गुरुवार, 9 सितंबर 2010

एस. के. पाण्डेय की बाल कविता - बच्चे और ट्रेन

बच्चों के लिए:* बच्चे  और ट्रेन*


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हम दौड़ें तो गिर-गिर जाएँ
      दौड़े ट्रेन न गिरती है  ।
पतली-पतली पटरी पे
छुक-छुक करके चलती है ।।

 
सनसन चाल निराली इसकी
       हवा से बातें करती है ।
दिन हो या सावन की रात
          ये तो चलती रहती है ।।

 
सर्दी, गर्मी, वर्षा, आंधी
हम सबके हित सहती है ।
पापा को घर से ले जाये
       वापस भी ले आती है ।।

 
सैर  कराए हमें घुमाये
  लेकिन कभी न थकती है ।
गाँव नदी गिर शहर दिखाए
       जंगल में न डरती है ।।

 
जहाँ हो चढ़ना हमें उतरना
         आकर वहाँ ये रूकती है ।
जब-जब बोले तेजी से
     डर हमको तब लगती है ।।

 
जो भी जाये उसे घुमाये
       सबकी सेवा करती है ।
मेरे जैसे सेवा सीखो
  हम सबसे भी कहती है ।।

 
देखो ! देखो ! वह देखो !
      प्यारी ट्रेन गुजरती है ।
एक खराबी इसमें केवल
       काला धुआँ उगलती है ।।

---
             एस के पाण्डेय,
             समशापुर(उ.प्र.) ।

3 blogger-facebook:

  1. अच्छी पंक्तिया है .....
    शानदार रचना ....

    यहाँ भी अपने विचार प्रकट करे ---
    ( कौन हो भारतीय स्त्री का आदर्श - द्रौपदी या सीता.. )
    http://oshotheone.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर बाल कविता ,पाठ्यक्रम में शामिल होने लायक।" डर तब हमको लगती है" वाली पंक्ति में कुछ कमी महसूस हो रही है, देखियेगा।

    उत्तर देंहटाएं

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