अनामिका घटक की कविता

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धरित्री पर खड़ा हूँ मैं 
अटल अडिग जड़ा हूँ मैं
नींव है मेरा गर्त में 
फौलाद सा कड़ा हूँ मैं (1)

 
पर्वत मुझे सब कहे 
वन को अंक में लिए 
झरनों, नदों से हूँ सुसज्जित 
देश  का रक्षक हूँ मैं (2)

 
शत्रु को डराऊं मैं 
पशुओं को छिपाऊँ मैं 
औषधों से इस धरा को 
अजर अमर बनाऊँ मैं (3) 

 
फिर ये कैसी  शत्रुता 
वन को क्यों है काटता 
रे मनुष्य संभल जा 
मैं हूँ तुम्हारी आवश्यकता (4)

 
क्यों हो वन को काटते 
नदी को क्यों हो मोड़ते
ये प्रवाह ,ये तरंग स्वतः है 
इसे हो तुम क्यों छेड़ते (5)

 
व्यथा ये मन की नदी कहे 
नालों से क्यों हो जोड़ते 
जल जीव को भी हक़ है ये 
जीये और जीते रहे  (6)

 
वन्य   प्राणी   ये कहे 
वृक्ष क्यों ये कट  गए  
पनाह है ये जीवों  का 
तुम आये और काट के चल दिए  (7)

 

परिणाम है बहुत बुरा 
धरती  बंजर  कहलायेगा 
ना बरसेंगे ये घनघटा  
ना  तूफां को रोक  पायेगा  (8)

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3 टिप्पणियाँ "अनामिका घटक की कविता"

  1. वृक्षों की व्यथा ....अच्छी कविता .

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  2. वाह!!!! बहुत खूबसूरती से प्रकृति प्रेम और उसके दुरूपयोग को उकेरा है कविता के माध्यम से

    उत्तर देंहटाएं
  3. सम सामयिक विषय पर एक अच्छी कविता। रचनाकारा को बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

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