शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

रवि भारद्वाज की लघुकथा - पनघट

मेरी पृष्‍ठभूमि गांव की है, जहां मैंने अपने बचपन के 16 साल व्‍यतीत किये थे, मुझे अक्‍सर घर में पानी भरने का काम सौंपा जाता था, गाय, बैल,भैंस के लिये तो पानी बराबर चाहता था, मुझे उस समय बहुत गुस्‍सा आया करता था। मैं अपनी दो छोटी छोटी बाल्‍टियां लेकर कुएं पर जाता था। मुझे उस समय कुएं से पानी निकालने की मनाही थी। अक्‍सर तो कुए के जगत पर औरतें ही रहती थी शायद वह ही ऐसा स्‍थान था जहॉ वो अपने दिल की बात अपने साथियों से कर सकती थी किसकी सास ने क्‍या कहा......... किसका देवर कैसा है.......... किसकी बहु ने अपनी सास को खरी खोटी सुना दी,......... किसकी बहु कितना दहेज लाई है,आदि आदि.............जिस चीज को घर पर नहीं कह पाती थी और जिसका उन्‍हें अजीर्ण हो जाया करता था वह अजीर्ण पनघट चूर्ण खाकर ठीक हो जाता था। अक्‍सर जब महिलायें पनघट पर रहती थी तो मेरी बाल्‍टियां जल्‍द भर जाती थी.............. पुरूषों के मामले में मुझे काफी देर तक इन्‍तजार करना पड़ता था........... अक्‍सर लोग मुझसे अपनी बीड़ी सिगरेट, पान तम्‍बाकू मंगाया करते थे तब कहीं जाकर वो मेरी बाल्‍टियों में पानी दिया करते थे। मेरे खेलने का सारा समय पानी भरने में लग जाता था। उस समय मैं सोचा करता था कि जब मुझे कुए से पानी निकालना आ जायेगा तो मैं किसी को मना नहीं करूंगा, सबके घडे मटके बाल्‍टी भर दिया करूंगा ...यदि उस समय मेरी नजरों में सबसे बड़ा कोंई दान था तो पानी देने का........

समय गुजरता गया मैं पढ लिखकर नौकरी पर लग गया मैंने शहर में ही एक बड़ा सा मकान बनवा लिया लेकिन मेरा वह पूर्वग्रह अब तक खत्‍म नहीं हुआ था मैंने अपने लॉन में पानी का एक बडा सा भूमिगत टैंक बनवा लिया जिसे पानी की मोटर से जोड़कर छत पर बने 1500-1500 लीटर के तीन टैंकों से पानी भर लिया जाता था। मेरा बड़ा लड़का दिल्‍ली शहर में नौकरी करने लगा अब घर में हम तीन प्राणी थे मैं, धर्मपत्‍नी, और पुत्री और हमारे लिये पानी की कोई कमी न थी। रोज सुबह बाहर पाइप से धुलवाया जाता कभी काम वाली से, कभी मैं खुद धोता था, गमलो में रोज पानी दिया जाता, जरा सा गन्‍दा होने पर तुरन्‍त पाइप लगाकर साफ कर दिया जाता था। शायद पानी के प्रति जो कमी मुझे बचपन में मिली थी उसका बदला अब मैं पानी को बहाकर पूरा करना चाहता था।

...............एक दिन शहर में बडी जोर से आंधी आयी, बिजली के पोल पर पेड गिरे कई मकानों की छत गिरी, कितनों के झोपडे उड गये........... बिजली विभाग ने सप्‍लाई बन्‍द कर दी, पानी आने को प्रश्‍न ही नहीं था। लेकिन मुझे कोई्र चिन्‍ता नहीं थी क्‍योंकि मेरा पानी का भण्‍डार भरा था। रात से ही जलकल विभाग वाले पानी की आपूर्ति के लिये प्रयास कर रहे थे सारे शहर में पानी के लिये त्राहि त्राहि मची थी लेकिन बिजली न आने के कारण पम्‍प हाउस से पानी नहीं भेजा जा सकता था।

सुबह करीब सात बजे लाइट आ गयी, लेकिन पानी की आपूर्ति अभी तक नहीं हो पाई थी लोग अपने डब्‍बे, बाल्‍टी, बोतल लेकर एक जगह से दूसरी जगह पानी की तलाश में घूम रहे थे, सभी कोठियों वालों से पूछा जाता ................क्‍या आपके यहां से एक बाल्‍टी पानी मिल जायेगा? अक्‍सर उन लोगों को मना कर दिया जाता। फिर दूसरे से तीसरे, तीसरे से चौथे घर में पूछा जाता ......लेकिन सब जगह से मना ही मिलता।...............

मै अपने टैंक से पानी का पाइप लगाकर अपना ऑगन धोने लगा कल के ऑधी बारिश ने जगह जगह मिट्‌टी कर दी थी, वही लोग मेरे घर भी आये ............... पानी मांगा, मैने कहा यहां तो नहाने का पानी नहीं हैं और पता नहीं कब पानी आयेगा............................ पानी वानी नहीं है। ... वो निराश होकर जाने लगे .......तभी मेरी लड़की ने कहा........ आंगन शाम को भी घुल जायेगा, आप अपना समय क्‍यों भूल गये पापा......आप की नजरों में तो पानी का दान सबसे बड़ा दान हुआ करता था.......आज आपको इनकी मजबूरी नहीं दिखाई दे रही है.........वह मेरे हाथ से पाइप लेकर उनके बर्तनों में पानी देने लगी...........................

मैं उन सबके सामने अपराधी की तरह खडा था .......

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RK Bhardwaj

151/1 Teachers’ Colony, Govind Garh,

Dehradun (Uttarakhand)

E mail: rkantbhardwaj@gmail.com

Phone: 0135-2531836(Residence)

1 टिप्पणी:

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