बुधवार, 8 सितंबर 2010

महेन्द्र वर्मा की ग़ज़ल - सहमे से हैं लोग न जाने किसका डर है

 

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ग़ज़ल

सहमे से हैं लोग न जाने किसका डर है,

यही नजा़रा रात यही दिन का मंजर है।

 

दुनिया भर की खु़शियां नादानों के हिस्से,

अल्लामा को दुख सहते देखा अक्सर है।

 

सच कहते हैं लोग समय बलवान बहुत है,

रहा कोई महलों में लेकिन अब बेघर है।

 

हसरत भरी निगाहें तकतीं नील गगन को,

मगर कहां परवाज़ हो चुके हम बेपर हैं।

 

अच्छी सूरत वालों ने इतिहास बिगाड़ा,

सीरत जिसकी अच्छी बेशक वह सुंदर है।

 

मैं तो हूं बंदे का मालिक मेरा क्या है,

जहां नेह का दीप जले मेरा मंदर है।

 

मेरे मन की बात समझ न पाओगे तुम, 

तेरे मेरे दुख में शायद कुछ अंतर है।

..

नादानों-अज्ञानियों, अल्लामा-ज्ञानी,

 

- महेन्द्र वर्मा

4 blogger-facebook:

  1. gazal ke tisare sher ka doosara mishara yoon hota to sakata nani rahata,magar vachaniy dosh to fir bhi rah jata.
    raha kabhi mahalon men lekin ab beghar hai.

    उत्तर देंहटाएं
  2. हसरत भरी निगाहें तकतीं नील गगन को,

    मगर कहां परवाज़ हो चुके हम बेपर हैं।
    sundar rachana

    उत्तर देंहटाएं
  3. मेरे मन को समझ ना पओगे तुम, तेरे मेरे दुख में शायद कुछ अंतर है।
    ख़ू्बसूरत पंक्ति।

    उत्तर देंहटाएं

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