शनिवार, 4 सितंबर 2010

राजेश विद्रोही की ग़ज़लें

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ग़ज़ल

बेशक जिसका राज नहीं हैं।

समझो उसका आज नहीं हैं॥

 

उपर वाले की लाठी में,

दम तो हैं आवाज नहीं हैं।

 

पिंजरे के पंछी के खातिर,

पर तो है परवाज़ नहीं है।

 

जो कुछ सच है वही कहेगा,

शाइर है लफ़्‍फ़ाज नहीं है।

 

कहीं कनीजों की किस्मत में,

मलिका वाला ताज नहीं हैं।

 

आब गुदीजों की बस्‍ती में ,

कोई उम्रदराज नहीं हैं।

 

ज्‍यों की त्‍यों धर देगा चादर,

‘राज' मुलम्‍मासाज नहीं हैं।

---

ग़ज़ल 2

रास्‍ते बेशक नहीं थे, पुरख़तर मेरे लिये।

राह के रोड़े मगर थे, राहबर मेरे लिये॥

 

मैं अज़ल से चल रहा हॅूँ, पांव थकते ही नहीं,

रोजमर्रा का शगल हैं, ये सफर मेरे लिये।

 

आज जाने क्‍यों खफा हैं, मुझसे मेरा ही वजूद

आज फिर से अजनबी हैं, मेरा घर मेरे लिये।

 

मौत पर तो आज भी विश्‍वास कायम हैं मगर,

जिंदगी हरगिज नहीं हैं, मोतबर मेरे लिये।

 

कामयाबी के लिए खुद की नुमाइश शर्त है,

हैं नहीं आसान लेकिन ये हुनर मेरे लिये।

 

कोई कुछ भी वास्‍ता दे, मुझको तो मालूम है,

क्‍या करेंगे अन्ततः लख्‍तेजिगर मेरे लिये।

---

राजेश ‘विद्रोही'

लाडनू नागौर राज

341306

5 blogger-facebook:

  1. दूसरो को नसीहत देने की क्या 'मजाल',
    काफी है करना खुद की फिकर मेरे लिए !

    सरल और सहज रचनाएँ ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. शानदार और उम्दा ग़ज़लें...........
    मुबारक !

    उत्तर देंहटाएं
  3. दोनों ग़ज़लें अच्छे ख़यालात की नुमाइश कर रहे हैं। दुसरी ग़ज़ल तो "बहरे-रमल" में है मगर पहली ग़ज़ल का छंद विन्यास मैं समझ नहीं पा रहा हूं, बहरहाल मुबारकबाद।।

    उत्तर देंहटाएं
  4. भावपूर्ण प्रस्तुती एक अच्छी सतरंगी तलाश शब्दों का सुन्दर संयोजन

    उत्तर देंहटाएं
  5. रीना1:54 pm

    अच्छी ग़ज़लों के लिए बधाई!

    उत्तर देंहटाएं

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