गुरुवार, 30 सितंबर 2010

धूमकेतु की हास्य कविता – मेकअप उतर जाने के बाद

दि ख रही है मंच पर, जो सुन्दरी ऐ दोस्तों कल दिखेगी भूतनी, मैकप उतर जाने के बाद।   कर रही है नाज अपने खेत और खलिहान पर घास फूंस रह जायेगी,...

बुधवार, 29 सितंबर 2010

योगेन्‍द्र कुमार वर्मा के कुछ मुक्तक

मुक्‍तक त्‍यागकर स्‍वार्थ का छल भरा आवरण तू दिखा तो सही प्‍यार का आचरण शूल भी फिर नहीं दे सकेंगे चुभन जब छुअन का बदल जाएगा व्‍याकरण...

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

यशवंत कोठारी का आलेख : बच्‍चों को अपराध की दुनिया में कौन धकेलता है ?

यदि आंकडे प्रमाण है कि तो पिछले दो-तीन दशकों में बाल अपराधियों और युवा वर्ग में हिंसा और पराध करने की प्रवृति में बहुत वृद्धि हुई हैं। 16 ...

संजय दानी की ग़ज़ल

आईनों  से नहीं है  दुशमनी  मेरी , अक्श से अपनी डरती ज़िन्दगी मेरी।   हुस्न ही है मुसीबत का सबब मेरा, क्यूं इबादत करे फ़िर बे-खुदी मेरी । ...

रविवार, 26 सितंबर 2010

दीनदयाल शर्मा की हास्य कविताएँ - चिकोटियाँ

चिकोटियां / दीनदयाल शर्मा   खत्म होने लगा सैंस जिसकी लाठी उसकी भैंस।   गिर गए दाम आँधी के आम।   खत्म होने से ना डर चींटी के आ गए पर।   रहा...

शनिवार, 25 सितंबर 2010

राजीव श्रीवास्तव की हास्य कविता – सब कुर्सी का खेल

सब कुर्सी का खेल बड़ी कुर्सी पे बैठ के मानस मचा रहा धमाल नहीं जनता के ये सब तो बस कुर्सी का कमाल   लोग आगे पीछे घूमे जी-जी का राग अलापे...

राजीव श्रीवास्तव की हास्य कविता - काले घने घुँघराले बाल

  काले घने घुँघराले ये शब्द, दो शब्दकोश से निकाल क्योंकि इनका बालों की लिए होता है इस्तेमाल !   कभी ये तीनों शब्द मुझे भी बहुत प्रिय थे , ल...

राजीव श्रीवास्तव की हास्य व्यंग्य कविता – मन की गंगा

मन की गंगा गंगा मैली हो गयी घटा देश का मान गंगा को साफ करने का चला रहे अभियान   एक और गंगा है जो सब के मन में बहती मुझे भी साफ करो ये दबी ज...

राजीव श्रीवास्तव की हास्य - व्यंग्य कविता - उदघाटन से पहले टूटा पुल

उदघाटन से पहले टूटा पुल लाखों का निकला टेंडर और जेबें हो गयी फुल उद्घाटन से पहले देखो टूट गया था पुल   जनता के मेहनत की कमाई इस पुल मै...

संजय जनागल की लघुकथाएँ

लघुकथाएं टुकड़े संजय जनागल ‘‘साब, ये क्‍या सुनने में आ रहा है कि जाति आधारित जनगणना होने वाली है?'' चंपक मालिक के पाँव दबाते हुए ...

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य – साहब का कुत्ता

व्‍यंग्‍य साहब का कुत्‍ता -यशवन्‍त कोठारी मेरे एक साहब हैं। आपके भी होंगे! नहीं हैं तो बना लीजिए। साहब के बिना आपका जीवन सूना है। हमारे...

आपने अब तक पढ़ी तो होंगी बहुतेरी ग़ज़लें, किन्‍तु सबसे अलहदा है मोहतरिम राजेश विद्रोही की ग़ज़लें॥

-- राजेश विद्रोही की ग़ज़लें बेशक हम भी चाहेंगे कि वाज़िब मांगें पूरी हो। लेकिन ये क्‍या बात हुई कि ‘ चाहे जो मज़बूरी हो ' ॥   असली...

दामोदर लाल जांगिड़ की ग़ज़लें

ग़ज़ल 43 ये कंगन बज परस्‍पर कर रहे हैं बात यूं आली। अधूरी रह गयी लगती कोई चाह ज्‍यूं आली॥   चिहुक हैं हर्ष की या दर्द की सिसकी हैं क्‍या जा...

सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री की कविता

भूख से जब अंतड़ियां पेट में दर्द देती है जब रिरियाती नई पीढ़ी मौत की चादर ओढ़ लेती है तब तनी हुई मुट्‌ठी हाथ में बन्‍दूक थाम लेती है ...

श्याम गुप्त की ग़ज़ल

आशनाई यूं तो खारों से ही अपनी आशनाई है | आंधियां भी तो मगर हमको रास आईं हैं | मुश्किलों का है सफ़र जीना यहाँ पर ऐ दिल, हर एक मुश्किल नई रा...

शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

शशांक मिश्र ‘‘भारती'' की कविताएं

  एक- मेघ राज आये हैं ----------- गगन की गोद से पहाड़ों की ओट से मेघराज आये हैं, गरमी दूर करने धरा में नमी भरने बादल जी भाये हैं, किसान रा...

यशवन्त कोठारी का आलेख - प्रकाश

अमावस्‍या की काली अंधेरी रात को प्रकाशित करता है - प्रकाश। अंधकार से प्रकाश की ओर यह यात्रा हमें बताती है कि प्रकाश कितना महत्‍वपूर्ण है, ...

पुरुषोत्तम विश्‍वकर्मा का व्यंग्य – भ्रष्टाचार का खात्मा

ल गता है जैसे चाचा दिल्‍लगी दास अब इस भ्रष्‍टाचार से काफी आजिज आ चुके थे, नाम सुना नहीं कि भड़क उठते थे। मगर आज जब से भ्रष्‍टाचार मुक्त समाज...

विजय वर्मा के हाइकु – जीवन मृत्यु

   हा इकु  जीवन-मृत्यु  --  प्रत्येक क्षण  जीवन का,है बोध  का अवसर.   अनावृत हो रहस्य नया,पढो  मंत्र सस्वर .   रहो ना सिर्फ  जी लेने में जीव...

रवि भारद्वाज की लघुकथा - पनघट

मे री पृष्‍ठभूमि गांव की है, जहां मैंने अपने बचपन के 16 साल व्‍यतीत किये थे, मुझे अक्‍सर घर में पानी भरने का काम सौंपा जाता था, गाय, बैल,भैं...

योगेन्‍द्र वर्मा ‘व्‍योम' की ग़ज़लें

ग़ज़ल आज फिर अख़बार की ये सुर्खियाँ हैं । गाँव सहमे-से डरी-सी बस्‍तियाँ हैं ॥   कह रहा है ज्‍वार भाटा सिंधु से यह । अब सफ़र में और कितनी ...

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

गोपी गोस्वामी की कविता – मैं यहीँ रहता हूँ

मैं यहीं रहता हूँ इसी पेड़ के नीचे अकेला, उजाड़ या शायद कबाड़ कभी बैठा, कभी लेटा, कभी अधलेटा कभी ओढ़ता हूँ चीथड़े और कभी नग्न रहता हूँ ...

प्रमोद भार्गव का आलेख – भूख और सड़ते अनाज का अर्थशास्‍त्र

हमारे देश में सड़ता अनाज इंसान की प्राकृतिक भूख की जरूरत से नहीं लाभ-हानि के विश्‍वव्‍यापी अर्थशास्‍त्र से जुड़ा है। इसलिए चुनिंदा संपादको...

प्रमोद भार्गव का आलेख - ये भी हैं खोजी वैज्ञानिक

भारत में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, लेकिन शालेय शिक्षा व कुशल-अकुशल की परिभाषाओं से ज्ञान को रेखांकित किए जाने की विवशता के चलते केवल कागजी...

हिंदी के प्रसिद्ध कवियों के प्रेमगीत

हिंदी में प्रेमगीत ज्यादा नहीं हैं, और जो माल उपलब्ध हैं, उसमें भी दिलचस्प और हृदयग्राही गीत तो बहुत ही कम हैं. प्रस्तुत है हिंदी के कुछ प...

बुधवार, 22 सितंबर 2010

मुमताज़ एवं टी एच खान कविताई जुगलबंदी – प्यार का रंग

(प्रस्तुत कविता मुमताज एवं टी. एच. खान (पति-पत्नी) द्वारा संयुक्त रूप से लिखी गई है. )   आखिर में सिर्फ़ प्यार ऐसा रंग दिखाता है , परि...

मंगलवार, 21 सितंबर 2010

प्रमोद भार्गव का आलेख – ज्यादा मुश्‍किल में आ गया है विदेशी बैंकों में जमा कालेधन

खासतौर से स्‍विट्‌जरलैंड के बैंकों में जमा भारत के कालेधन की वापसी अब और मुश्‍किल हो गई है। क्‍योंकि स्‍विस सरकार से दोहरे कराधान समाप्‍त ...

प्रमोद भार्गव का आलेख - हर तीसरा भारतीय भ्रष्‍ट

य ह शीर्षक नहीं कथन है जो हाल ही में सेवानिवृत्त हुए केंद्रीय सतर्कता आयुक्‍त (सीवीसी) प्रत्‍यूष सिन्‍हा ने कहा है। उनका दावा है कि देश के...

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