शनिवार, 11 सितंबर 2010

डी. एल. खन्‍ना की कविताएँ

-jijivisha (Mobile)

(1)

नीड़ उजड़ जाने से पंछी,

शोक नहीं मनाते हैं।

पंख जिनकी ताकत है,

वो फिर से नीड़ बनाते हैं

नीड़ उजड़ जाने से पंछी......

कटा अँगूठा एकलव्‍य का,

गुरु मंत्र सिखलाता है।

हिम्‍मत जिनकी पूंजी है,

वो मंजिल को पा जाते हैं।

नीड़ उजड़ जाने से पंछी......

धीरज के तट से टकराकर,

सब तूफान मिट जाते हैं।

मेहनतकश इंसान के आगे,

देव भी शीश झुकाते हैं।

नीड़ उजड़ जाने से पंछी......

भाग्‍य भरोसे रहने वाले,

मिट्‌टी में मिल जाते हैं।

तूफानों से जूझने वाले,

स्‍वयं इतिहास बनाते हैं।

नीड़ उजड़ जाने से पंछी......

-

(2)

 

तपती धरती (ग्‍लोबल वार्मिंग)

आने वाली संतानों को,

हम क्‍या विरासत में देंगे

तपते मौसम की लपटें देंगे,

पानी को प्‍यासी नदियां देंगे,

जंगल को तरसती धरती देंगे,

ओजोन की सिमटती परतें देंगे।

आने वाली संतानों को......

सीमेंट के कंक्रीट शहर देंगे,

शहरों का कोलाहल देंगे,

हाइड्रोजन बम के गोले देंगे,

आतंकी मानव बम देंगे।

आने वाली संतानों को......

परिवारों में सिमटते रिश्‍ते देंगे,

रिश्‍तों में मिटता प्‍यार देंगे,

शांति को भटकते दिल देंगे।

आने वाली संतानों को......

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-सम्‍पर्क सूत्र

5/3 तेग बहादुर रोड, देहरादून

2 blogger-facebook:

  1. दोनों कविता के लिये बधाई। पहली कविता जो ओज रस से ओत-प्रोत है, अपने संदेश को दिल की गहराइयों तक उतारने में सक्छम है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेनामी6:14 pm

    the poems r heart touching and very true to life....my best wishes to the poet....

    उत्तर देंहटाएं

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