शनिवार, 25 सितंबर 2010

राजीव श्रीवास्तव की हास्य कविता - काले घने घुँघराले बाल

 

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काले घने घुँघराले ये शब्द, दो शब्दकोश से निकाल

क्योंकि इनका बालों की लिए होता है इस्तेमाल !

 

कभी ये तीनों शब्द मुझे भी बहुत प्रिय थे ,

लगता था की जैसे ये मेरे लिए ही बने थे !

 

सर पे लहलाहाती खेती पे मुझ को था अभिमान ,

मेरी गर्लफ्रेंड को भी मेरे बालों पे था गुमान !

 

याद है कैसे प्यार से मेरे बालों पे हाथ फेरती थी ,

जलने वालों की नज़र मुझे ही टेरती थी !

 

हर पार्टी मैं बालों की तारीफ करते थे यार ,

मैं भी क्रीम और जेल लगा के देता नित-नये आकर !

 

कोई मुझे ऋतिक तो कोई संजय द्त्त पुकारता ,

मैं भी बड़े चाव से अपने बालों को निहारता !

 

याद है वो मनहूस घड़ी,बुरा हुआ था मेरा हाल ,

जब कंघी करी और देखा झड़ रहे थे मेरे बाल !

 

एक-एक कर लगे थे गिरने ,मेरा सर रहे थे छोड़ ,

लग रहा था जैसे जल्दी निकलने की लगी थी उनमें होड़ !

 

मेरे तो होश उड़ गये तब लोगों से ली राय ,

सोच रहा था किस कम्बख़त की मुझ को लग गयी हाय !

 

दही, माखन ,शहद, नींबू सब कुछ बालों मैं लगाया ,

पर कुदरत को कुछ और मंजूर था कुछ काम ना आया !

 

जड़ी-बूटी,दवाई और लगाए कई सारे तेल ,

पर मेरे सर पे लगते ही सभी हो गये फेल !

 

मेरा तो चेहरा बदल गया और आया नया रूप ,

दूर से ही पहचाना जाता जब सर पे पड़ती धूप !

 

अपनों ने अनदेखा किया ,गर्लफ्रेंड ने भी छोड़ा

मुझसे नाता तोड़ घने बालों वाले से नाता जोड़ा!

 

शुभचिंतको ने खूब समझाया,कहा ना लो टेन्शन ,

आज तो हीरो भी सर मुंडा रहे गंजेपन का ही फैशन !

 

कई गंजे हीरो की दिखा के फोटो मन मेरा बहलाते ,

मुझे ग़ज़नी का आमिर ख़ान बता मुझे खूब फुसलाते !

 

मैंने चंद दिनो मैं ही अपना सब कुछ खोया ,

कई बार दुखी हुआ अपनी फोटो देख के रोया !

 

समझ ले प्यारे एक बार जो फसल ये कट जाती ,

लाख कर लो कोशिश ये फिर वापस नही आती !

 

आओ बताऊं एक बात ,जो मेरे दादी मुझे बतलाती ,

बाहर की काया तो मिट जाती, मन की सुंदरता ही रह जाती !

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डॉक्टर राजीव श्रीवास्तव

मेडिकल कॉलेज हल्दवानी

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