछ करना मुश्‍किल हो रहा है। शिबू सोरेन फिर से झारखण्‍ड के मुख्‍यमंत्री बन गए हैं। इन समस्‍याओं से निजात के लिए ही वीरप्‍पा मोइली की अध्‍यक्षता वाले प्रशासनिक सुधार आयोग ने एक ‘राष्‍टीय लोकायुक्‍त' के गठन की सिफारिश की है। इसके मातहत प्रधानमंत्री को छोड़कर सभी केंद्रीय मंत्री, मुख्‍यमंत्रियों, राज्‍यमंत्रियों, सांसदों, विधायकों और मंत्री का दर्जा प्राप्‍त पद आ जाते हैं। इसी के अधीन देशभर में सीबीआई की 72 नई अदालतें वजूद में लाने का प्रावधान है। करोड़ों-अरबों रुपए खर्च कर अस्‍तित्‍व में लाया जाने वाला यह प्रस्‍तावित ढांचा भ्रष्‍टाचार संबंधी मामलों में सीबीआई की तेज गति से मदद करेगा और फिर सीबीआई अदालतें मामले का निपटारा करेंगी। ऐसे दावे किए जा रहे है। लेकिन इतना बड़ा ढांचा खड़ा कर दिए जाने के बावजूद क्‍या गारंटी है कि वह अन्‍य आयोगों की तरह सफेद हाथी साबित न हो ? क्‍योंकि अब तक जितने भी नए कानूनी प्रावधानों और आयोगों को वजूद में लाने की कवायद की गई है वे दृढ़ राजनीतिक इच्‍छाशक्‍ति के बगैर नक्‍कारखाने में तूती ही साबित हुए है ?

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