शनिवार, 18 सितंबर 2010

दामोदर लाल जांगिड़ की ग़ज़लें

ग़ज़ल

उसे तेशो खंजर ओ तलवार दे।

पर मुझे हल कलम और औजार दे॥

 

काट दे बेड़ियां वक्‍त की बेहिचक,

मेरी लेखनी को तू वो धार दे।

 

खूबसूरत दी तस्‍वीर तो शुक्रिया,

इसे टांकने को कहीं दीवार दे।

 

बह गया प्‍यार शुब्‍हा ए सैलाब में,

किसी दिल को तो तुख्‍में एतबार दे।

 

मैं परस्‍तिश करुँ ना करुँ क्‍या हुआ,

मुझको भी मेरे हक़ तरफदार दे।

 

मुझे ना रोज आना पड़े मांगने ,

बस एक बार में ही मददगार दे।

 

खुद ब खुद खेंच लूंगा लकीरें तो मैं,

हथेली बिन लकीरों की इस बार दे।

 

ग़ज़ल

यूं तो आंसू आँखों में आयी दो बूंदें पानी हैं।

वैसे ये गूंगी पीड़ा की भाषा जानी मानी हैं॥

 

रोके से ना रोके जाएं आंसू आ ही जाते हैं,

सौ दीवारें भी लांघी जो आ जाने की ठानी हैं।

 

खामोशी ही खमोशी फैली हैं चाहे राहों में,

रुठी यादें कैदी आहें क्‍यों खाना वीरानी हैं।

 

सांसों का आना जाना ही क्‍या जी लेना होते हैं

यूं जी लेना या ना जीना दोनों ही बेमानी हैं।

 

यारों ने याराना ओढ़ी थोपी हैं लाचारी ही,

मौका आया तो वो सारी सौगातें लौटानी हैं।

 

दाता को देना होता तो दे के ही भेजा होता ,

खाली लौटाया रोजाना क्‍या झोलियाँ फैलानी हैं।

--

ग़ज़ल

किसी ने फिर मुझे अपना कहा है।

अभी भी कौन सा रिस्‍ता बचा है॥

 

समुन्‍दर पार से अब के लिखा है,

वहां भी मुझको कोई जानता है।

 

न जाने क्‍या क्‍या पढ़ना चाहता है,

मेरा खामोश चेहरा बाँचता है।

 

उसे पढ़ कर के ये लगने लगा है,

कोई मेरी तरह भी सोचता है।

 

कमाया नाम क्‍या उसने  वो ‘जांगिड़',

पते के पीछे पीछे भागता है।

--

दामोदर लाल जांगिड़

3 blogger-facebook:

  1. bahut hi khubsoorat hain. jaanchana mat jahaan me rishtey. jisne jaanchey hai choT khaai hai. pl. visit www.shashimehra.com

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  2. ग़ज़लों ने प्रभावित किया।

    उत्तर देंहटाएं
  3. अच्छे मफ़हूम की रवानी से लबरेज़ अच्छी ग़ज़ल

    उत्तर देंहटाएं

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