सोमवार, 13 सितंबर 2010

सुनील संवेदी की लघुकथा - विमान

sunil samvedi (Custom)

विमान

पड़ोस की बूढ़ी दादी की मृत्‍यु के कयास पिछले कुछ सप्‍ताह से लगाए जा रहे थे। इस सत्र में एक वही बचीं थीं वाकी तो उनकी हमउम्र सभी इस आस-पड़ोस से दूसरी दुनिया में कूच कर गई थीं। जीत-हार का गणित इस बात पर निर्भर करता था कि वह उसी सप्‍ताह के भीतर मृत्‍यु को प्राप्‍त हों जो कयास वालों के दरम्‍यान बहस में निश्‍चित हुआ था।

कल उनकी मृत्‍यु हो गई, रिमझिम बारिश के बीच। कुछ का गणित जीता कुछ का हारा। बड़ी तादाद में लोग आ रहे थे, चेहरों को गंभीर पीड़ा से पोते। हालांकि यह पीड़ा पिछली मोड़ से प्रारम्‍भ होती थी, उससे पहले तो ...। कुछ तो जैसे बस्‍स... रोने वाले ही हैं।

बहुओं के बीच रोने की प्रतियोगिता चल रही थी। किसका रूदन कितनी दूर तक जाता है ! ज्ञात हुआ कि इन्‍हीं बहुओं के हाथ की रोटी 'दादी' के लिए कभी नहीं हुई। हालांकि बेटियों के रोने ने कईयों को रूलाया।

अंतिम क्रिया की तैयारियां जारी थीं, भागमभाग मची थी। याद के लिए फोटोग्राफी की जा रही थी। बूढ़ी दादी के सिरहाने बारी-बारी से भिन्‍न-भिन्‍न स्‍टाइलिश मुद्राओं में एक झुण्‍ड आता और चला जाता। बहुओं ने अपने आंसू पोंछ कर चेहरे संभाल लिए कि कहीं फोटो खराब न हो जाएं।

बूढ़ी दादी अब अंतिम पथ पर थीं, अपने पीछे 'रोते - बिलखते' लोगों को छोड़कर। यकायक प्रारम्‍भ एक ही मुंह से हुआ परंतु धीरे-धीरे ढेर सारे मुखारविन्‍दों पर छा गया एक स्‍लोगन '' विमान' बहुत अच्‍छा बनवाया है।

साथ-साथ ही चल पड़ा। दादी का मृत शरीर 'विमान' के सौन्‍दर्यशाली वैभव के आगे बौना होते-होते यकायक गायब हो गया।

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सुनील संवेदी

उपसंपादक, हिंदी दैनिक जनमोर्चा

54, सिविल लाइंस, बरेली,यूपी

email-

bhaisamvedi@gmail.com

suneelsamvedi@rediffmail.com

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  1. दुनिया दिखावे में विश्वास रखती है ..रोटी नहीं मिली पर अंतिम यात्रा में विमान ....संवेदनशील कथा

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