रविवार, 12 सितंबर 2010

अनामिका घटक की कविता

image

धरित्री पर खड़ा हूँ मैं 
अटल अडिग जड़ा हूँ मैं
नींव है मेरा गर्त में 
फौलाद सा कड़ा हूँ मैं (1)

 
पर्वत मुझे सब कहे 
वन को अंक में लिए 
झरनों, नदों से हूँ सुसज्जित 
देश  का रक्षक हूँ मैं (2)

 
शत्रु को डराऊं मैं 
पशुओं को छिपाऊँ मैं 
औषधों से इस धरा को 
अजर अमर बनाऊँ मैं (3) 

 
फिर ये कैसी  शत्रुता 
वन को क्यों है काटता 
रे मनुष्य संभल जा 
मैं हूँ तुम्हारी आवश्यकता (4)

 
क्यों हो वन को काटते 
नदी को क्यों हो मोड़ते
ये प्रवाह ,ये तरंग स्वतः है 
इसे हो तुम क्यों छेड़ते (5)

 
व्यथा ये मन की नदी कहे 
नालों से क्यों हो जोड़ते 
जल जीव को भी हक़ है ये 
जीये और जीते रहे  (6)

 
वन्य   प्राणी   ये कहे 
वृक्ष क्यों ये कट  गए  
पनाह है ये जीवों  का 
तुम आये और काट के चल दिए  (7)

 

परिणाम है बहुत बुरा 
धरती  बंजर  कहलायेगा 
ना बरसेंगे ये घनघटा  
ना  तूफां को रोक  पायेगा  (8)

3 blogger-facebook:

  1. वृक्षों की व्यथा ....अच्छी कविता .

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह!!!! बहुत खूबसूरती से प्रकृति प्रेम और उसके दुरूपयोग को उकेरा है कविता के माध्यम से

    उत्तर देंहटाएं
  3. सम सामयिक विषय पर एक अच्छी कविता। रचनाकारा को बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------