मंगलवार, 14 सितंबर 2010

जितेन्द्र ‘जौहर’ के हिन्दी दिवस विशेष तथा अन्य समसामयिक मुक्तक *

-एक-
हर इक ज़ुबाँ को बहुत पीछे छोड़ सकती है।
समूचे दौर की धारा भी मोड़ सकती है।
माँ की लोरी है ये हिन्दी, तो इक हुंकार भी है,
सियासी ज़ुल्म की गर्दन मरोड़ सकती है !!
-दो-
कल तक कि वो हर चीज़ जो हराम थी यहाँ,
इस दौरे - सियासत में वो, हलाल बन गयी।
जीवन के गणित में यूँ उलझते चले गये,
ख़ुद ज़िन्दगी ही आज इक सवाल बन गयी।
-तीन-
श्रेय पथ का वरण किया होता।
शुद्ध अंतःकरण किया होता।
ज्ञान-वितरण बहुत किया तुमने,
ज्ञान का अनुसरण किया होता!!
- जितेन्द्र ‘जौहर’
IR-13/6, रेणुसागर, सोनभद्र (उ प्र) 231218
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ईमेल jjauharpoet@gmail.com

9 blogger-facebook:

  1. बहुत बढ़िया प्रस्तुति ....
    अच्छी पंक्तिया सृजित की है आपने ........
    भाषा का सवाल सत्ता के साथ बदलता है.अंग्रेज़ी के साथ सत्ता की मौजूदगी हमेशा से रही है. उसे सुनाई ही अंग्रेज़ी पड़ती है और सत्ता चलाने के लिए उसे ज़रुरत भी अंग्रेज़ी की ही पड़ती है, ''हिंदी-दिवस'' की बधाइयाँ !!

    एक बार इसे जरुर पढ़े, आपको पसंद आएगा :-
    (प्यारी सीता, मैं यहाँ खुश हूँ, आशा है तू भी ठीक होगी .....)
    http://thodamuskurakardekho.blogspot.com/2010/09/blog-post_14.html

    उत्तर देंहटाएं
  2. प्रिय जितेन्द्र ‘जौहर’जी
    नमस्कार !

    हिंदी दिवस के अवसर पर बधाई और शुभकामनाएं !

    अच्छे मुक्तक हैं , बधाई !

    भाईजी , एक बात कहूंगा …
    हिंदी संबंधी मुक्तक में आपने कुछ ज़्यादा ही उर्दूनिष्ठ शब्दों का प्रयोग नहीं किया ?

    साभार …
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

    उत्तर देंहटाएं
  3. rachanao men rah gaye pravahvardh agar nazarandaj karen to rachnayen achhi hai
    behtar lagata agar hindi ka gungaan hindi men hi kiya gaya hota
    Hai Hindi tumhari zuban madari,nasihat hamen roj milati rahi.
    Mere valid ne itani niqahen padhi hai ki souteli maaon ki ginati nahi.

    उत्तर देंहटाएं
  4. जितेन्द्र ’जौहर’ Jitendra Jauhar7:52 pm

    आत्मीय भाई श्री राजेन्द्र स्वर्णकार जी,
    नमस्कारम्‌!
    ’रचनाकार’ के समस्त सम्मानित पाठकों के साथ ही,आपको
    भी हिन्दी दिवस की अनन्त आत्मीय मंगलकामनाएँ!

    संदर्भित मुक्तक आपको पसंद आये, मेरा सौभाग्य!!

    बड़ी आत्मीयता के साथ आपने अपनी प्रतिक्रिया दी है, यूँ समय निकालकर टिप्पणी देने की सदाशयता आपको "आभार" का सुपात्र बनाती है।

    ’मुक्तक-१’ में उर्दू शब्द-बाहुल्य विषयक बिन्दु पर कोई बहुत विस्तृत स्पष्टीकरण क्या देना? केवल इतना ही कहूँगा...मेरे भाई, कि वह मुक्तक हिन्दी का नहीं, प्रत्युत्‌ ’हिन्दुस्तानी भाषा’ का है। यह वही हिन्दुस्तानी भाषा है जिसमें जन सामान्य के दैनिक सुख-दुःख और हर्ष-विषाद के भाव सम्यक्‌ अभिव्यक्ति पाते हैं। यहाँ क्षणभर के लिए ठहरकर हमें यह विचार करना चाहिए कि किसी पल-विशेष में आनन्दानुभूति के उपरान्त जब हमारे मुँह से सहसा यह निकल पड़ता है कि- "वाह..यार! मज़ा आ गया!" उस पल-विशेष में हम स्वयं को किस भाषा में अभिव्यक्त कर रहे होते हैं??? वस्तुतः मेरा आशय व संकेत यही कि हमारे भाषा-संस्कार में (शब्द-कोष में भी) हिन्दी-उर्दू ही नहीं, अन्य अनेक भारतीय एवं भारोपीय भाषाएँ इतनी रच-बस गयी हैं कि अब किसी प्रकार का पृथक्करण-प्रयास असंभवप्राय-सा लगता है। यही स्थिति अंग्रेज़ी, आदि अन्य विदेशी भाषाओं की भी है। वहाँ हमारे बहुत-से शब्द अपना स्थाई स्थान बना चुके हैं। जैसे हमारा ’ते’ उनका 'they' हमारा ’कोष’ उनका ’cash' हमारा ’कफ’ उनका ’cough' हमारा ’पथ’ उनका 'path' इसी तरह ’बेहतर’ और ’better'आदि के अनगिनत उदाहरण दिए जा सकते हैं।

    और फिर, हिन्दी-उर्दू तो दो बहने हैं...यदि ये दोनों कहीं एक-साथ दिख जाएँ तो इसमें हानि क्या? यथा आवश्यकता/सुविधा दोनों बहनों
    को साथ-साथ रहने दीजिए...भाई!

    यदि इससे कोई हानि होती, तो राष्ट्रकवि दिनकर की न जाने कितनी ही कविताएँ पाठ्यकम से बाहर का मार्ग देख चुकी होतीं...है न? उदाहरण के लिए, दिनकर जी की निम्नांकित पंक्तियों पर आप दृष्टि दौड़ाइए-
    "बेचैन हैं हवाएँ, हर ओर बेकली है।
    कोई नहीं बताता, कश्ती किधर चली है।
    मझधार है, भँवर है, या पास है किनारा,
    यह नाश आ रहा है, या सौभाग्य का सितारा?"

    ध्यातव्य है कि इस कविता में "बेचैन, हवाएँ, बेकली, कश्ती" आदि कितने ही उर्दू शब्दों की वर्षा-सी हो पड़ी है। है कि नही...मेरे भाई!

    वैसे यह विषय बहुत लम्बा है, फिर कभी इस पर पूरा आलेख लिखूँगा...सम्प्रति मेरी कुछ व्यस्तताएँ हैं जो मुझे रोक रहीं हैं।

    चलते-चलते मैं आपके विचारार्थ किसी बहुचर्चित-स्थापित कवि के एक गीत की निम्नांकित दो पंक्तियाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। (ज्ञात रहे कि स्वयं श्री दिनकर जी ने भी इस पंक्तियों में से "मुश्किल" शब्द को हटाने का निष्फल प्रयास किया था और अंततः उन्हें यह निष्कर्ष देना पड़ा था कि कविता में प्रयुक्त बहुत से शब्दों का भाषायी आधार पर सजातीय स्थानापन्न ढूँढ़ पाना अत्यन्त दुष्कर कार्य होता है। उनके किसी भी समकालीन कवि ने इन पंक्तियों में प्रयुक्त "मुश्किल" शब्द का विकल्प नही दे पाया था) पंक्तियाँ देखें:

    "तुमने अपनी रूप माधुरी,
    इन नयनों में भर दी,
    बड़ी ’मुश्किल’ कर दी!"

    आशा है कि इस (वैचारिक) मतभेद को ’मन-भेद’ नही बनने देंगे!इसका शिवोद्‌देश्य साहित्यिक विचार-विमर्श द्वारा परस्पर ज्ञानार्जन तक सीमित रहे तो अच्छा रहेगा।

    वैसे यदि परिमार्जित अथवा विशुद्ध हिन्दी में लिखने की बात हो तो,उपर्युक्त संदर्भित मुक्तकों में ’मुक्तक-३ विशेष रूप से पुनः देखें।

    संवाद-नैरन्तर्य एवं सद्‌भाव बनाए रखें, मुझे सचमुच बड़ी प्रसन्नता होगी! तथास्तु!... आमीन!... So be it!

    आपका सदाशयी,
    जितेन्द्र ’जौहर’ (शिक्षक/कवि)
    jjauharpoet@gmail.com

    उत्तर देंहटाएं
  5. जितेन्द्र ’जौहर’8:04 pm

    आद. श्री गजेन्द्र सिंह जी,
    नमस्कारम्‌!
    आपकी टिप्पणी के लिए आभारी हूँ! मैं अवश्य पढ़ूँगा आपका यह blog :
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  6. प्रिय भाई जितेन्द्र ‘जौहर’जी
    स्वागत ! आभार ! सहमत हूं ! क्षमा चाहता हूं , मेरी छोटी-सी बात पर आपको इतना कष्ट उठाना पड़ा ।
    शस्वरं पर भी समय निकाल कर पधारें …
    शुभाकांक्षी
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

    उत्तर देंहटाएं
  7. गयान का वितरण बहुत किया आपने, ग्यान का अनुसरण किया होता ,मन-मन्दिर के उतकों को कुरेदती पंक्तियां ,बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  8. जितेन्द्र ‘जौहर’11:26 pm

    आत्मीय भाई श्रीराजेन्द्र स्वर्णकार जी,
    नमस्कारम्‌!
    विचार-साम्य के लिए धन्यवाद! इसमें कष्ट क्या उठाना...? यह तो विचारों के आदान-प्रदान का एक सुन्दर अवसर था। इसके माध्यम से मुझे आप जैसा सुघर-सुनम्य व्यक्तित्व वाला एक मित्र मिल गया।

    मित्रता में "क्षमा" की याचना का क्या काम?!! है न...?

    उत्तर देंहटाएं
  9. जितेन्द्र ‘जौहर’11:42 pm

    आद. डॉ. संजय दानी जी,
    नमस्कारम्‌!
    संदर्भित मुक्तक आपके मन-मंदिर के द्वार पर दस्तक दे सका, मेरा अहोभाग्य! आपकी उत्साह्ववर्द्धक टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार...!

    उत्तर देंहटाएं

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